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लाल-हरी-पीली चूड़ियां बनाने में हाथ लहूलुहान:शरीर में जो खून बनता, वो तपती भट्‌ठी में खाक हो जाता है, कई गंवा बैठे जान

4 महीने पहलेलेखक: मीना
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हरे रंग की ढेर सारी टूटी हुई चूड़ियां, उस ढेर से पत्थर और कचरा निकालती पसीना पोछती 40 साल की मौजश्री कहती हैं, ‘नंगे हाथों से काम करने से कई बार भंगार में पड़ी चूड़ियां हाथों में भी लग जाती हैं, कांच मांस में गड़ जाता है, हाथ कट जाते हैं, खून निकलता है, कुछ देर का दर्द फिर वापस उसी काम में जुट जाते हैं। अब तो जैसे इस दर्द और चुभन की आदत-सी पड़ गई है। पेट की खातिर ये सब सहना पड़ता है।’

फिरोजाबाद की मौजश्री हो या कोई अन्य चूड़ी मजदूर सभी की हालत एक जैसी है। वुमन भास्कर की रिपोर्टर ने जब चूड़ियां बनाने वाली एक फैक्ट्री का दौरा किया तो ऐसी कई सच्चाइयां सामने आईं।

खून जो बनता है, वो चूड़ी फैक्ट्री में बह जाता है

मौजश्री जिस परिस्थिति में कांच की फैक्ट्री में काम कर रही थीं, वहां लगे सभी मजदूर उसी स्थिति में काम करते हैं। मौजश्री से थोड़ी दूरी पर कांच के एक अन्य ढेर के बीच बिना चप्पलों के बैठीं करीब 65 साल की अम्मा कहती हैं, ‘जिंदगी के 10 साल यही काम करते निकाल दिए। अब और कहां जाऊंगी, यहीं काम करते-करते मर जाऊंगी। बेबस-सी मुस्कान के साथ वे कहती हैं, ‘शरीर में जो थोड़ा खून जमा होता है वो टूटी चूड़ियों के चुभने से बाहर निकल जाता है।’

जिन फैक्ट्रियों में कांच बनता है, वहां हर तरफ टूटी-फूटी चूड़ियां, कांच की बोतलें और बारीक कटा हुआ कांच पड़ा रहता है। इन्हीं हालातों में मजदूर काम करते हैं। कुछ मजदूर बिना चप्पल के भी बैठकर काम करते नजर आए।

मौजश्री इस तरह फैले कांच की चूड़ियों के भंगार से हर रोज कचरा निकालती हैं। यह सारा काम वे बिना किसी सेफ्टी इक्विपमेंट के करती हैं।
मौजश्री इस तरह फैले कांच की चूड़ियों के भंगार से हर रोज कचरा निकालती हैं। यह सारा काम वे बिना किसी सेफ्टी इक्विपमेंट के करती हैं।

तपती भट्टी की आंच के सामने बंद हो गया फोन

सन 1977 से कांच कारोबार में लगे फजल अहमद बताते हैं कि कांच पकाने के लिए अलग-अलग तरह की भट्टी होती हैं और उनका तापमान भी अलग-अलग होता है। ओपन पॉट फर्नेंस में चूड़ियों के लिए कांच पकता है।

भट्टी के पास जो महिला झाड़ू लगा रही थी, उन्होंने अपना मुंह दुपट्टे से ढंक रखा था, क्योंकि खुली भट्टी से आंच तेजी से बाहर आ रही थी। पसीने से तरबतर महिला तेजी से भट्टी के पास का कांच झाडू बुहार कर एक तरफ कर रही थी, ताकि किसी को लग न जाए। यही नहीं वुमन भास्कर की रिपोर्टर ने जब भट्टी के नजदीक बनते कांच का वीडियो बनाने की कोशिश की तो फोन ही बंद हो गया। ये महिलाएं इस तापमान में यहां रोज कई घंटों तक काम करती हैं।

कई मजदूर बेहोश होते हैं, जान जाने का भी खतरा

फजल अहमद से बात करने पर मालूम हुआ कि फैक्ट्री में जो मजदूर काम करने आते हैं, उनके पास छोटे फोन हैं, एंड्रोइड नहीं। साल 2020 में ‘फ्लेम युनिवर्सिटी’ ने फिरोजाबाद के चूड़ी कारोबार पर एक रिसर्च की थी। रिसर्च में बताया गया है कि ‘पकाई भट्टी’ में 1400℃ पर कांच पकता है। गर्मी में इस टेंपरेचर पर काम करना दूभर हो जाता है। कई बार मजदूर बेहोश होते हैं तो कुछ की जान तक चली जाती है।

चूड़ी बनाने के लिए ज्यादा मात्रा में रेत का प्रयोग होता है। रेत उड़कर सांसों में जाती है। इससे उन्हें सिलिकोसिस नाम की बीमारी हो जाती है। यहां ज्यादातर मजदूर बिना मास्क लगाए काम करते हैं। रिसर्च में दावा है कि कारखानों में काम करने वाले ज्यादातर मजदूरों में टीबी सबसे आम बीमारी है। हालांकि, जिले के चीफ मेडिकल ऑफिसर दिनेश प्रेमी का कहना है कि टीबी का कांच से सीधे-सीधे लेना-देना नहीं है। हमारे पास फेफड़ों से जुड़ी बीमारियों और स्किन डिजीज, आंखों की परेशानियां लेकर लोग आते हैं।

क्या चूड़ी और टीबी का कोई कनेक्शन है?

दिल्ली के राजन बाबू इंस्टीट्यूट ऑफ पल्मोनरी मेडिसिन एंड ट्यूबरक्लोसिस में मेडिकल ऑफिसर डॉ. अनुराग शर्मा का कहना है कि कांच बनाने में सिलिका यानी रेत का इस्तेमाल होता है। सांस लेने पर सिलिका के कण सांस द्वारा फेफड़ों में चले जाते हैं और धीरे-धीरे फेफड़ों में सूजन आ जाती है।

समय के साथ फेफड़े कठोर होने लगते हैं। अगर कोई व्यक्ति 10 साल तक लगातार कांच की इंडस्ट्री में काम करता है तो उसमें सिलिकोसिस नाम की बीमारी के लक्षण दिखने लगते हैं।

फेफड़े कठोर होने से खांसी, बलगम आना, सांस फूलना और कमजोरी जैसी परेशानियां सामने आती हैं। रेस्परेटरी फेल्योर होने से व्यक्ति की जान तक चली जाती है। सिलिकोसिस एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में नहीं फैलता। हां, सिलिकोसिस के पेशेंट में टीबी की आशंका ज्यादा होती है।

टीबी ही नहीं कैंसर होने का भी खतरा बढ़ जाता है

सिलिका की वजह से बाहर के कीटाणुओं से फेफड़ों की रक्षा करने वाली कोशिकाएं ठीक से काम नहीं कर पातीं और टीबी का संक्रमण फैलने लगता है। जिस व्यक्ति को टीबी होता है उसके घर के लोगों में भी यह तेजी से फैलने लगती है। इस तरह अप्रत्यक्ष रूप से कांच का काम करने वालों में टीबी होने की आशंका बढ़ जाती है। सिलिकोसिस के मरीजों में फेफड़ों के कैंसर की आशंका भी बढ़ जाती है।

उत्तर प्रदेश के टीबी ऑफिसर डॉ. शैलेंद्र भटनागर ने बताया कि फिरोजाबाद जिले में अभी 2829 केस टीबी के हैं। इसके अलावा 946 वे मरीज हैं, जिनका इलाज प्राइवेट अस्पतालों में चल रहा है।

समस्या केवल फैक्ट्री तक नहीं, घर भी आती है

कांच को पिघलाने के बाद जो चूड़ी बनती है, उसे हीरे के छोटे से टुकड़े से काटा जाता है। चूड़ी कटने के बाद घरों में पहुंचती है और घरों में इसकी झलाई, जुड़ाई, चकलाई और डेकोरेशन का काम शुरू होता है। चूड़ियों का ये सारा काम बहुत ही कुशल तरीके से करना पड़ता है, जरा सी लापरवाही इंसान के हाथ तक जला सकती है या काट सकती है।

अनार देवी के घर में उनके बेटा-बहू, पोता-पोती सभी चूड़ियों के काम में लगे हैं। वे बताती हैं कि चूड़ी की चकलाई यानी अच्छी-खराब चूड़ी छांटने में कई बार हाथ में कांच चुभ जाता है। चूड़ी की गोलाई के भीतर कहीं खुरदरापन तो नहीं, ये जांचने में भी हाथ कट जाते हैं। पूरा दिन बैठने का काम है। घर में कोई रिश्तेदार आ जाए तो भी उनको समय नहीं दे पाते।

बिना सेफ्टी इक्विपमेंट के काम करते हैं चूड़ी मजदूर

साल 2016 में राजस्थान के बनस्थली विद्यापीठ के होम साइंस विभाग की शोधार्थी रितु बंसल और एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. चंद्रा कुमारी ने फिरोजाबाद की महिलाओं पर एक शोध किया। उनके शोध के बाद तैयार हुए रिसर्च पेपर के मुताबिक, कारखाने से चूड़ी आने के बाद ज्यादातर काम महिलाओं के जिम्मे होता है। चूड़ी की झलाई, जुड़ाई, चकलाई, कटाई, छटाई, कलर चपाई तक में महिलाएं नंगे हाथों से काम करती हैं। इनके लिए कोई सेफ्टी गैजेट नहीं होते। थकान, चक्कर, आंखों में जलन, उंगलियों पर जलने के निशान जैसी हेल्थ प्रॉब्लम्स सामने आती हैं।

पिछले पांच सालों से फिरोजाबाद के मजदूरों के हक की मांगों के लिए लड़ रहे रामदास मानव का कहना है कि नियम के मुताबिक, फैक्ट्री में काम करने वाले मजदूरों को अग्निरोधक वस्त्र, दस्ताने, हेल्मेट दिए जाने चाहिए, लेकिन इन्हें कुछ नहीं मिलता। 8-12 घंटे काम करते-करते ये मजदूर धीरे-धीरे गंभीर बीमारियों का शिकार हो जाते हैं। महिलाओं पर घर और चूड़ी दोनों के काम की दोहरी जिम्मेदारी बढ़ जाती है। पेट की आग बुझाने के लिए ये मजदूर रोज कांच के कणों की सांस पीते हैं।

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