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अर्थी से बनती है कुल्फी की डंडी, सूप-पंखे:चिता की अधजली लकड़ी से जलता घरों-होटलों का चूल्हा, श्मशान की राख से बनतीं अगरबत्तियां

वाराणसी से दिनेश मिश्र, संजय सिन्हा19 दिन पहले
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मृत्यु हमारे जीवन का शाश्चत सत्य है। मगर, क्या मृत्यु खूबसूरत भी हो सकती है। अगर आप बनारस के मणिकर्णिका घाट पर कभी जाएं तो आपको यह जवाब आसानी से मिल जाएगा, जहां मृत्यु को जीवन का आखिरी पड़ाव मानकर उसे भी उत्सव की तरह माना जाता है।

तो आज बात करते हैं इसी मणिकर्णिका घाट पर आने वाले शवों और उनके दाह-संस्कार के बाद बची हुई अर्थियों के बांस, अधजली लकड़ी, गीले-सूखे फूल, कपड़े, गहने और राख के रिसाइकिल होने की प्रक्रिया के बारे में, जिसकी पड़ताल भास्कर वुमन ने मणिकर्णिका घाट पर 24 घंटे बिताने के दौरान की। यह भी जानने और समझने की कोशिश की कि आखिर मणिकर्णिका घाट पर पहुंचते ही हर चीज पवित्र क्यों मानी जाती है? आइए-हम आपको इसी सफर से रूबरू कराते हैं।

काशी का अनादि तीर्थ कहे जाने वाले मणिकर्णिका घाट पर एक पत्थर लगा हुआ है, जिस पर स्कंदपुराण का श्लोक लिखा है, जो इस घाट के बारे में बताता है।

मरणं मंगलं यत्र सफलं यत्र जीवनम, स्वर्गस्त्रिणायते यत्र सैषा श्रीमणिकर्णिका।

सचैल मादौ सस्नाय चक्र पुष्करिणीजले, संतर्प्य देवांस पितृन्ब्राह्मणांश्र्व तथार्थिन।

यानी जिस स्थान पर मृत्यु मंगलकारी हो, जीवित रहना सफल हो, स्वर्ग सुख तिनके के समान हो, वह स्थान मणिकर्णिका है। यहां पर सबसे पहले स्नान करना चाहिए। उसके बाद देवता-पितरों, गुरु-आचार्य को संतुष्ट करना चाहिए।

कहते हैं भगवान शिव के कुंडल घाट के पास एक कुंड में गिरे थे, तभी से इसका नाम मणिकर्णिका पड़ा। वैसे एक कथा यह भी है कि भगवान शिव ने इसी जगह माता सती के पार्थिव शरीर का दाह संस्कार किया, इसीलिए मणिकर्णिका को महाश्मशान भी कहते हैं।

दोपहर 1 बजे

हमारी यात्रा शुरू हुई अस्सी घाट से जो दोपहर 1 बजे मणिकर्णिका घाट पर पहुंची।

मणिकर्णिका घाट पर चिता की आग कभी नहीं बुझती, दिन हो या रात 24 घंटे यहां अर्थियां जलती रहती हैं और आसमान की तरफ उड़ता धुआं आत्मा के परमात्मा में विलीन होने जैसा लगता है। यहां मृत्यु मातम नहीं उत्सव है। यहां रहने वाले लोगों की मानें तो मणिकर्णिका पर औसतन रोज 100 दाह-संस्कार होते हैं। कुछ लोग तो इन शवों की संख्या 250 तक बताते हैं।

3 बजे

हमें मणिकर्णिका घाट पर बैठे-बैठे हरिश्चंद्र घाट दिखाई दे रहा है। जहां भीड़ कम है और गोल चबूतरे पर एक चिता जलती नजर आ रही है। उसी कतार में दो बुझी हुईं चिताएं भी हैं।

चिताओं के पास पड़ी फूल मालाओं को बकरियां खा रही हैं, जिन्हें हम देख सकते हैं। वहीं, लोहे की बेंच पर दाह-संस्कार के बाद परिजन भी बैठे नजर आते हैं।

दाहिनी ओर एक मंदिर है जिसमें राजा हरिश्चंद्र, तारामती और रोहित की मूर्तियां हैं।

मणिकर्णिका घाट पर मौजूद एक साधु बताते हैं कि राजा हरिश्चंद्र का जब राजपाट चला गया तो वे कालू डोम के यहां नौकरी करने लगे, जिन्होंने कहा था कि मणिकर्णिका घाट पर आने वाले हर शव का दाह-संस्कार तभी होगा, जब ‘टैक्स’ चुकाया जाएगा। जब उनके बेटे रोहित की मृत्यु हुई तो उनकी पत्नी तारामती शव लेकर उसी श्मशान पहुंचीं, जहां राजा हरिश्चंद्र नौकरी कर रहे थे। उन्होंने भी अपने बेटे के अंतिम संस्कार करने के लिए पत्नी से टैक्स यानी दान-दक्षिणा मांगा। तभी से मणिकर्णिका घाट पर शवों का अंतिम संस्कार बिना दान के पूरा नहीं होता।

अब देखते हैं मणिकर्णिका घाट के आसपास का माहौल, जहां साफ-सफाई की जा रही है। नमामी गंगे के सफाईकर्मी घाट पर फैले कचरे को बटोर रहे हैं।

शाम 5 बजे

शाम ढल रही है। सूरज की किरणें गंगा की जलधारा पर पड़कर बिखर रही हैं। यहां मेले सा माहौल है। कहीं मातम या सन्नाटे का नामोनिशान नहीं। जिस फ्यूनरल टूरिज्म की बात सुनने में आती है उसके साक्षात दर्शन यहां होते हैं।

इस घाट की सीढ़ियां दूसरे घाटों से अलग हैं। गंगा की ओर मुख किए हुए घाट का जो हिस्सा दिख रहा, वो दोनों ओर से किसी बड़े चौकोर प्लेटफॉर्म जैसे हैं।

बीच में सीढ़ियां हैं चौड़ी और सपाट। एक ओर तीन चिताएं जल रही हैं। उनसे आग धधक रही है। आग की लपटें श्मशान घाट में बनी बिल्डिंग के पहले तल्ले तक जा रही है। हवा में शवों के जलने की गंध है। बुझ चुकी एक चिता की राख को पाइप के पानी से धोकर गंगा में डाला जा रहा है। चिताओं की इस राख को धोने का ये प्रॉसेस पूरे दिन जारी रहता है। जैसे-जैसे शव आते हैं, वैसे ही फूल, कपड़े, बांस सबके अलग-अलग ढेर बनते जाते हैं। फिर सुबह 9 बजे तक पूरे घाट की साफ-सफाई होती है।

घाट पर करीब 40 लोगों का एक समूह है, जो तय दिन में घाट पर मौजूद वेस्ट को उठाता है और वही रिसाइकिलिंग करने की पूरी व्यवस्था देखता है। ऐसे करीब 10 समूह है, जिनको महीने में 3 दिन लगातार मणिकर्णिका घाट पर बची हुई चीजों का रिसाइकिल करने की जिम्मेदारी दी जाती है।

अब शाम 6 बजे से सुबह 6 बजे तक यहां पर शवों के दाह-संस्कार के बाद जो चीजें बचती हैं, उनका ढेर यहीं घाट के किनारे लगा दिया जाता है। इस काम में नमामि गंगे के कर्मचारी बड़े मनोयोग से जुटे नजर आते हैं।

अर्थियों की लकड़ी से बनती है टोकरियां, सूप और पंखे

नमामि गंगे परियोजना में सफाईकर्मी 30-32 साल के किसना चौधरी ने हमें बताया कि यहां घाट पर कुछ भी बेकार नहीं होता। हर दिन यहां करीब 80 से 100 शव आ जाते हैं। जितने शव यहां आते हैं उतना ही हमारा काम बढ़ जाता है।

किसना बताते हैं कि अर्थियों का बांस भी काम में आता है। इससे सूप, टोकरियां, हाथ के पंखे बनाए जाते हैं।

शव के पहुंचने के बाद इन अर्थियों को एक किनारे रख दिया जाता है। बाद में अर्थियों का बांस निकाला जाता है और उन्हें बेच दिया जाता है। किसना इस घाट पर 7 हजार महीने की सैलरी पर कांट्रैक्ट पर रखे गए हैं।

कुल्फी की स्टिक भी अर्थी की बांस से होती है तैयार

हम लोग किसना से बात कर ही रहे थे कि तभी दो महिला सफाईकर्मी भी आ पहुंचीं। उनमें से एक रुदम है, जिसकी उम्र यही कोई 30 साल होगी। रुदम कहती हैं कि गंगा मैया में जो प्रवाहित नहीं होता, वो सब चीजें हमारे-आपके पास किसी न किसी रूप में पहुंच जाती है। वह कहती हैं कि यहां तो कुल्फी की स्टिक भी अर्थी में इस्तेमाल हुए बांस से बनाई जाती है। आप-हम थोड़े न पहचान पाएंगे। पर हकीकत यही है। 88 घाट हैं यहां पर और साथ ही हजारों दुकान। इन दुकानों में ही ये सामान मिल जाएंगे।

करण रस्तोगी और अंकित अग्रवाल ने 2015 में कानपुर में गंगा में फेंके जाने वाले ऑर्गेनिक वेस्ट से कंपोस्ट और अगरबत्ती बनाने की शुरुआत की थी। उनकी कंपनी की बनाई अगरबत्ती जर्मनी और स्विटजरलैंड भेजी जाती हैं। म्यूजिक कंपोजर शांतनु मोइत्रा के साथ करण रस्तोगी।
करण रस्तोगी और अंकित अग्रवाल ने 2015 में कानपुर में गंगा में फेंके जाने वाले ऑर्गेनिक वेस्ट से कंपोस्ट और अगरबत्ती बनाने की शुरुआत की थी। उनकी कंपनी की बनाई अगरबत्ती जर्मनी और स्विटजरलैंड भेजी जाती हैं। म्यूजिक कंपोजर शांतनु मोइत्रा के साथ करण रस्तोगी।

अगरबत्ती भी बनाई जाती है

बनारस के मणिकर्णिका घाट पर सफाईकर्मी 24 साल की कृतिका बताती हैं कि चिता पर सजी कुछ लकड़ियां राख हो जाती हैं तो कुछ अधजली रह जाती हैं। इन लकड़ियों का भी बड़ा बिजनेस है। इनसे अगरबत्ती भी बनाई जाती है।

बिजनेस करने वाले लोग इसे दूसरे शहरों में भी सप्लाई करते हैं। मीर घाट पर रहने वाले डोम परिवार के अनिल चौधरी बताते हैं कि हर दिन मणिकर्णिका घाट और हरिश्चंद्र घाट पर शवों के अंतिम संस्कार के बाद करीब 15,000 से 20,000 किलो तक लकड़ियां बच जाती हैं।

ये लकड़ियां 300 से 400 रुपए मन (एक मन 40 किलो के बराबर होता है) बिक जाती हैं। अनिल बताते हैं कि छोटे होटल और ढाबे चलाने वाले ये लकड़ियां ले जाते हैं। जबकि अधजली लकड़ियों का पाउडर बनाया जाता है। फिर इसमें परफ्यूम मिलाकर अगरबत्ती बनाई जाती है। हालांकि, इन अगरबत्ती का इस्तेमाल श्मशान घाटों पर ही होने वाले विधान में किया जाता है।

‘हेल्प अस ग्रीन संस्था’ मंदिरों से निकलने वाले फूलों को रिसाइकिल करती है। संस्था के फाउंडर करण रस्तोगी बताते हैं कि कानपुर के 29 मंदिरों से निकले अब तक 435 मीट्रिक टन फूलों को रिसाइकिल कर अगरबत्ती बनाई गई है। करण कहते हैं श्मशान गृहों में आने वाले फूल और लकड़ी का इस्तेमाल कर अगरबत्ती या दूसरी चीजें बनाई जा सकती है। लेकिन इसके लिए क्रिमेटोरिअम में ही मेकिंग प्रोसेस होनी चाहिए। चूंकि धर्म से जुड़ा मामला है इसलिए ये अगरबत्ती श्मशान घाट पर ही बिकनी चाहिए।

अर्थी के बांस की छतरियां तो कहीं छोटे-छोटे कूड़ेदान बनाए जाते हैं

घाट पर मिले अर्थी के बांस से बड़ी-बड़ी छतरियां बना दी जाती हैं, जो चबूतरों या पंडों के तख्त या फिर घाट पर बनी दुकानों पर लगी होती हैं। इन छतरियों पर चढ़ा कपड़ा भी अर्थी से उतारा हुआ होता है। घाट पर मौजूद रामअवतार बताते हैं कि घाटों पर रिसाइकिल पेपर और अर्थी के कपड़ों से बना सजावटी सामान बिकता देखा जा सकता है।

कई घाटों पर बांस और रस्सियों से छोटे-छोटे कूड़ेदान भी बनाए गए हैं। अर्थियों की बांस और प्लास्टिक का इस्तेमाल यहां पर मौजूद दुकानदार छतरी बनाने में कर लेते हैं, जो उन्हें धूप और बारिश से बचाती भी है।

शवों पर लिपटे कपड़े भी दुकानों में बिक जाते हैं

जिस ऊंचे प्लेटफॉर्म की बात हमने ऊपर कही, उनमें से दाहिनी ओर कपड़ों के सैकड़ों गट्‌ठर रखे हैं। ज्यादातर पीले और केसरिया रंगों वाले। इनमें से रामनामी कपड़ों का इस्तेमाल भी कुछ साधु लोग दोबारा कर लेते हैं।

‘वाराणसी एंड लाइफ एंड क्रिमेशन ग्राउंड्स’ पुस्तक में डॉ. केके शर्मा ने बताया है कि घाट पर शवों के जलने के बाद डोम परिवार के बच्चे और लोग बचे कपड़े और जूलरी को दुकानों में बेच देते हैं। कई बार घी, अगरबत्ती, धूप और दाह संस्कार के विधि-विधान में काम आने वाली दूसरी चीजें भी बच जाती हैं, जिन्हें वापस दुकानों में बेच दिया जाता है और दुकानदार भी खरीद लेते हैं। हालांकि, अनिल चौधरी बताते हैं कि शवों पर आने वाले कपड़े रामनामी या फिर मामूली कपड़े होते हैं। इन्हें गरीब लोग या भिखारी भी ले जाते हैं।

फूलों से बनाया जाता है कंपोस्ट

बनारस के 88 घाटों में से दो घाटों हरिश्चंद्र घाट और मणिकर्णिका घाट से हर दिन 1 से 1.5 टन फूल मालाएं निकलती हैं। इन फूलों से कंपोस्ट बनाया जाता है। इन दो घाटों सहित 88 घाटों से निकले फूलों को एकत्रित करने के लिए श्रद्धा या अर्पण कलश बनाए गए हैं।

वाराणसी नगर निगम (VMC) ने छह अर्पण कलश और छह अर्पण स्थल बनाए हैं। जिनमें अर्थियों के फूलों, नदी और घाट से निकला फूल डाला जाता है। इन्हें ऑटो टिपर के जरिए कलेक्ट कर पहले शिवाला ट्रांसफर स्टेशन ले जाया जाता है और फिर वहां से इन्हें कारसदा कंपोस्ट प्लांट जाता है। वहां फूलों को कंपोस्ट खाद में बदला जाता है।

उमेश नावों की मरम्मत का भी काम करते हैं। इसके लिए घाट की लकड़ियों और बांस का भी इस्तेमाल करते हैं।
उमेश नावों की मरम्मत का भी काम करते हैं। इसके लिए घाट की लकड़ियों और बांस का भी इस्तेमाल करते हैं।

नौकाएं बनाने में होता है कुछ लकड़ियों का इस्तेमाल

‌वाराणसी के पश्चिम किनारों पर गंगा में 1300 से अधिक नावें अभी चल रही हैं। पहले ये नावें डीजल से चलती थीं। लेकिन जिला प्रशासन की पहल के बाद इन्हें CNG में बदला जा रहा है। अभी करीब 250 नावों को CNG इंजन से जोड़ा गया है।

ललिता घाट पर नाव की मरम्मत में जुटे उमेश सहनी बताते हैं कि एक छोटी नाव बनाने में करीब 1 लाख की लागत आती है, लेकिन बड़ी नाव बनाने में 10 लाख से अधिक का खर्च आता है। इनमें कई बार शवों को जलाने वाली लकड़ियों का इस्तेमाल लकड़ी की कील के रूप में करते हैं। अर्थी के बांस का इस्तेमाल नाव की पतवार बनाने के लिए कर लिया जाता है।

राख धोकर टटोले जाते हैं गहने

अमिता सिन्हा ने अपने रिसर्च पेपर ‘मणिकर्णिका घाट, वाराणसीः ए लैंडस्केप ऑफ डेथ’ में बताया है कि एक शव के दाह संस्कार से करीब 2.7 किलो राख निकलती है।

मणिकर्णिका घाट के आसपास दर्जनों नावें लगी हैं जिन पर कुछ लोग चढ़े नजर आए। पानी में दो-तीन लोग हैं, जो हाथों में टोकरी लिए पानी को छान रहे हैं ताकि इस राख में कहीं कुछ सोने की जूलरी हो तो इसमें आ जाए। किसी को कभी-कभी घड़ी या सोने की चेन भी मिल जाती है।

यहां प्राइमरी स्कूल में पढ़ने वाला विशाल चौधरी, गोलू, कार्तिक भी घाट पर पानी में कुछ खोज रहे हैं। विशाल बताता है कि हम लोगों को अक्सर यहां सिक्के मिल जाते हैं। 100-150 रुपए की पॉकेट मनी की आमदनी हो जाती है।

बच्चे घाट पर इस तरह सिक्के या गहने तलाशते हैं। कई घंटों की खोजबीन के बाद उनके पास ठीक-ठाक पॉकेट मनी जमा हो जाती है।
बच्चे घाट पर इस तरह सिक्के या गहने तलाशते हैं। कई घंटों की खोजबीन के बाद उनके पास ठीक-ठाक पॉकेट मनी जमा हो जाती है।

चिता की भस्म से खेली जाती है होली

शवदाह गृह के पास में ही विनय पांडे की छोटी सी दुकान है जहां धूप, अगरबत्ती, घी जैसे दाह-संस्कार की सामग्री बिकती है। करीब 50-55 साल के विनय पांडे कहते हैं कि हमारी दुकान 3 पीढ़ियों से चल रही है। 24 घंटे यह श्मशान जागता रहता है। थोड़ी थोड़ी देर में राम नाम सत्य है, कानों में गूंजता रहता है। वो बताते हैं कि श्मशान की राख से लेकर लकड़ी तक सभी चीजें दोबारा इस्तेमाल में आ जाती हैं।

मणिकर्णिका महाश्मशान है और यहां की राख को लोग भभूत के रूप में ले जाते हैं। मणिकर्णिका घाट की होली भी देखने लायक होती है, जो होली के दिन खेली जाती है।

अधजली लकड़ियों से जलता है कई घरों में चूल्हा, होटलों में भी जाती हैं

मणिकर्णिका घाट पर बाएं देखिए या दाएं, एक के ऊपर एक लकड़ियां रखी हुई हैं। लकड़ियों का अंबार लगा है। चिताएं जल रही हैं। लेकिन आप यह जानकर हैरान हाे जाएंगे कि इन चिताओं की बची अधजली लकड़ियों से कई घरों में चूल्हे जलते हैं।

डोम परिवार से जुड़े अनिल चौधरी ने बताया कि हर दिन 80 से 100 परिवारों का भोजन इन चिताओं की अधजली लकड़ियों से बनता है।

मीर घाट के पास रहने वाले रमेश चौधरी (नाम बदला हुआ) बताते हैं कि लोग चिता जलाने के लिए कई बार अधिक लकड़ी ले लेते हैं। अगर कम लकड़ी में ही चिता जल जाती है तो बची लकड़ियां हम लोगों के घर पहुंच जाती हैं। कई बार जो लकड़ियां नहीं जलती हैं वो भी घरों में यूज हो जाती है। ठंड के दिनों में यह आग सेंकने के काम आती है। यही नहीं, होटलों में भी इन अधजली लकड़ियों को बेचा जाता है।

अघोरी चिता की अधजली लकड़ियों पर पकाते हैं मछली

मणिकर्णिका और हरिश्चंद्र घाट पर दाह संस्कार के बाद बची अधजली लकड़ियां अघोरियों के यहां भी भेजी जाती हैं।

संत कीनाराम आश्रम में अघोरी इन अधजली लकड़ियों का इस्तेमाल करते हैं। पंडित इंद्रजीत वली मिश्रा कहते हैं मणिकर्णिका घाट की अधजली लकड़ियां चेतगंज स्थित पिशाच कुंड भी भेजी जाती हैं। इस कुंड के आसपास रहने वाले अघोरी इन्हीं अधजली लकड़ियों पर मछलियां पकाते और खाते हैं, जिसे ‘प्रसाद’ कहा जाता है।

वाराणसी का दश्वाश्मेध घाट जहां सबसे ज्यादा श्रद्धालु पहुंचते हैं। यहां हर दिन गंगा आरती होती है। घाट पर कई मंदिर भी हैं जहां पूजा-पाठ की सामग्री चढ़ाई जाती है।
वाराणसी का दश्वाश्मेध घाट जहां सबसे ज्यादा श्रद्धालु पहुंचते हैं। यहां हर दिन गंगा आरती होती है। घाट पर कई मंदिर भी हैं जहां पूजा-पाठ की सामग्री चढ़ाई जाती है।

घाटों का गणित ही अलग है, किसी के पास नहीं है लाइसेंस

वाराणसी नगर निगम के सहायक नगर आयुक्त राजेश कुमार अग्रवाल बताते हैं कि हरिश्चंद्र घाट और मणिकर्णिका घाट पर लकड़ी की 24 दुकानें हैं उनमें से किसी के पास लाइसेंस नहीं है। जब-जब घाट पर इस्तेमाल की जाने वाली लकड़ियों के कारोबार को सिस्टम में लाने की कोशिश की जाती है तब-तब विरोध झेलना पड़ता है। वे धरना-प्रदर्शन करने लगते हैं। राजेश बताते हैं कि बहुत पहले 7-8 लोगों को लाइसेंस दिया गया था। लेकिन इसका गलत इस्तेमाल किया। एक के लाइसेंस पर तीन-चार दुकानें खुल गईं। किसी के भतीजे ने तो किसी के दादा ने दुकान लगा ली। लाइसेंस का रिन्यूअल भी नहीं किया। अभी अवैध रूप से ये दुकानें संचालित की जा रही हैं।

पिछले वर्ष जब लाइसेंस लेने का दबाव बनाया गया तब घाट पर शवों को दाह संस्कार करने से रोक दिया गया। तब गंगा में बाढ़ आने से पानी गलियों में भी आ गया था। ऐसे में गलियों में 40-50 शवों की कतार लग गई थी। स्थानीय अधिकारी भी इन्हें हटा नहीं पाते।

राजेश बताते हैं कि लोगों से कई बार शिकायतें आती हैं। एक शिकायत लकड़ियों के कम वजन को लेकर भी है। दाह संस्कार के लिए पहुंचे लोग 10 मन लकड़ी लेते हैं तो उन्हें 8 मन ही दिया जाता है। इन शिकायतों को देख एक्शन लेने की कोशिश की गई, लेकिन विरोध देखकर पीछे हटना पड़ा।

वेश्याएं घाट पर मुक्ति के लिए करती हैं खास नृत्य

मणिकर्णिका घाट में चैत्र नवरात्रि की अष्टमी के दिन वेश्याओं का खास नृत्य का कार्यक्रम होता है। जनश्रुतियों में कहा जाता है कि मणिकर्णिका पर भगवान शिव के सामने नाचने से वेश्याओं को इस अमानवीय जीवन में मुक्ति मिलती ही है। ऐसी मान्यता है कि ऐसी महिलाओं को अगले जन्म में वेश्या नहीं बनना पड़ेगा।

मणिकर्णिका घाट पर गुजारे ये 24 घंटे जीवन और मृत्यु के चक्र का अहसास कराते हैं। यहां मृत्यु का मतलब खत्म होना नहीं है, बल्कि जीवन की एक नई शुरुआत है। मणिकर्णिका घाट महाश्मशान ही नहीं, जीवन का साधन और साध्य भी है।

ग्राफिक्स: सत्यम परिडा

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