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पर्दे पर ट्रेन आती देख भाग खड़े हुए दर्शक:मुगल-ए-आजम के पृथ्वीराज कपूर की दहाड़ सुन रोती थीं महिलाएं-बच्चे, अब ऑडिएंस भाग्यविधाता

नई दिल्ली5 दिन पहलेलेखक: ऐश्वर्या शर्मा
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आज 23 सितंबर यानी ‘नेशनल सिनेमा डे’ है। मूवी लवर्स के लिए खास दिन। इस मौके पर ऑडिएंस को देश की 4000 थिएटर स्क्रीन्स पर सिर्फ 75 रुपए में मूवी देखने को मिलेगी।

दरअसल, कोरोना महामारी और ओटीटी के कारण दूर हुए दर्शकों को सिनेमा हॉल की तरफ खींचने के लिए ऐसा किया जा रहा है। 75 रुपए में सिनेमा दिखाने वाले मूवी हॉल्स में PVR और सिनेपॉलिस जैसी बड़ी मल्टीप्लेक्स कंपनियां शामिल हैं।

ऐसे में कहा जा सकता है कि चाहे हालात कैसे भी हों, सिनेप्रेमियों को जिंदगी में चाहिए केवल एंटरटेनमेंट, एंटरटेनमेंट और एंटरटेनमेंट।

इस एंटरटेनमेंट की खातिर ही कश्मीर में करीब 30 साल बाद सिनेमा हॉल दोबारा खोले जा रहे हैं। चेन्नई के जादू समूह ने शोपियां और पुलवामा में 2 सिनेमा हॉल शुरू किए गए हैं।

आतंकी हमलों के कारण कश्मीर में 80 के दशक से सिनेमा हॉल बंद करने पड़े। तब यहां 12 से ज्यादा सिंगल स्क्रीन थे।

बहरहाल, कुछ समय से सोशल मीडिया पर हैशटैग बायकॉट बॉलीवुड का ट्रेंड बना हुआ है। इस वजह से अगस्त में रिलीज हुई आमिर खान की फिल्म ‘लाल सिंह चड्‌ढा’ और अक्षय कुमार की फिल्म ‘रक्षाबंधन’ को थोड़ा झटका लगा, क्योंकि ऑडिएंस फिल्म देखने नहीं गई। रणबीर कपूर और आलिया भट्‌ट की फिल्म ‘ब्रह्मास्त्र’ का भी बायकॉट किया गया। इस बायकॉट की वजह इन फिल्मों से जुड़े एक्टर्स के पुराने बयान रहे।

वहीं, कुछ दिन पहले सोशल मीडिया पर शाहरुख खान का एक पुराना वीडियो वायरल हो गया, जिसमें वह कह रहे थे कि कलाकारों को ऑडिएंस की इज्जत करनी चाहिए।

यहां हम यह बात इसलिए कर रहे हैं क्योंकि भले ही सिनेमा की ऑडिएंस और उसे देखने का अंदाज बदला हो, लेकिन ऑडिएंस की पावर में कोई कमी नहीं आई है। आज भी दर्शक ही एक फिल्म को हिट या फ्लॉप बनाते हैं।

‘मर्द’ फिल्म का अमिताभ बच्चन का डायलॉग आपको याद ही होगा, ‘हम जहां खड़े होते हैं, लाइन वहीं से शुरू होती है।’ यह लाइन कुछ-कुछ ऐसे ही है जैसे फिल्म के टिकट काउंटर की कतार। जैसे-जैसे टिकट विंडो की कतार लंबी होती है फिल्म बॉक्स ऑफिस पर हिट होने लगती है।

...तो पिक्चर शुरू करने से पहले दुनिया के सिनेमा हॉल्स पर एक नजर डाल लेते हैं

आडिएंस पावरफुल है

यह ऑडिएंस की ही पावर है कि ‘मुगल-ए-आजम’ जैसी फिल्म को सन 1960 में ही अलग-अलग भाषाओं (हिंदी, अंग्रेजी और तमिल) में शूट किया गया था। इसलिए इस फिल्म को बनाने में 18 साल लगे, क्योंकि इस फिल्म का मकसद हर तरह की ऑडिएंस जुटाना था।

फिल्म समीक्षक चंद्रमोहन शर्मा ने बताया कि सदाबहार हीरो देवानंद अपने फिल्मों के टाइटल अखबारों की हेडलाइंस से लेते थे ताकि उनकी ऑडिएंस फिल्म से जुड़ा महसूस कर सके। उन्होंने ‘काला बाजार’ और ‘ज्वैलथीफ’ फिल्मों के नाम ऐसे ही रखे।

आज बॉलीवुड के साथ-साथ भले ही टॉलीवुड (तेलुगू और बांग्ला), कॉलीवुड (तमिल), मॉलीवुड (मलयालम), पॉलीवुड (पंजाबी) का बोलबाला बढ़ रहा हो, लेकिन असल पावर फिल्म के दर्शकों के हाथ में है, क्योंकि हाउसफुल का बोर्ड ही फिल्मों का भाग्य विधाता है।

आपको एक और मजेदार किस्सा सुनाते हैं।

1896 में फ्रांस में 50 सेकेंड की L’Arrivée d’un train en gare de La Ciotat (Arrival of a Train) नाम की साइलेंट फिल्म शोकेस की गई। पर्दे पर जब खामोशी से ब्लैक एंड वाइट ट्रेन तेजी से दौड़ती नजर आई तो लोग हॉल से भागने लगे। उस समय हॉल में अफरा-तफरी मच गई थी।

ऐसा ही चर्चित किस्सा मुगल-ए-आजम के साथ भी जुड़ा। जब फिल्म में अकबर बने पृथ्वीराज कपूर चिल्लाते तो हॉल में बैठे पुरुष भाग जाते और महिला-बच्चे रोने लगते। जब 'जय संतोषी मां' फिल्म आई तो आरती शुरू होने पर दर्शकों ने स्क्रीन पर पैसे फेंके।

इस डर से लेकर आज ‘फर्स्ट डे-फर्स्ट शो’ देखकर सेल्फी पोस्ट करने या रील्स बनाने वाले ऑडिएंस और सिनेमा के बीच रिश्ता कैसे मजबूत होता गया, ये समझने के लिए आपको लेकर चलते हैं 1891 के दौर में, जब एक पर्दा होता था और ऑडिएंस के नाम पर दर्शक भी एक ही होता था।

लेकिन उससे पहले, क्या आपने कभी सोचा कि भारत में फिल्म शुरू कैसे हुईं? हिंदी सिनेमा समय के साथ बदलता गया। कैसे, इस ग्राफिक्स से समझें:

1896 में पहली बार मुंबई में दिखाई गई काइनेटोस्कोप पर फिल्म

आज एक फिल्म को एक-साथ हजारों लोग बैठकर देख सकते हैं, लेकिन पहले के जमाने में एक बार में एक ही व्यक्ति सिनेमा का लुत्फ उठा पाता था। इसी दौर में दर्शकों और सिनेमा के बीच रिश्ता बनना शुरू हुआ। 1891 में न्यूयॉर्क की एडिसन कंपनी ने ‘काइनेटोस्कोप’ बनाया। ‘काइनेटोस्कोप’ एक ऐसी डिवाइस थी जिसमें तस्वीरें एक समान रफ्तार के साथ चलती थीं। आप इसे मोशन पिक्चर कह सकते हैं।

‘काइनेटोस्कोप’ को पब्लिक के बीच 1893 में लाया गया। दूसरी तरफ, फ्रांस में रहने वाले पेंटर से फोटोग्राफर बने एंटोनी लुमिएर (Antoine Lumière) के 2 बेटे Auguste Lumière और Louis Lumière फिल्मों का इतिहास रचने में जुटे थे। साइंस के सब्जेक्ट में माहिर दोनों भाई फोटोग्राफी में भी एक्सपर्ट थे। लुइस फिल्म प्रोडॅक्शन का काम करने लगे और 18 साल की उम्र में उन्हें सफलता मिली। उन्होंने फोटोजनिक प्लेट्स बनानी शुरू की। 1894 तक वह साल में 1 करोड़ से ज्यादा प्लेट्स बनाने में कामयाब हुए।

1894 में एंटोनी लुमिएर को पेरिस में काइनेटोस्कोप देखने का निमंत्रण मिला। उन्होंने वहां से आकर दोनों बेटों को ‘पीपहोल मशीन’ के बारे में बताया। लुइस और अगस्ते ने पिक्चर को मूविंग बनाने पर काम करना शुरू किया। लुइस एक सेकेंड में तस्वीरों के 16 फ्रेम चलाने में कामयाब रहे।

दिसंबर 1895 में पेरिस में पहली बार लुमिएर ब्रदर्स ने La Sortie des ouvriers de l’usine Lumière (Workers Leaving the Lumière Factory) नाम की पहली मूविंग पिक्चर ऑडिएंस को दिखाई। ठीक 6 महीने बाद जुलाई 1896 में मुंबई के वॉटसन होटल में लुमिएर ब्रदर्स के जरिए सिनेमा ने भारत में कदम रखा।

उस दौर में फिल्में 1 से 2 मिनट की होती थीं। और इन फिल्मों को देखने की स्क्रीन 35mm की होती थी। इस तरह भारत में सिनेमा की एंट्री हुई।

शुरुआत में इसमें ब्लैक एंड वाइट पिक्चर्स दिखती थीं, लेकिन 1906 में रंगीन फिल्में देखी जाने लगीं। इन कलर्स को ‘किनेमाकलर’ कहते थे। यह वह दौर था जब स्वदेशी आंदोलन के बाद बंगाल विभाजन रद्द कर दिया गया था और ब्रिटेन के किंग जॉर्ज पंचम के ‘दिल्ली दरबार’ की तैयारी की जा रही थी। इसी वक्त 1912 में पहली बार ‘किनेमाकलर’ में ‘दिल्ली दरबार’ नाम की फिल्म दिखाई गई।

आगे बढ़ते से पहले भारत के सिनेमा हॉल के बारे में जाने क्योंकि हर फिल्म की रिलीज के बाद एक्टर, प्रोड्यूसर, और सिनेमा हॉल मालिक जरूर जानना चाहते हैं- थिएटर में कितने आदमी थे?

आपको बाइस्कोप दिखाने ले चलते हैं, जिसने लोगों को क्रेजी कर दिया था

अगर आप 90 के दशक से पहले पैदा हुए हैं तो आपने खूब मेले घूमे होंगे। मौत के कुएं से लेकर बाइस्कोप भी देखा होगा। हां, वही बाइस्कोप जिस पर तस्वीरें चलती हैं और ग्रामोफोन या स्पीकर पर म्यूजिक बजता है। आज भी कई मेलों में यह देखने को मिलते हैं, लेकिन एक जमाना था जब इसी के जरिए फिल्मों के शौकीन लोग अपना शौक पूरा किया करते। सिनेमा को लेकर ऑडिएंस का क्रेज बिल्कुल वैसा था जैसा आज भी नजर आता है।

चलिए- बात करते हैं केवल बाइस्कोप की। भारत के पहले फिल्म मेकर हीरा लाल सेन 1896 में बाइस्कोप को कोलकाता लाए ताकि लोगों का मनोरंजन हो। इसे बाकायदा थिएटर में रखा गया। बाइस्कोप पर जब फिल्म दिखाई जाती तो मिनर्वा, स्टार और क्लासिक थिएटर में लोगों का हुजूम उमड़ पड़ता।

ये तो बात हुई भारत में बाइस्कोप की दीवानगी की, लेकिन इसकी शुरुआत हुई कैसे हुई?

जर्मनी के सिनेमा को इंटरनेशनल स्तर पर लाने वाले स्क्लाडानोव्स्की ब्रदर्स ने फिल्मी दुनिया को नया आयाम दिया। 1895 में पेरिस में जहां लुमिएर ब्रदर्स मूविंग पिक्चर दिखा रहे थे, वहीं इसी साल जर्मनी के फिल्म मेकर मैक्स स्क्लाडानोव्स्की और उनके भाई एमिल स्क्लाडानोव्स्की ( Max Skladanowsky and his brother Emil Skladanowsky) ने बाइस्कोप बनाया।

इसमें कैमरा और प्रोजेक्टर दोनों थे। उन्होंने जर्मनी के एक रेस्टोरेंट में सबको फिल्म दिखाई। बाद में यही रेस्तरां Feldschlößchen जर्मनी की राजधानी बर्लिन का पहला पिक्चर हॉल भी बना।

जब 35mm से 70mm की हुई बिग स्क्रीन

सिने जगत में तकनीक के साथ-साथ स्क्रीन के साइज भी बदलते रहे। 35mm से अब स्क्रीन 70 mm की हो चली थी। 1914 में इटालियन फिलोटेओ अल्बेरिनी (Filoteo Alberini) ने 70mm की बिग स्क्रीन का आविष्कार किया। इसे ‘पेनोरमिका’ कहा गया।

70mm पर फिल्म बड़ी दिखने लगी थी। मनोरंजन की खातिर दर्शकों की भीड़ बड़े पर्दे पर फिल्म देखने के लिए उमड़ पड़ती थी। आप और हम आज जिस स्क्रीन पर मूवीज देखते हैं, वो यही बड़ा पर्दा है।

कोलकाता में खुला था पहला सिंगल स्क्रीन थिएटर

भारत का पहला सिनेमा हॉल 1907 में कोलकाता में खोला गया। इसका नाम 'चैप्लिन' सिनेमा था जो पहला सिंगल स्क्रीन थिएटर भी था। चौरंगी प्लेस में बना यह पिक्चर हॉल लोगों के बीच काफी पॉपुलर हुआ। पहली बार एक छत के नीचे कई लोग एकसाथ फिल्म देखने पहुंचे। जल्द ही तत्कालीन कलकत्ता में तेजी से बढ़ते दर्शकों के लिए हॉलीवुड फिल्मों की स्क्रीनिंग शुरू कर दी गई।

यह सिनेमाघर पारसी बिजनेसमैन जमशेदजी फ्रेमजी मदन का था। बाद में इस थिएटर का नाम बदलकर मिनर्वा ( Minerva) कर दिया गया।

इन थिएटर हॉल्स के खुलने के बाद फिल्म प्रेमियों ने यह मन ही मन कहा होगा-’ऑडिएंस खुश हुई।’ इस ग्राफिक्स के जरिए समझें दर्शकों का अंदाज:

नेहरू ने भी देखी थी दिल्ली के पहले थिएटर-रीगल में फिल्म

दिल्ली की बात करें तो भारत की राजधानी का दिल कहलाने वाला कनॉट प्लेस पहली बार शहर में सिनेमा हॉल खुलने का गवाह बना। 1932 में खुला आज का PVR रीगल कभी सिंगल स्क्रीन थिएटर 'रीगल' कहलाता था। इस हॉल में एक साथ 694 लोग बैठकर फिल्म देखते। रीगल थिएटर में हमारे देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू भी फिल्म देख चुके हैं।

यह बात 30 मार्च 1956 की है। उन्होंने कांग्रेसी नेताओं के लिए यहां 'चलो दिल्ली' फिल्म की स्पेशल स्क्रीनिंग रखवाई थी। यह फिल्म सुभाष चंद्र बोस की जिंदगी पर आधारित थी। बॉलीवुड के शोमैन राजकपूर हमेशा अपनी फिल्मों का दिल्ली में प्रीमियर ‘रीगल थिएटर’ में ही किया करते।

रीगल से चंद दूरी पर 'प्लाजा' था जो आज 'PVR प्लाजा' है। यह 1933 में बना, जो दिल्ली का दूसरा सबसे पुराना सिंगल स्क्रीन सिनेमा हॉल था।

सिंगल स्क्रीन थिएटर ने ऑडिएंस को एक कम्फर्ट और प्राइवेसी दी। थिएटर को सीट के हिसाब से 4 भागों में बांटा गया।

दिल्ली के आसिफ अली रोड पर 1955 में खुला मशहूर डिलाइट सिनेमा हॉल कई साल से दर्शकों की बदलती पसंद का गवाह बना।

डिलाइट सिनेमा के CEO राज कुमार मल्होत्रा कहते हैं कि पहले सिनेमा हॉल्स बड़े होते थे और लोगों के बैठने की क्षमता भी ज्यादा होती थी, क्योंकि तब डिमांड ज्यादा थी और थिएटर कम।

बड़े सितारों की फिल्में 2 साल बाद आती थी जिससे दर्शकों के लिए फिल्म देखना एक उत्सव जैसा होता।

सिंगल स्क्रीन थिएटर में 4 क्लास होती हैं- लोअर, मिडिल, अपर और बालकनी। फ्रंट रो की सीट पर ज्यादातर स्टूडेंट्स ही दिखते हैं। बाकी कैटेगरी की सीट पर फैमिली नजर आती हैं।

सिंगल स्क्रीन थिएटर में फ्रंट सीट से स्क्रीन 25 से 30 फुट दूर होता है। लग्जरी के नाम पर हॉल की सीट बदली गईं। लोगों को पैर रखने का स्पेस ज्यादा मिला।

राज कुमार मल्होत्रा कहते हैं कि 1997 में आए मल्टीप्लेक्स ने सिनेमा हॉल की शक्ल ही बदल दी। बड़े मूवी थिएटर हॉल छोटे मल्टीस्क्रीन ऑडिटोरियम में बदल गए।

1955 में आया डिलाइट भी आज मल्टीस्क्रीन में बदल गया।

दिल्ली का पहला सिनेमा हॉल 'रीगल' था। यह 1959 की तस्वीर है।
दिल्ली का पहला सिनेमा हॉल 'रीगल' था। यह 1959 की तस्वीर है।

सिनेमा हॉल का रूप बदला, लेकिन ऑडिएंस आती रही

राज कुमार मल्होत्रा मानते हैं कि समय के साथ सिनेमा हॉल भले ही सिंगल स्क्रीन से मल्टीस्क्रीन हो गए लेकिन ऑडिएंस वैसी ही रही।

जिस तरह पहले फिल्म देखने का क्रेज रहता था, आज भी है। हमारे देश में फिल्में देखना हॉलीडे सेलिब्रेट करने की तरह होता है।

पहले दर्शक एक फिल्म को देखने 4-5 बार आते थे

लोगों के मनोरंजन के लिए जब सिनेमा हॉल बने तो एक सिंगल स्क्रीन हॉल की सिटिंग कैपेसिटी 1000 से ऊपर थी। दिल्ली में डिलाइट की 980 है और जब राजौरी गार्डन में विशाल सिनेमा हॉल खुला तो वहां एक साथ 1400 लोग मूवी देख सकते थे। मल्टीप्लेक्स हॉल आने के बाद ऑडियंस को कई तरह की फिल्में देखने के ऑप्शन्स मिले।

ऑडियंस की सहूलियत और चॉइस के चलते मल्टीप्लेक्स पर अब कॉमर्शियल, आर्ट, हॉलीवुड या किसी भी भाषा की फिल्म देखने को मिल जाती है।

डिलाइट सिनेमा के CEO राजकुमार मानते हैं कि ऑडिएंस 2 तरह से जरूर बदली है। कोरोना से पहले वीकेंड में फैमिलीज एडवांस बुकिंग कराकर फिल्में देखने आतीं जो अब बहुत कम देखने को मिलता है। दूसरा बदलाव यह आया कि पहले लोग एक ही फिल्म को 4-5 बार देखते। अब ऑडिएंस फिल्म रिपीट नहीं करती।

भारतीय सिनेमा का बाजार दुनिया का सबसे बड़ा मार्केट है। यहां हर साल कई भाषाओं में फिल्म बनती है। इस मोर्केट को ग्राफिक्स से समझें

बी ग्रेड फिल्में देखने वालों का अलग क्राउड और अलग टाइम होता

PVR लिमिटेड के CEO गौतम दत्त का कहना है कि 90 के दशक के बीच एक ऐसा दौर आया था जब सुबह के शो में बी-ग्रेड फिल्में लगती थीं। ऐसे में फैमिली वाले मूवी देखने के लिए हॉल बहुत ध्यान से चुनते। 1997 में PVR ने भारत में पहली बार 4 स्क्रीन का पहला मल्टीप्लेक्स दिल्ली के साकेत में खोला था। यह आज 'PVR अनुपम' के नाम से मशहूर है।

कोरोना हो या कोई भी दिक्कत, फिल्म लवर्स को देख थिएटर के कारोबार से जुड़े लोग खुश ही रहते होंगे कि ‘उनके पास ऑडिएंस है।’ ठीक वैसे ही जैसे फिल्म ‘दीवार’ में शशि कपूर ने अभिताभ बच्चन को कहा था कि ‘मेरे पास मां है।’

सिनेमाघर के चौकीदार की टॉर्च बुझ गई

आपको सिनेमा हॉल के चौकीदार की टॉर्च याद है? अगर आपने सिंगल स्क्रीन थिएटर पर फिल्में देखी होंगी तो इसका भी अनुभव जरूर लिया होगा। जरा सा लेट पहुंचने पर गेटकीपर आपको टॉर्च से सीट तक का रास्ता दिखाता था जहां आप अपनी सीट ढूंढ रहे होते और ऑडिएंस डिस्टर्ब होने पर नाराज होकर हल्ला मचाती।

आज मल्टीप्लेक्स हॉल में आपका मोबाइल ही आपका टिकट और टॉर्च दोनों का काम करता है।

‘हाउसफुल का बोर्ड’ और ब्लैक में बिकने वाला टिकट अब बीती बात

दिलीप कुमार, राजेश खन्ना जैसे बड़े स्टार्स की फिल्म रिलीज होने पर ऑडिएंस को काबू करना मुश्किल होता था। सिंगल स्क्रीन होने की वजह से एक बार में एक ही शो होता, यानी दिनभर में 4 से 5 शो। शनिवार और रविवार को एडवांस बुकिंग ना कराने वालों को हाउसफुल के बोर्ड के दर्शन होते।

ऐसे में ब्लैक टिकट दबाकर बिकते। 50 रुपए का टिकट 200-300 रुपए तक में बिकता था।

1958 में मुंबई के मराठा मंदिर की तस्वीर। उस समय यहां फिल्म 'साधना' लगी हुई थी।
1958 में मुंबई के मराठा मंदिर की तस्वीर। उस समय यहां फिल्म 'साधना' लगी हुई थी।

मराठा मंदिर में आज भी 30-40 रुपए का टिकट

मुंबई के मशहूर सिनेमा हॉल मराठा मंदिर में शाहरुख खान और काजोल की फिल्म ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे’ (DDLJ) पिछले 27 साल से दिखाई जा रही है। इसी हॉल में शोले को 286 सप्ताह तक देखा गया। वहीं, 17 साल तक मुगल-ए-आजम भी चली।

G7 मल्टीप्लेक्स और मराठा मंदिर सिनेमा हॉल के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर मनोज देसाई ने बताया कि मराठा मंदिर 1958 में शुरू हुआ। 1,111 सीटों वाले इस हॉल में 350 सीट की बालकनी है। आज भी यहां 30 रुपए नॉर्मल सीट और 40 रुपए का बालकनी का टिकट है। यह हॉल मुंबई सेंट्रल स्टेशन के पास है। इसलिए 40% ऑडियंस मुंबई के बाहर की आती है।

ड्राइव-इन थिएटर का बढ़ा क्रेज

कोरोना के दौरान भारत में ड्राइव-इन मूवी थिएटर का चलन बढ़ा, लेकिन फिल्म देखने का यह तरीका पहली बार 6 जून 1933 में आ गया था। अमेरिका के न्यू जर्सी में रिचर्ड हॉलिंग्सहेड (Richard Hollingshead) ने इसकी शुरुआत की।

उन्होंने सबसे पहले अपनी मां के लिए मिनी ड्राइव-इन थिएटर बनाया था। यह थिएटर उन लोगों के लिए बनाया जो सिनेमा हॉल की सीट पर बैठने में असहज महसूस करते थे। ड्राइव-इन मूवी थिएटर खुली जगह में बनाया जाता है जैसे पार्क, बीच या मैदान पर। यहां एक स्क्रीन लगी होती है जो हर तरह की गाड़ी से दिख सकती है।

आज भले ही आपके घर में आपका अपना होम थिएटर हो या ओटीटी के जरिए सिनेमा आपकी हथेली पर हो या ड्राइव-इन थिएटर का ऑप्शन हो लेकिन फिल्म मेकर्स ऑडिएंस को कभी नहीं कहेगी ‘हम आपके हैं कौन?‘ तो चलिए आज देख आइए 75 रुपए में फिल्म क्योंकि ‘पिक्चर अभी बाकी है मेरे दोस्त।’

ग्रैफिक्स: सत्यम परिडा

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