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दिल्ली में 10 सड़कें महिलाओं के नाम-मुंबई में 7:दुनिया में 100 में 27 रोड औरतों के नाम पर, रानियों-वायसराय की पत्नियों से हुई शुरुआत

नई दिल्लीएक महीने पहलेलेखक: दीप्ति मिश्रा
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राजस्थान खराब लिंगानुपात के लिए बदनाम रहा है। इसलिए बेटियों के प्रति समाज की सोच बदलने के लिए बूंदी शहर में एक अनूठी पहल की गई है। यहां गलियों के नाम बेटियों के नाम पर ही रखे गए हैं। लेकिन ऐसी कितनी सड़कें याद हैं, जिनके नाम महिलाओं के नाम पर हैं? आप कुछ गिनी-चुनी सड़कों के नाम लेंगे। दरअसल, देश की ज्यादातर सड़कें पुरुष महापुरुषों के नाम पर है जबकि महिलाओं के नाम पर चुनिंदा सड़कें ही हैं। दिल्ली और मुंबई में महिलाओं के नाम पर सड़कों के बारे में जानने के लिए पढ़िए भास्कर वुमन की रिपोर्ट...

देश में ज्यादातर सड़कों के नाम पुरुषों के नाम पर हैं। महिलाओं के नाम पर अभी भी गिनी-चुनी सड़कें ही हैं। इतिहासकार विष्णु शर्मा बताते हैं कि ब्रिटिश शासन में जब दिल्ली की सड़कों का नामकरण किया गया। उस वक्त सबसे पहले ब्रिटिश शाही खानदान से जुड़े नामों को तरजीह दी गई। उसके बाद अंग्रेजी गर्वनर जनरलों या वायसरायों और उनकी पत्नियों के नाम पर सड़कों के नाम रखे गए। दूसरे घेरे की सड़कों का नामकरण भारत में ब्रिटेन की सत्ता स्थापित करने में अहम भूमिका निभाने वालों के नाम गया। सड़कों का तीसरा घेरा यानी कि जिन सड़कों पर क्लर्कों जैसा निचला स्टाफ रहता था, उनके नाम मिलिट्री जनरलों के नाम पर रखे गए थे।हालांकि, आजादी के बाद से अब तक बहुत सारे नाम बदल दिए गए।

इतिहासकार डॉ. रक्षंदा जलील कहती हैं कि आजादी से पहले अधिकतर सड़कों के नाम मुगल शासकों और ब्रिटिश साम्राज्य के नुमाइंदों के नाम पर थे। आजादी के बाद सड़कों के नाम भी बदले गए। रेटेन्डन रोड का नाम प्रसिद्ध चित्रकार अमृता शेरगिल, कर्जन रोड का नाम महात्मा गांधी की पत्नी कस्तूरबा गांधी और विलिंगडन क्रीसेंट का नाम बदल कर नोबेल प्राइज विजेता मदर टेरेसा के नाम पर रखा गया। हालांकि, उस वक्त महिलाओं के नाम पर जो सड़कें थीं, लेकिन उनके नाम बदलकर किसी भारतीय महिला के नाम पर नहीं रखे गए। दिल्ली और मुंबई के अलावा कमोबेश पूरे देश की यही स्थिति है।

काम के वक्त महिलाएं और इनाम के वक्त पुरुष याद आते हैं
डॉ. रक्षंदा कहती हैं, 'दिल्ली की कई इमारतें, टैंक बनाने और आवासीय कॉलोनियों को बसाने में महिलाओं की अहम भूमिका रही है। हमारा समाज पितृसत्तात्मक है। इसलिए देश की आधी आबादी के योगदान को पहचानने की जरूरत है, ऐसा ख्याल जल्दी से लोगों के मन में नहीं आता है। जब बात काम की होती है, तब महिलाओं का नाम याद आ जाता है, लेकिन जब बारी इनाम देने की आती है, तब उन्हें भूल जाते हैं। सिर्फ पुरुषों का ही नाम याद आता है। आखिर क्यों ऐसी महिलाओं को दरकिनार कर दिया जाता है, जिनका समाज को बनाने में अहम योगदान रहा है।'

वह आगे कहती हैं, 'ऐसा नहीं है कि नगर निगम या फिर देश के उन निकायों में महिलाएं नहीं हैं, जो सड़कों, शहरों और स्मारकों के नामकरण करते हैं, लेकिन वहां बैठी महिलाएं भी आधी आबादी के योगदान को पहचान देने के नाम पर अपनी आंखें मूंद लेती हैं।'

स्मारकों-सड़कों के नाम..बयां करते हैं शहर के मूल्यों की कहानी
इतिहासकार डॉ. रक्षंदा कहती हैं कि गलियों, स्मारकों और सड़कों के नाम न केवल उस शहर की पहचान बनते हैं, जिससे वे लोग जुड़े होते हैं, बल्कि बाहर से आने वालों को शहर का परिचय देने का भी काम करते हैं। गलियों, स्मारकों और सड़कों के नाम इस बात के अहम मार्कर होते हैं कि समाज खुद कैसे देखता है। शहर के इतिहास के दस्तावेज होते हैं और अतीत के मूल्यों की जीवंत कहानी बयां करते हैं।

सत्ता से जुड़ी महिलाओं को मिली तवज्जो
देश भर में जिन महिलाओं के नाम पर सड़कें बनी हैं, वे सत्ता से जुड़ी रहीं हैं या फिर उनका ताल्लुक सत्ता से जुड़े किसी पुरुष से रहा है। उदाहरण के लिए इंदिरा गांधी, राजमाता विजयाराजे सिंधिया, कस्तूरबा गांधी और अवाबाई जमशेद जी जीजा आदि। बता दें कि इंदिरा गांधी ने देश की कमान संभाली तो विजयाराजे राजघराने से आने के साथ ही सत्ता में भी रहीं। कस्तूरबा गांधी महात्मा गांधी की पत्नी और अवाबाई जमशेद जी जीजा कारोबारी सर जमशेद जी जीजाभाई की पत्नी थीं।

सुनंदा भंडारे का रिश्ता न सत्ता से रहा और न सत्ता में रहने वाले किसी पुरुष से। फिर भी उन्होंने महिला पुरुष की खाई को पाटकर अपने नाम का पत्थर लगवाने का सम्मान हासिल किया। सुनंदा भंडारे ने लिंग संबंधी भेदभाव के मुद्दों पर न्यायिक संवेदनशीलता के निर्माण के लिए काम करने का बीड़ा उठाया था। वह इसमें सफल भी हुईं थीं। बता दें कि सुनंदा भंडारे दिल्ली हाईकोर्ट की पहली महिला मुख्य जज थीं।

दुनिया भर में सड़कों के नाम में महिलाओं से भेदभाव
मैपबॉक्स डेवलपर अरुणा शंकरनारायणन और उनकी टीम ने लंदन, पेरिस, सैन फ्रांसिस्को, मुंबई, नई दिल्ली, चेन्नई और बेंगलुरु की मैपिंग की। इसमें पता चला कि महिलाओं के नाम भर भारत ही नहीं दुनिया भर में सड़कों की संख्या बेहद कम है। इन सभी शहरों में औसतन सिर्फ 27 फीसदी सड़कें ही महिलाओं के नाम पर हैं।

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