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पावर और नशे का फील देती है रैगिंग:अश्लील-क्रूर हरकतों से मजा लेते हैं सीनियर्स, इंजीनियरिंग से ज्यादा मेडिकल कॉलेजों में रैगिंग

नई दिल्ली13 दिन पहलेलेखक: संजय सिन्हा
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‘14 नवंबर की तारीख और बाल दिवस का दिन। वह रोज की तरह क्लास अटेंड करने के बाद 12.30 बजे कॉलेज के मेन गेट के पास बैठी थी, तभी वहां ग्रेजुएशन सेकेंड ईयर का स्टूडेंट अभिषेक नाहक उर्फ बंटी पहुंचा और बियर पीने लगा। अभिषेक ने दूसरे स्टूडेंट्स को बुलाया और लड़की की रैगिंग शुरू कर दी। वह गंदे इशारों के साथ गालियां भी देने लगा।

अभिषेक के बोलने पर एक जूनियर छात्र ने पहले ‘आई लव यू’ कहा। लड़की के गिड़गिड़ाने और मना करने पर भी उसने कई बार किस किया। वहां मौजूद कई स्टूडेंट ने इस पर तालियां बजाईं, वीडियो बनाए और फोटो लीं।

छात्रा ने निकलने की कोशिश की लेकिन उसे जबरन 3 घंटे तक बैठाकर रखा। अभिषेक ने कहा कि मुंह खोला तो जान से मार देंगे। वह किसी तरह उनके चंगुल से निकल तो गई मगर सीनियर्स ने वीडियो और फोटो को वॉट्सऐप ग्रुप्स और फेसबुक पर डाल दिया।’

ये सभी बातें ओडिशा के बेरहामपुर में बड़ा बाजार पुलिस स्टेशन इंचार्ज द्वारा सुपरिंटेंडेंट को भेजी गई रिपोर्ट में है।

दैनिक भास्कर के पास इस रिपोर्ट की कॉपी है। रैगिंग की यह घटना ओडिशा के बेरहामपुर के विनायक आचार्य कॉलेज की है। मामले में पांच आरोपियों को जेल और दो को बाल सुधार गृह भेजा गया है जिसमें मुख्य आरोपी अभिषेक उर्फ बंटी भी शामिल है।

विनायक आचार्य कॉलेज के YRC को-ऑर्डिनेटर डॉ. चितरंजन मोहंती ने बताया कि आरोपी 12 स्टूडेंट्स को कॉलेज से निकाल दिया गया है।

कुछ महीने पहले ही ओ़डिशा के भुवनेश्वर और बोलांगीर जिले में दो लड़कियों ने रैगिंग के कारण सुसाइड कर लिया था। बोलांगीर मेडिकल कॉलेज में हरियाणा की रहने वाली फर्स्ट ईयर की स्टूडेंट थी। उसने सुसाइड नोट में लिखा कि तीन सीनियर्स उसे परेशान करते थे। उन्होंने वॉट्सऐप ग्रुप बना रखा था, वो रात के 2 बजे आ धमकते, टॉर्चर करते। सुसाइड से पहले लड़की ने मां को वीडियो कॉल कर बताया था कि सीनियर्स के टॉर्चर को और बर्दाश्त नहीं कर सकती।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश, UGC की गाडलाइंस और एंटी रैगिंग कमेटी बनाने के बाद भी रैगिंग रुक नहीं पा रही। सरकार या किसी एजेंसी के पास रैगिंग को लेकर कोई आंकड़ा उपलब्ध नहीं है। हालांकि, घटनाएं बताती हैं कि स्टूडेंट मुश्किल दौर से गुजर रहे हैं। इसकी गवाही ये आंकड़े देते हैं।

2500 RTI डालने के बाद भी कॉलेजों में एंटी रैगिंग कमेटी नहीं है एक्टिव

सोसाइटी अगेंस्ट वॉयलेंस इन एजुकेशन के फाउंडर (SAVE) डॉ. कुशल बनर्जी रैगिंग को लेकर 2500 RTI दाखिल कर चुके हैं। वह बताते हैं कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद UGC ने एंटी रैगिंग कमेटी की रूपरेखा बनाई।

इसमें फैकल्टी, स्टूडेंट, गार्जियन, पुलिस, मीडिया पर्सन और NGO को होना चाहिए। न तो कॉलेजों में एंटी रैगिंग कमेटी बनी और न ही UGC की गाइडलाइंस का पालन हुआ। फर्स्ट ईयर के स्टूडेंट के लिए अलग हॉस्टल नहीं बने। न ही उनके लिए सिक्योरिटी गार्ड होता है या CCTV कैमरे लगे होते हैं।

इंटरनल कंप्लेन पर नहीं लिया जाता एक्शन

डॉ. कुशल कहते हैं कि इंटरनल कंप्लेन होने पर भी कॉलेज प्रबंधन जान-बूझकर एंटी रैगिंग कमेटी की बैठक नहीं बुलाते। उन्हें लगता है कि बाहर के लोगों को पता चल जाएगा। कमेटी के सारे सदस्यों को पता चल जाएगा। डॉ. कुशल कहते हैं कि किसी कॉलेज में अगर 100 नए छात्र दाखिला लेते हैं तो 5 छात्र ऐसे होते हैं जो कहते हैं कि हम रैगिंग नहीं करेंगे। 10 छात्र कहते हैं हमारे साथ रैगिंग हुई है तो हम करेंगे। अगर इन 10 छात्रों को सेंसेटाइज किया जाए तो कॉलेज को रैगिंग फ्री किया जा सकेगा।

रैगिंग के पीछे की साइकोलॉजी क्या होती है? कैसे यह काम करती है? इसे समझने से पहले ये दो उदाहरण देखें।

डॉ. कुशल बताते हैं कि रैगिंग आइसोलेटेड इंसिडेंट नहीं है। इराक में अबू गैरब जेल में कैदियों के साथ जो अमानवीय व्यवहार हुआ था, वह भी इसी कैटेगरी में आता है। यहां पर वर्चस्व का मामला होता है।

रैगिंग करने वाले दूसरों पर निकालते हैं भड़ास

डॉ. कुशल बताते हैं कि जो रैगिंग करते हैं वो मेंटली कमजोर होते हैं। वो अपनी फ्रस्ट्रेशन निकालने और अपना दबदबा बनाने के लिए ये काम करते हैं। लेकिन मंत्री या किसी बड़े अफसर का बेटा आ जाए तो वे रैगिंग करने की जुर्रत नहीं करते।

पावर मिलने पर होता है गलत इस्तेमाल

सीनियर स्टूडेंट बनने पर कैसे पावर मिलने का अनुभव होता है और फिर चीजें कैसे कंट्रोल से बाहर होती हैं। इसे सैमफोर्ड प्रिजन एक्सपेरिमेंट से समझा जा सकता है। अमेरिका की सैमफोर्ड यूनिवर्सिटी में कुछ दोस्तों ने साइकोलॉजिकल गेम खेला। इसमें कुछ को कैदी और कुछ को गार्ड बनना था। गेम के दौरान ही फ्रेंड्स बने गार्ड वास्तविक रूप से गार्ड के रूप में व्यवहार करने लगे। वो कैदी बने छात्रों को पीटने लगे। आखिरकार इसे रोकने के लिए पुलिस बुलानी पड़ी।

इस उदाहरण से पता चला कि जब किसी व्यक्ति को पावर मिल जाती है तो उसके कंट्रोल से बाहर जाने का रिस्क बढ़ जाता है।

रैगिंग को लेकर जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के सेंटर ऑफ सोशल मेडिसिन एंड कम्यूनिटी हेल्थ की ओर से एक साइकोलॉजिकल स्टडी करवाई गई। स्टडी में कई बातें चौंकाने वाली रहीं।

नशे का जैसा मजा देती है रैगिंग, खुद को रोकना होता है मुश्किल

स्टडी के अनुसार, तमिलनाडु के एक इंजीनियरिंग कॉलेज में जब रैगिंग के कारणों पर बात हुई तो एक छात्र ने इसे पावर का नशा कहा।

वहीं, दूसरे छात्र ने कहा कि रैगिंग एक तरह से सीनियॉरिटी और सुपीरियॉरिटी दिखाना है। जूनियर्स को अपने कंट्रोल में रखना और रोकटोक लगाना, यही टारगेट होता है। सीनियर्स अपने जूनियर्स के साथ वो ही करना चाहते हैं जो उन पर गुजरा।

टिफिन चुराना, किताबें छिपाना… ऐसे पड़ते हैं रैगिंग के बीज

रैगिंग के बीज स्कूल से ही पड़ने शुरू हो जाते हैं। जैसे किसी का टिफिन चुराकर खाना। बैग से किताबें निकाल लेना। ग्रुप बनाकर मारपीट करना, टीचर के साथ गाली-गलौच करना।

जब ये बच्चे कॉलेज पहुंचते हैं तो वहां रैगिंग शुरू कर देते हैं। कई बार पेरेंट्स इस बात को लेकर चिंतित रहते हैं कि कहीं मेरे बच्चे के साथ रैगिंग तो नहीं हो रही, लेकिन जब उनके खुद के बच्चे सीनियर हो जाते हैं तो कभी यह पता लगाने की कोशिश नहीं करते कि क्या उनका बच्चा दूसरे स्टूडेंट्स की रैगिंग तो नहीं कर रहा।

आगे बढ़ने से पहले 17 साल पहले की एक घटना याद करते हैं जो आपको झकझोर कर रख देगी। इस घटना के बाद ही रैगिंग को गंभीर मसला माना गया।

क्या मेडिकल कॉलेजों में रैगिंग अधिक हो रही?

डॉ. कुशल कहते हैं कि इस तरह का कोई विश्वसनीय आंकड़ा नहीं दिया जा सकता। AICTE (ऑल इंडिया काउंसिल फॉर टेक्निकल एजुकेशन) की सख्ती की वजह से इंजीनियरिंग कॉलेजों में रैगिंग पर काफी हद तक लगाम लगी है, लेकिन मेडिकल कॉलेजों की स्थिति बुरी है। भारत में हर तीन में से एक मेडिकल कॉलेज रैगिंग के बारे में रिपोर्ट करते हैं। यानी 75 प्रतिशत मेडिकल कॉलेजों में रैगिंग हो रही है। 2019 तक रैगिंग कंट्रोल में था लेकिन अब स्थितियां ठीक नहीं हैं। इसका मुख्य कारण UGC का उदासीन रवैया होना है।

एक महत्वपूर्ण कारण यह भी है कि कोविड के समय में लगभग दो सालों तक इंजीनियरिंग, एग्रीकल्चर, फार्मेसी सहित सभी तरह के शैक्षणिक संस्थान बंद थे। ऑनलाइन पढ़ाई की जा रही थी। लेकिन इस दौर में भी मेडिकल कॉलेज खुले रहे। हॉस्टल में रहकर मेडिकल स्टूडेंट पढ़ाई करते रहे। इस वजह से भी मेडिकल कॉलेजों में रैगिंग के केस ज्यादा आए।

नहीं काम करता एंटी रैगिंग नेशनल हेल्पलाइन नंबर

रैगिंग के खिलाफ कैंपेन चलाने वाले IIT कानपुर के एलुमिनी गौरव सिंघल कहते हैं कि एंटी रैगिंग नेशनल हेल्पलाइन नंबर काम नहीं करता। हेल्पलाइन पर कंप्लेन दर्ज नहीं होती। प्रताड़ित स्टूडेंट्स को कॉलेज के प्रिंसिपल या डीन के पास जाने को कहा जाता है। जो मॉनिटरिंग एजेंसी थी उसे छह महीने पहले चेंज किया गया है।

पहले इसे एक एक्टिविस्ट राज कचरू चलाते थे जिनके खुद के बच्चे की रैगिंग के कारण हत्या कर दी गई थी। जब इनका मामला सुप्रीम कोर्ट गया तो हेल्पलाइन के लिए मॉनिटरिंग एजेंसी बनाई गई। उनके हटने के बाद हेल्पलाइन काम नहीं कर रही। हेल्पलाइन में मैन पावर भी कम कर दी गई और कॉल करने पर नंबर बिजी बताता है। किसी नेता ने अपने रिश्तेदार को यहां बिठा दिया

इस संबंध में एक ऑडियो भी दैनिक भास्कर के पास है। ऑडियो में लड़का कह रहा है कि 'मेरी रैगिंग की जा रही है। सीनियर्स परेशान कर रहे हैं। हेल्पलाइन को फोन किया तो कहा गया कि शिकायत करने से क्या होगा। सीनियर्स तुम्हें फिर से परेशान करेंगे। प्रिंसिपल के पास जाओ। हेल्पलाइन वाले भी नहीं सुनते'। यह ऑडियो एंटी रैगिंग एक्टिविस्ट गौरव सिंघल ने दिया है।

कार्रवाई नहीं होने पर बढ़ती है हिम्मत

गौरव सिंघल कहते हैं कि ‘यह अभी शुरुआत है। आने वाले समय में स्थिति और गंभीर होगी। बीच में हालात सुधरे थे, लेकिन शिकायत के बाद भी अक्सर कॉलेज मैनेजमेंट एक्शन नहीं लेता।

हेल्पलाइन पर छात्रों का दर्द नहीं सुना जाता, जिससे सीनियर्स का हौसला बढ़ता है। हकीकत यह है कि भारत के 5 प्रतिशत कॉलेजों में भी नियम का पालन नहीं किया जा रहा। सिंघल कहते हैं कि यह भी देखा जा रहा है कि कैसे रैगिंग के नाम पर छात्रों को सेक्शुअल एक्टिविटी में जबरन धकेला जाता है।’ गौरव कहते हैं स्टूडेंट को एंटी रैगिंग एफिडेविट देनी होती है जिसमें उनके पेरेंट्स का एड्रेस होता है। अगर जूनियर स्टूडेंट को इसका एक्सेस दिया जाए तो वो किसी तरह की परेशानी में पड़ने पर सीनियर्स के पेरेंट्स को फोन कर बता सकेंगे। सीनियर्स को हमेशा यह लगता है कि जो वो कर रहे हैं वह उनके घर वालों को पता नहीं चलेगा। जब जूनियर्स फोन कर सीनियर्स की करतूत उनके मां-बाप को बताएंगे तो आगे से ऐसा नहीं कर पाएंगे।

पहले भी रैगिंग होती थी, पर इतनी भयानक नहीं

कल्पना चावला गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज, करनाल के कम्यूनिटी मेडिसिन के HOD डॉ. राजेश गर्ग कहते हैं 20 साल पहले मैंने भी MBBS की पढ़ाई की थी, लेकिन तब ऐसी रैगिंग नहीं होती थी।

किसी सीनियर ने दो थप्पड़ मार लिए या बैचमेट जा रही है तो कहा जाता कि नाम पूछकर आओ। लेकिन फिजिकल होना, सेक्शुअल अब्यूज होना या सुसाइड के लिए मजबूर करने जैसी चीजें नहीं होती थीं।

नागपुर OBGY के प्रेसिडेंट डॉ. वर्षा धावले बताती हैं कि 1980 में उन्होंने MBBS की पढ़ाई की थी, लेकिन तब रैगिंग के नाम पर सीनियर्स को रेस्पेक्ट देने की ही बात कही जाती थी।

PG के छात्रों की भी होती है रैगिंग

डॉ. वर्षा धावले बताती हैं कि महाराष्ट्र में केवल MBBS ही नहीं, PG के छात्रों की भी रैगिंग होती है। यह कुछ वैसा ही जैसे घर में नई बहू आती है तो उसे बहुत सारा काम दिया जाता है और फिर सब किनारा कर लेते हैं। सिगरेट लाने, अल्कोहल लाने या और भी दूसरे गलत काम करने के लिए सीनियर्स दबाव बनाते हैं। उन्हें जब भी मौका मिलता है उसका गलत इस्तेमाल करते हैं।

रैगिंग रोकने के लिए कई कदम उठाए गए हैं। UGC की गाइडलाइन है जिसे सभी कॉलेजों को लागू करना है। आइए जानते हैं क्या हैं ये स्टेप-

डॉ. गर्ग कहते हैं सुप्रीम कोर्ट के जजमेंट के बाद अगर इंप्लीमेंटेशन पर ध्यान दिया जाता तो रैगिंग की घटनाएं रुक सकती थीं। इसकी शुरुआत घर से होनी चाहिए।

परिस्थितियां जब ऐसी बनें

  • जब स्टूडेंट का दाखिला होता है तो उसे घुलने-मिलने में समय लगता है। जब वो रैगिंग का शिकार होता है और घर पर बताता है तो पेरेंट्स कहते हैं बेटा बड़ी मुश्किल से एडमिशन मिला है। रैगिंग के नाम पर थोड़ा-बहुत हंसी-मजाक चलता ही है। सब ठीक हो जाएगा, लेकिन कई बार तब तक बहुत देर हो चुकी होती है।
  • तब क्या करना चाहिए: पहले तो पेरेंट्स के लिए भी सेंसेटाइजेशन कार्यक्रम रखना चाहिए। फोन पर स्टूडेंट रैगिंग के बारे में बात करे तो इसे गंभीरता से लें। कॉलेज मैनेजमेंट से पेरेंट्स को मिलते रहना चाहिए।
  • हॉस्टल में क्या कुछ हो रहा पता नहीं चलता। जूनियर छात्रों पर सीनियर्स दबाव बनाते हैं। हॉस्टल की बालकनी या मेन गेट पर भी CCTV कैमरे नहीं होते, इसलिए रैगिंग पकड़ में नहीं आती।
  • तब क्या करना चाहिए: डॉक्टरों की टीम बनाई जाए। हॉस्टलों में लगातार छापे मारे जाएं। कभी शाम 7 तो कभी रात 8 बजे भी अटेंडेंस ली जाए। रैगिंग गलत चीज है इसके बारे में सभी छात्रों को मैसेज जाना चाहिए।
  • सीनियर्स अपनी मनमानी करते हैं। रैगिंग हो रही है इसका पता ही नहीं चलने देते। पीड़ित स्टूडेंट डर के मारे एंटी रैगिंग कमेटी को भी नहीं बताते। वो जानते हैं कि सीनियर्स को पता चला तो उनके साथ और ज्यादा रैगिंग होगी।
  • तब क्या किया जाए: हॉस्टल में फ्लोर परफेक्ट का कांसेप्ट लाना चाहिए। फ्लोर परफेक्ट उन सीनियर्स को बनाना चाहिए जो हॉस्टल में होने वाली रैगिंग की रिपोर्ट कर सकें। अगर रैगिंग हो रही है तो तत्काल अलर्ट बटन दबाएं और मैनेजमेंट को सूचित करें। ऐसा करके रैगिंग रोकी जा सकेगी।

चलते-चलते...एक ऐसे पिता से मिलवाते हैं जिन्होंने रैगिंग के चलते अपने 19 साल के बेटे को खो दिया, और फिर उन्होंने शुरुआत की एंटी रैगिंग कैंपेन की। ये हैं राज कचरू जो एन्वायरमेंट मैनेजमेंट के प्रोफेसर रहे। 2009 में हिमाचल प्रदेश मेडिकल कॉलेज के छात्र उनके बेटे अमन सत्य कचरू की रैगिंग के कारण मौत हो गई थी। राज कचरू ने बेटे को खोने के बाद ‘Amanmovement.org’ वेबसाइट के जरिए एक अभियान शुरू किया।

डॉ. कचरू बताते हैं कि हाल में कानपुर मेडिकल कॉलेज से एक डॉक्टर का फोन आया। उन्होंने बताया कि वह रैगिंग के शिकार हैं। उनकी उम्र 55 वर्ष है, बेटा भी डॉक्टर है। उन्होंने लंबे समय तक प्रैक्टिस करने के बाद PG करने की सोची। जब उन्होंने दाखिला लिया तो उनके साथ भी रैगिंग होने लगी। सेकेंड ईयर के स्टूडेंट कमेंट करते, खाने की थाली बेसिन में रखने को कहते, कहते कि अब बूढ़े होने की उम्र में पढ़ने आए हो। कचरू कहते हैं इसका मतलब साफ है कि रैगिंग मानसिकता से जुड़ी चीज है। यह भी मैसेज है कि मां-बाप को बच्चे को कॉलेज भेजकर निश्चिंत नहीं होना चाहिए। जैसे स्कूल भेजते समय बच्चे की खोज-खबर रखते हैं वैसे ही कॉलेज में पढ़ रहे बच्चे का भी ध्यान रखें।

ग्रैफिक्स: सत्यम परिडा

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