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नेशनल पॉल्यूशन कंट्रोल डे:कोई कपड़ों से छान रही पॉलीथिन का जहर, तो किसी ने रद्दी कागजों से तलाशा प्लास्टिक के खात्मे का राज

नई दिल्ली7 महीने पहलेलेखक: पारुल रांझा
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इंसान और पर्यावरण दोनों का सबसे बड़ा दुश्मन है प्लास्टिक। यह जमीन और पानी के स्रोतों को खराब कर रहा है। साथ ही इंसान के शरीर में हर हफ्ते एक क्रेडिट कार्ड जितना प्लास्टिक जा रहा है। वर्ल्ड वाइड फंड की एक रिपोर्ट के मुताबिक, इंसान 7 दिनों में करीब 5 ग्राम प्लास्टिक खा जाता है। इसमें से ज्यादातर पानी के साथ यह प्लास्टिक जा रहा है।

देश में प्लास्टिक पॉल्यूशन को रोकने के लिए सरकार ने प्रतिबंध तो लगाया है, लेकिन पर्यावरण बचाने की तमाम कोशिशों के बावजूद कई लोग अब भी खुद को बदलने को तैयार नहीं हैं। ऐसे में कहीं हमारी गलतियों की सजा अगली पीढ़ियों को न झेलनी पड़े, इसी उद्देश्य से देश में कुछ ऐसे भी लोग है, जो पॉलीथिन प्रदूषण को रोकने में योगदान दे रहे हैं। नेशनल पॉल्यूशन कंट्रोल डे पर हम ऐसी महिलाओं के बारे में बताने जा रहे हैं जो कपड़े और कागज से पॉलीथिन का जहर छानने में जुटी हैं।

'कागजी बोतल' बनाकर ढूंढा प्लास्टिक बोतल का विकल्प
दिल्ली-एनसीआर की महिला उद्यमी समीक्षा गनेरीवाल कागज से बोतलें बना रही हैं। उन्होंने साल 2018 में 'कागजी बॉटल्स' नाम से एक स्टार्टअप लांच किया। यह देश का पहला ऐसा स्टार्टअप है, जो 100% कंपोस्टेबल पेपर से बनी बोतलें बनाता है। समीक्षा कहती हैं, साल 2006 में कॉलेज में पढ़ाई के दौरान मैंने प्लास्टिक की थैलियों को बदलने के लिए एक प्रोजेक्ट पर काम किया था। उस समय समझ आया कि प्लास्टिक का कोई दूसरा विकल्प ही नहीं।

सुबह टूथब्रश से ब्रश करना हो या फिर ऑफिस में दिन भर कंप्यूटर पर काम, बाजार से कोई सामान लाना हो या वाटर बॉटल या टिफिन बॉक्स में खाना और पानी लेकर चलना, प्लास्टिक हर जगह है, हर समय है। काफी कोशिशों के बाद भी मुझे कोई विकल्प नहीं मिला। फिर मैंने सोचा कि क्यों न इको फ्रेंडली पैकेजिंग प्रोडक्ट्स बनाए जाएं। साल 2018 में मैंने एक ऐसी कंपनी बनाई, जो पूरी तरह से 100% कंपोस्टेबल कागज की बोतलें बनाने पर फोकस्ड हो।

समीक्षा गनेरीवाल ने साल 2018 में 'कागजी बॉटल्स' नाम से एक स्टार्टअप लांच किया।
समीक्षा गनेरीवाल ने साल 2018 में 'कागजी बॉटल्स' नाम से एक स्टार्टअप लांच किया।

मशीन बनाने के लिए सही लोगों को तलाशा
समीक्षा कहती हैं, इको फ्रेंडली प्रोडक्ट्स कैसे बनाए जाते हैं, इस बारे में मुझे ज्यादा जानकारी नहीं थी, न ही कोई ट्रेनिंग ली थी। ऐसे में डिजाइनर और विशेषज्ञों से सलाह ली। शुरुआत में सही मशीनें ढूंढना सबसे कठिन काम था, क्योंकि बाजार में ऐसी मशीन ही नहीं थी। प्रोडक्ट्स को ध्यान में रखते हुए मशीनों को बनाने में मदद करने के लिए सही लोगों को तलाशा। इसके बाद जब काम शुरू हुआ और अपने प्रोडक्ट का पहला सैंपल फैमिली वालों को दिखाया। बोतलें भूरे रंग की थीं।

हिमाचल प्रदेश से मंगाए जाते हैं रद्दी कागज

समीक्षा ने बताया कि अक्सर लोग ट्रांसपेरेंट प्लास्टिक की बोतलों का ही यूज करते हैं। पर मेरा यह प्रोडक्ट सभी को पसंद आया। ये बोतलें कागज के बेकार कचरे का यूज करके बनाई जाती हैं, जिन्हें हिमाचल प्रदेश की एक कंपनी से मंगाया जाता है। बेकार कागजों को पानी व केमिकल्स के बीच मिक्स किया जाता है। उनकी लुगदी बनने के बाद बोतल का शेप दिया जाता है। फिर सॉल्यूशन का स्प्रे होता है, जिसमें केले के पत्ते के वाटर रेजिस्टेंट गुण होते हैं।

ये बोतलें कागज के बेकार कचरे का यूज करके बनाई जाती हैं, जिन्हें हिमाचल प्रदेश की एक कंपनी से मंगाया जाता है।
ये बोतलें कागज के बेकार कचरे का यूज करके बनाई जाती हैं, जिन्हें हिमाचल प्रदेश की एक कंपनी से मंगाया जाता है।

तीन हजार किलो पॉलीथिन इकट्ठा कर चुकी है शैल माथुर
उत्तर प्रदेश की शैल माथुर पिछले करीब सात सालों से शहरों के विभिन्न बाजारों से करीब तीन हजार किलो पॉलीथिन इकट्ठा कर चुकी हैं। वहीं, अब तक 12 हजार से अधिक कपड़े के थैले बांट चुकी हैं। उन्हीं के प्रयासों से कई साप्ताहिक बाजार पूरी तरह से पॉलीथिन मुक्त हो चुके है। सबसे खास बात ये है कि इन बाजारों में प्लास्टिक पर बैन लगने के बाद कस्टमर्स सामान रखने के लिए अपने घरों से ही थैला लेकर आते है।

ट्री संस्था की संस्थापक शैल माथुर कहती हैं, सिंगल यूज प्लास्टिक का इस्तेमाल करने में डिजिटलाइजेशन का भी बड़ा हाथ है। ज्यादातर ई-कॉमर्स कंपनियां अपने प्रोडक्ट्स को प्लास्टिक में कवर करके देती हैं। हर तरह के प्लास्टिक प्रोडक्ट को रिसाइकिल नहीं किया जा सकता। ऐसे में इनका अंत जमीन या समुद्र में पड़े कचरे के रूप में ही होता है। इस प्लास्टिक को सड़ने में 500 से ज्यादा वर्ष लग जाते हैं।

प्लास्टिक से बनाई जा रही सड़कें और ईंटें
शैल कहती हैं, पॉलीथिन का इस्तेमाल बिल्कुल बंद हो जाए, इसी उद्देश्य से इसके खिलाफ अभियान जारी है। हर सप्ताह बाजारों में जाकर दुकानदारों और ग्राहकों को पॉलीथिन का यूज न करने को प्रेरित करती हूं। घर से कपड़े के थैले लेकर जाती हूं। दुकानदारों से पॉलीथिन लेकर, बदले में कपड़े के थैले दिए जाते है।

मैं अभी तक इकट्ठा किया हुआ सारा प्लास्टिक नोएडा प्राधिकरण व संस्था को दे चुकी हूं। इसका इस्तेमाल प्लास्टिक की सड़कों व ईंटें बनाने में किया जाएगा। प्लास्टिक कचरे से बनी सड़कों में लागत में भी बेहद कम आती है। इन सड़कों में 6-8% प्लास्टिक और 92-94% बिटुमिन होता है, जिससे सड़क मजबूत होती है। मेरा लक्ष्य पूरे देश के सभी साप्ताहिक बाजारों को पूरी तरह से पॉलीथिन मुक्त कराना है, ताकि प्लास्टिक जिंदगी में जहर न घोल पाएं।

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