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महिला जजों की दरकार:न्याय के मंदिर में सिर्फ मूर्ति, बिना देवी कैसे मिलेगा पीड़िताओं को इंसाफ? जानें कब तक मिलेगी देश को पहली महिला सीजेआई

नई दिल्ली5 दिन पहलेलेखक: दीप्ति मिश्रा
  • वर्तमान में सुप्रीम कोर्ट में 4 और हाईकोर्ट में 77 महिलाएं जज हैं
  • 25 हाईकोर्ट में जजों के कुल 1098 पद हैं, जिनमें से 465 खाली हैं

देश भर में महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों का ग्राफ साल दर साल बढ़ता ही जा रहा है। दरिंदे लड़कियों, कामकाजी महिलाओं से लेकर दुधमुंही बच्ची और 90 की दहलीज पर कदम रख चुकी बुजुर्ग तक को अपनी घिनौनी मंशा का शिकार बनाने से नहीं हिचकते हैं। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (National Crime Records Bureau) की रिपोर्ट के मुताबिक, देश में हर दिन 88 से अधिक महिलाओं का बलात्कार हो रहा है।

दरिंदगी की शिकार हुईं बहादुर लड़कियां हिम्मत दिखाती हैं। अपने लिए इंसाफ मांगने अदालत के दरवाजे खटखटाती हैं, लेकिन कई बार वहां भी न्याय मिलने की जगह उन्हें ही कटघरे में खड़ा होना पड़ जाता है। हाल ही में अदालतों ने महिला अपराध से जुड़े मामलों में पीड़िता से राखी बंधवाने की शर्त पर रिहाई, कपड़ों के ऊपर से छूना छेड़छाड़ नहीं, नाबालिग लड़की का हाथ पकड़कर अश्लील हरकत करना यौन शोषण नहीं जैसे कई अजब-गजब फैसले सुनाए। इन फैसलों पर खुद सुप्रीम कोर्ट को दखल देना पड़ा। इस बीच, देश के अटॉर्नी जनरल ने यौन शोषण के मामलों में संवेदनशीलता बरतने और महिला जजों की संख्या बढ़ाने की सलाह दी। आइए जानते हैं कि अदालतों में महिला जजों की स्थिति...

वे फैसले जिनसे न्यायपालिका पर उठे सवाल
1. स्किन टू स्किन टच ही यौन शोषण
इस साल जनवरी में बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर पीठ की न्यायमूर्ति पुष्पा गनेरीवाला ने बाल यौन शोषण से जुड़े एक मामले में कहा था कि किसी नाबालिग के कपड़े उतारे बिना उसके स्तन छूना यौन हमला नहीं कहा जा सकता। स्किन टू स्किन टच यानी त्वचा से त्वचा का संपर्क होने पर ही यौन शोषण माना जाएगा। साथ ही आरोपी को बरी कर दिया। इस फैसले की जमकर आलोचना हुई, जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने संज्ञान लेते हुए फैसले पर रोक लगा दी।

2. लड़की को पकड़ना और कपड़े उतारना अकेले आदमी के वश का नहीं
बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर पीठ की न्यायमूर्ति पुष्पा गनेरीवाला ने दुष्कर्म के एक अन्य मामले में कहा कि पीड़िता का मुंह बंद करना, बिना किसी हाथापाई के एक ही समय में उसके और अपने कपड़े उतारना अकेले आदमी के वश का नहीं। साथ ही आरोपी को बरी कर दिया। बता दें कि यह विवादित टिप्पणी उन्होंने यवतमाल निवासी 26 वर्षीय सूरज कासकर की सजा के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान की। पीड़िता की मां ने जुलाई, 2013 में अपने पड़ोसी के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई, जिसमें कहा कि आरोपी ने उनकी 15 वर्षीय बेटी के साथ दुष्कर्म किया।

3. पीड़िता से राखी बंधवाने की शर्त पर रिहाई
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर बेंच ने छेड़छाड़ के मामले में आरोपी को पीड़िता से राखी बंधवाने की शर्त पर जमानत दे दी। पड़ोस में रहने वाली महिला के घर में घुसकर छेड़छाड़ करने के आरोप में जेल में विक्रम बागरी ने बेंच में जमानत अर्जी दायर की थी। इस याचिका पर सुनवाई करते हुए अदालत ने उसे सशर्त जमानत दे दी। हालांकि, हंगामा होने पर सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले को पलट दिया।

सुप्रीम कोर्ट ने लिया संज्ञान, कहा- प्रतिष्ठा को न करें चूर-चूर
सुप्रीम कोर्ट ने यौन उत्पीड़न के मामले में देश की कई अदालतों के विवादित फैसलों पर संज्ञान लिया। सुप्रीम कोर्ट ने नाराजगी जाहिर करते हुए हाईकोर्ट व निचली अदालतों के जजों को किसी भी प्रकार के स्टीरियोटाइपिंग से बचने को कहा। साथ ही कहा कि न्यायाधीशों को इस तरह के मामलों में संवेदनशीलता बरतने की जरूरत है। ऐसा कोई भी शब्द या बात, बोली या लिखी नहीं जानी चाहिए, जिससे पीड़िता की पवित्रता और प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचती हो।

अटॉर्नी जनरल बोले- महिलाओं के लिए रास्ता अभी भी पथरीला
देश के अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल (K K Venugopal) ने यौन उत्पीड़न के मामलों में दिए गए इन फैसलों पर कहा कि महिलाओं के लिए रास्ता अभी काफी संकरा और पथरीला है। उन्होंने कहा कि भारतीय न्यायपालिका को यौन शोषण के मामलों में अदालतों के असंवेदनशील रवैये को बदलने के लिए महिला जजों की संख्या बढ़ाने की आवश्यकता है।

सुप्रीम कोर्ट में कब बनी पहली महिला जज?
सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) के गठन के 40 साल बाद वर्ष 1989 में न्यायमूर्ति एम फातिमा बीवी पहली महिला जज नियुक्ति की गईं थी। यह न्याय के क्षेत्र में बराबरी का बड़ा कदम था। फातिमा बीवी ने न्यायपालिका में उच्च पद पर पहली मुस्लिम महिला होने का भी मुकाम हासिल किया।

अब तक सिर्फ 11 महिला जज, सीजेआई एक भी नहीं
सुप्रीम कोर्ट में अब तक कुल 256 जजों की नियुक्ति हुई। इनमें फातिमा बीवी, सुजाता मनोहर, रूमा पाल, ज्ञान सुधा मिश्रा, रंजना देसाई, आर भानुमति, इंदु मल्होत्रा, इंदिरा बनर्जी, बीवी नागरत्ना, हिमा कोहली और बेला त्रिवेदी समेत 11 महिला जजों के नाम शामिल हैं। वहीं अब तक केवल दो महिलाएं- न्यायमूर्ति रूमा पाल और न्यायमूर्ति आर. भानुमति सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम का हिस्सा रहीं हैं, जबकि अब तक एक भी महिला सीजेआई नहीं बनी। फिलहाल, सुप्रीम कोर्ट में चार महिला जज हैं, जिनमें से बीवी नागरत्ना, हिमा कोहली और बेला त्रिवेदी ने 31 अगस्त को शपथ ली है।

न्याय के मंदिर में देवियों की कमी

देश में कुल 25 हाईकोर्ट हैं, जहां महिलाओं की संख्या कमोबेश सुप्रीम कोर्ट जैसी ही है। केंद्रीय विधि और न्याय मंत्रालय के मुताबिक, हाईकोर्ट में जजों के कुल 1098 स्वीकृत पदों में से 633 पद ही अभी भरे हैं और 465 पद खाली पड़े हैं। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, वर्तमान में अलग-अलग हाईकोर्ट में सिर्फ 77 महिलाएं जज हैं। इनमें सबसे अधिक संख्या मद्रास हाईकोर्ट में 13, बॉम्बे हाईकोर्ट में आठ, पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट में सात, दिल्ली और कर्नाटक में छह-छह, गुजरात में पांच और केरल में चार है। हैरान करने वाली बात यह है कि मेघालय, मणिपुर, त्रिपुरा, बिहार और उत्तराखंड हाईकोर्ट में एक भी महिला जज नहीं हैं।

महिला सीजेआई: अभी करना होगा और इंतजार
वर्तमान में वरीयता के आधार पर न्यायाधीशों पर एक नजर डालें, तो पता चलता है कि वर्ष 2027 तक किसी भी महिला के प्रधान न्यायाधीश बनने की संभावना नहीं है। वरिष्ठता के आधार पर सीजेआई एनवी रमना के बाद 8 नवंबर, 2022 को न्यायमूर्ति उदय उमेश ललित नए मुख्य न्यायाधीश बन सकते हैं। इसके बाद 10 नवंबर, 2024 को न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ उनके बाद न्यायमूर्ति संजीव खन्ना, न्यायमूर्ति बीआर गवई और न्यायमूर्ति सूर्यकांत देश के मुख्य न्यायाधीश बन सकते हैं। जस्टिस बीवी नागरत्ना 2027 में देश की पहली महिला चीफ जस्टिस बन सकती हैं।

सोर्स: द बार काउंसिल ऑफ इंडिया
सोर्स: द बार काउंसिल ऑफ इंडिया

"एलएलबी में दाखिला लेने वालों में लड़कों की तुलना में लड़कियां कम होती हैं। उसकी वजह है कि 4 से 5 साल की प्रैक्टिस और जल्दी से मौके न मिलने के चलते लड़कियों के परिवार वाले राजी नहीं होते हैं। पढ़ाई पूरी करने के बाद ज्यादातर फी​मेल ज्यूडिशरी की तैयारी या फिर ​कॉरपोरेट में काम करने लगती हैं। वर्क कल्चर अच्छा न होने के चलते प्रैक्टिस करने वाली महिलाओं में से भी कुछ इस पेशे को छोड़ देती हैं। यह समस्या लोअर कोर्ट में अधिक होती है। अच्छी बात यह है कि वकालत के पेशे में धीरे-धीरे महिलाओं की संख्या बढ़ रही है।"
-रंजन तोमर, अधिवक्ता, दिल्ली हाईकोर्ट

"लॉ की पढ़ाई कर इंटर्नशिप के लिए आने वाले छात्रों में 70 फीसदी संख्या पुरुषों की और 30 फीसदी संख्या महिलाओं की होती है। इंटर्नशिप करने वाली कुल लड़कियों में से केवल 5 फीसदी लड़कियां ही वकालत करती हैं। इसके अलावा अन्य 20 फीसदी महिलाएं पोर्टफोलियो बनाने, सरकारी विभागों में अधिकारी के तौर पर, कॉरपोरेट आदि पर काम करती हैं, जबकि अन्य इस क्षेत्र को छोड़ देती हैं।"
-मनीष भदौरिया, अधिवक्ता, कड़कड़डूमा कोर्ट

महिला जज: क्या भावुक होकर लेतीं हैं फैसले?
महिलाओं को जजमेंटल तो माना जाता है, लेकिन फैसला लेने वाला नहीं है। इसके पीछे की एक धारणा है कि महिलाएं भावुक होकर फैसले लेती हैं। उदाहरण के तौर पर राजस्थान की झुंझुनू अदालत में जस्टिस नीरजा दधीच ने तीन साल की बच्ची से रेप के मामले में 20 दिन के भीतर सुनवाई पूरी कर फांसी की सजा सुनाई थी। यह फैसला सुनाते हुए वे काफी भावुक हो गईं थीं। इस दौरान उन्होंने एक कविता- ''एक तीन साल की बेटी पर यह कैसा अत्याचार हुआ'' सुनाई थी। इस फैसले की काफी प्रशंसा हुई थी।

सवाल अब भी बाकी?
महिलाओं से रेप/छेड़छाड़ जैसे संवेदनशील मामलों में फैसलों के लिए महिला जज का मुंह जोहा जा रहा है, लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या वास्तविकता में महिला जज इन मुद्दों पर संवेदनशीलता अपना रहीं हैं और क्या पुरुष जजों को रेप जैसे मामलों के प्रति थोड़ा और संवेदनशील होने की जरूरत नहीं?

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