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अमिताभ की बोलती बंद करने वाले बच्चे:अल्फा जनरेशन की सबसे ज्यादा संख्या एशिया में, रंगभेद-नस्लवाद से बेफ्रिक क्रांतिकारी होंगे ये बच्चे

नई दिल्ली22 दिन पहलेलेखक: संजीव कुमार
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'लिटिल चैंप्स' और 'KBC-स्टूडेंट स्पेशल' अगर आपने देखा हो तो आप अंदाजा लगा सकते हैं कि आज के बच्चे पुरानी पीढ़ी के मुकाबले कितने स्मार्ट हैं। एक्सपर्ट्स की मानें तो इन बच्चों का आईक्यू लेवल यानी बुद्धिमत्ता भी पिछली पीढ़ियों के मुकाबले ज्यादा रहने की संभावना है। 2010 से 2024 के बीच जन्म लेने वाले ऐसे बच्चों को 'जेनरेशन अल्फा' कहा जा रहा है, जिसे आई जेनरेशन (iGeneration) भी नाम दिया गया। क्योंकि यह पहली जनरेशन हो गई है जिसने आईफोन, आईपैड के शुरुआती दौर में ही दुनिया में कदम रख लिया था। यह अब तक की सबसे बड़ी जनरेशन है जिसकी आबादी 2025 तक 2 अरब हो जाएगी।

बात जागरूकता की हो या फिर इंटेलीजेंस, कॉन्फिडेंस और फ्रैंकनेस की हर मामले में अल्फा जनरेशन के बच्चों का अंदाज अलग है। चाहे ‘लिटिल चैंप्स’ के जजों का सामना करना पड़े, या फिर KBC में बिग बी के सामने हॉट सीट पर बैठकर सवालों के जवाब देने हों, ये बच्चे बड़ों को भी लाजवाब कर देते हैं।

पिछले साल नवंबर में KBC में अपने जवाब से अमिताभ बच्चन को चुप कराने वाले अरुणोदय ने 12.50 लाख रुपए जीते थे। 9 साल के बच्चे की हाजिर जवाबी देखकर अमिताभ भी निरूत्तर हो गए थे।
पिछले साल नवंबर में KBC में अपने जवाब से अमिताभ बच्चन को चुप कराने वाले अरुणोदय ने 12.50 लाख रुपए जीते थे। 9 साल के बच्चे की हाजिर जवाबी देखकर अमिताभ भी निरूत्तर हो गए थे।

कभी विलियम वर्ड्सवर्थ ने अपनी एक लोकप्रिय कविता ‘My Heart Leaps Up’ में लिखा था कि ‘The child is the father of the man.’ उनके मन की यह अभिव्यक्ति दुनिया के हर दौर में सच होगी इससे इनकार नहीं किया जा सकता है। जनरेशन 'अल्फा' इसी को सच करने में कोई कोर-कसर बाकी नहीं छोड़ने जा रही है।

पूरी दुनिया में हर हफ्ते 28 लाख से ज्यादा बच्चे जन्म ले रहे हैं। दाे साल बाद दुनिया की सबसे बड़ी आबादी जनरेशन 'GEN Alpha' की होने वाली है। एक जैसा सोचने-समझने और पसंद रखने वालों की इतनी बड़ी आबादी एक साथ कभी नहीं रही जो रिश्तों से ज्यादा टक्नोलॉजी पर टिकी हो। इनकी पसंद सोसायटी और मार्केट के लिए टॉप प्रयारिटी होगी, जिससे दुनिया की तस्वीर बदल जाएगी।

सबसे पहले ग्राफिक्स से समझते हैं दुनिया में अब तक कितनी जनरेशन हुई हैं-

आइए जानते हैं कि यह जनरेशन अल्फा क्या कुछ कर सकती है और आने वाले वक्त में इसका लाइफ स्टाइल क्या होगा और कंपनियां इसके लिए किस तरह की रणनीतियों पर काम कर रही हैं?

मार्केट के लिए जनरेशन अल्फा सबसे बड़ा कंज्यूमर ग्रुप

जनरेशन अल्फा अब तक की सबसे संपन्न और सशक्त पीढ़ी होगी। इस दौर का टीनएजर खुद को अहमियत देने वाला और साथ ही आसपास के माहौल को अपने हिसाब से ढालने वाला बनेगा। इस दौर के बच्चे स्मार्टफोन और टैबलेट का इस्तेमाल करते हुए बड़े हो रहे हैं। आईफोन, आईपैड और एप्स का इस्तेमाल करना इनके लिए कोई सरप्राइज करने वाली चीज नहीं रही। ये नहीं जानते हैं कि इन गैजेट्स के बिना भी जिंदगी कैसी रही होगी या हो सकती है।

टेक्नोलॉजी की तेज रफ्तार को देखते हुए अल्फा जनरेशन को कई चीजों के बारे में पता ही नहीं होगा जैसे- रिकॉर्ड प्लेयर्स, वीडियो होम सिस्टम (VHS), VCR, पेजर, CD, DVD प्लेयर, फैक्स मशीन, एमपी3 प्लेयर, लैंडलाइन फोन, डिक्शनरी, यलो पेजेज, स्ट्रीट डायरेक्ट्री।

इससे भी बढ़कर यह है कि जनरेशन अल्फा कभी भी जेब में पर्स रखकर घूमने वाली नहीं होगी। महज एक मोबाइल, कार्ड या कोड के जरिए ही वह लेन-देन में एक्सपर्ट होगी। उसके पढ़ने और एग्जाम देने के पैटर्न में कई तरह से बदलाव होते नजर आने लगेंगे।

जनरेशन अल्फा के इसी लाइफस्टाइल को ध्यान में रखते हुए ब्रांड्स अपनी नई नीतियां बना रहे हैं। अल्फा जनरेशन जल्द ही टीनएजर स्टेज में पहुंचने वाली है। ऐसे में कंपनियों का इस जनरेशन को लुभाने का तरीका भी पूरी तरह डिजिटल होता जा रहा है। गैजेट्स, खिलौने सहित तमाम चीजों के लिए कंपनियों ने नई-नई रणनीतियों पर काम करना शुरू भी कर दिया है।

मिलेनियल माता-पिता की संतान है Gen Alpha

मिलेनियल पेरेंट यानी जनरेशन ‘Z’ से पैदा हो रही अल्फा जनरेशन 21वीं सदी में सबसे पहली और अब तक की सभी जनरेशन में विशाल तो है ही, साथ ही दुनिया के हर कोने में अपनी पहुंच बनाने वाली है। इसके लिए अंतरिक्ष की सैर करना आम बात होगी। पर यहां ध्यान देने वाली बात यह कि मिलेनियम दौर के लोग जानते हैं कि दुनिया में टेक्नोलॉजी के बढ़ते दखल के नतीजे कितने खतरनाक भी हो सकते हैं। चाहे वह अकेलेपन की बात हो या फिर एंटी-सोशल होने की।

आइए, यहां ग्राफिक के जरिए समझने का प्रयास करते हैं कि जनरेशन 'Z' और जनरेशन 'अल्फा' के बीच किस तरह से अंतर दिखाई पड़ता है-

पेरेंट्स के सामने चुनौतियां, ग्रांड पेरेंट्स के नजदीक होगी अल्फा जनरेशन

जनरेशन अल्फा के पेरेंट कई तरह की चुनौतियों से रू-ब-रू होने वाले हैं। बच्चों को स्क्रीन देखने की लत लगना, साइबर बुलींग और चाइल्ड फ्रेंडली कंटेंट का मैनेजमेंट ये ऐसी समस्याएं हैं जिनको मिलेनियल पेरेंट कैसे करेंगे? इस बात का जवाब तलाशा जाना बाकी है। वजह यह है कि मिलेनियल पेरेंट ने जो कुछ भी अपने माता-पिता और दादा-परदादाओं से बेटे-बेटी के पालन-पोषण के बारे में सीखा होगा, उसे वे जनरेशन अल्फा पर कितना अप्लाई कर पाएंगे। यह अभी सवाल ही है।

हालांकि, जनरेशन अल्फा के दादा-दादी और नाना-नानी की भूमिका बढ़ने वाली है। क्योंकि ये ही अपने पोते-पोतियों और नाती-नातिनों की जिंदगी में नजदीक रहने वाले हैं।

समय के साथ-साथ 'जनरेशन' की परिभाषा का बदलता गया स्वरूप

ऐसा देखा गया है कि अलग-अलग स्थिति में विभिन्न पीढ़ी के लोग अलग-अलग तरह से व्यवहार करते हैं। उनके नजरिए, विश्वास, विचार और सभी मान्यताओं के आधार पर पीढ़ियों को अलग-अलग कैटिगरी में बांटा गया है। कई डिक्शनरी में 'जनरेशन' काे अलग-अलग शब्दों में समझाया गया है।

  • किसी परिवार या वंश में किसी एक व्यक्ति से शुरू करके उसके पूर्वजों और उसके वंशजों की गिनती करना- जैसे फैमिली ट्री बनाना
  • 19वीं सदी से पहले 'जनरेशन' को परिवार और आस-पास के समाज तक ही सीमित करके देखा जाता था।
  • 1863 में फ्रांसीसी शब्दकोशकार (लैक्सीकोग्राफर) और दार्शनिक एमिली मैक्सीमिलियन पॉल लिटरे ने बताया कि किसी खास समय और समाज में जीवित लोगों को ‘जनरेशन’ कहा जाता है।
  • समय के साथ जनरेशन शब्द में मॉर्डनाइजेशन, इंडस्ट्रियलाइजेशन, वेस्टर्नाइजेशन और ग्लोबलाइजेशन भी शामिल हाे गए हैं।

'जनरेशन अल्फा' का नामकरण की भी अपनी एक रोचक कहानी है जिसे इस ग्राफिक से समझ सकते हैं-

दुनिया में जितनी भी जनरेशन हुई हैं, उन सभी जनरेशन के लिए खिलौनों के अपने मायने रहे हैं। आखिर जनरेशन अल्फा किस तरह के खिलौनों से दो-चार होने जा रही है, इसे भी जानते चलिए-

टॉयज के मामले में अल्फा जनरेशन का कोई सानी नहीं

जनरेशन अल्फा के खिलौने घर में खेलने भर के लिए ही नहीं होंगे। बच्चों की क्लास, प्ले स्कूल और चाइल्ड केयर सेंटर में भी अपनी पहुंच रखेंगे। ऐसे एजुकेशनल टॉय से खेलने वाले बच्चे स्मार्ट और ज्यादा स्किल वाले होने तो लाजमी हैं।

फन टॉय से खेलने वाले जनरेशन अल्फा के बच्चे साइंस, टेक्नोलॉजी, इंजीनियरिंग और मैथ्स (STEM) से जुड़ी खास स्किल ऐसे सीख जाएंगे जैसे कि हंसी ठिठोली का कोई खेल हो। इतना ही नहीं फन टॉय इन बच्चों को सोशल, क्रिएटिव, कॉन्फिडेंट, बैलेंस बनाने में कामयाब होंगे। ऐसे बच्चे मनी पावर के साथ इनोवेशन को भी समझेंगे। अल्फा जनरेशन के लिए टेक-टॉयज का पॉजिटिव पहलू यह है कि इस तरह के खिलौनों के इस्तेमाल से दुनिया भर की इस जनरेशन के बीच कनेक्टिविटी बढ़ेगी। जिससे एक ग्लोबल कम्युनिटी बनेगी और बढ़ेगी, जो ग्लोबल कम्युनिकेशन को मजबूत बनाएगी।

इसी को ध्यान में रखते हुए टॉय ब्रांड नई रणनीति पर काम करना शुरू कर चुके हैं। आज दुनिया में खिलौनों का बाजार 8,134 अरब रुपए है जिसमें लगातार बढ़ोतरी हो रही है। भारत में भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पिछले साल टॉय इंडस्ट्री को लेकर गंभीर नजर आए थे। उन्होंने इंडिया टॉय फेयर 2021 का उद्घाटन भी किया था। भारत में अभी 85 फीसदी खिलौने बाहर से आयात होते हैं। देश में खिलौना बनाने के लिए जयपुर, वाराणसी और चेन्नापट्‌टनम शहर जाने जाते हैं।

अल्फा जनरेशन किस तरह की दुनिया बनाने वाले हैं, उस पर दुनिया के महत्वपूर्ण देशों भारत, चीन और अमेरिका, यूरोप से तथ्य जुटाए गए हैं जिनके कुछ अहम तथ्यों को इस ग्राफिक में समझाने की कोशिश की गई है-

जनरेशन अल्फा के इर्द-गिर्द होगा एजुकेशन सिस्टम

21वीं सदी की इस पहली जनरेशन का पढ़ाई-लिखाई का तरीका भी बदलने वाला है। जनरेशन अल्फा को सिखाने के लिए विजुअल, मल्टीमॉडल और हैंड्स ऑन लर्निंग मॉडर्न टेक्नोलॉजी से लबरेज होगी जिसके लिए स्ट्रक्चर में बदलाव होना समय की जरूरत होगी। कहने का मतलब यह है कि अगर एजुकेशन का तरीका पारंपरिक ही रहेगा तो वह बदलते समय के साथ उसका टिकना मुश्किल होगा। इस जनरेशन का रुझान उसमें नहीं होगा। चूंकि, दुनिया अब ग्लोबल विलेज बनती जा रही है तो एजुकेशन के लिए ये जनरेशन देश की सीमाएं मायने नहीं रख रही हैं। इस जनरेशन में ऊंच-नीच, रंग-भेद जैसी बातें भी नहीं होंगी, ये सबसे बड़ी खासियत है।

पिछली सभी पीढ़ियों के मुकाबले अल्फा जनरेशन के पास सबसे ज्यादा इन्फॉर्मेशन का भंडार है जो कि गिनी चुनी ग्लोबल भाषाओं में मौजूद है। अल्फा जनरेशन के सामने भाषाई अड़चनें भी करीब-करीब खत्म होने जा रही हैं। इस वजह से अल्फा जनरेशन की एजुकेशन मौजूदा पैटर्न से अलग होने वाली है। इसके लिए बड़ी-बड़ी Byjus, हेनरी हर्विन, अपग्रेड जैसी जैसी ऑनलाइन एजुटेक कंपनियों ने कमर कसनी शुरू भी कर दी है।

अल्फा की दुनिया में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का इस्तेमाल आम बात

मां के पेट में रहकर ही आईफोन, आईपैड और एप्स के बारे मे जानकर पैदा होने वाली इस जनरेशन के लिए स्मार्टफोन कोई अजूबा चीज नहीं है। ये स्क्रीन टच करने से घबराने वाले नहीं हैं और इनके लिए सीरी (Siri), एलेक्सा (Alexa) और गूगल असिस्टेंट की आवाजें घरेलू होने का अहसास दिलाती हैं। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और वॉयस असिस्टेंट से आमने-सामने होना इनको डराता नहीं है। सोशियोलॉजिस्ट दीपेंद्र मोहन सिंह बताते हैं- ‘जिसे हम स्मार्ट फोन और स्मार्ट गैजेट्स कहते हैं वो जनरेशन अल्फा के लिए बहुत ही कॉमन चीज है। उन्हें इसमें कुछ भी स्मार्ट नहीं दिखता। जिन टेक्नोलॉजीज को वो स्मार्ट मानेंगे वो शायद हमारी समझ में भी नहीं आए। यह हमारे और उनके बीच का जनरेशन गैप होने वाला है।’

2019 में भारत, US, UK, चीन और ब्राजील में अल्फा जनरेशन के करीब 8000 पेरेंट पर एक सर्वे कराया गया। इसमें कई तथ्य सामने आए-

जनरेशन अल्फा के दौर में आएंगे मेटावर्स

आजकल फेसबुक और माइक्रोसॉफ्ट मेटावर्स पर काम कर रहे हैं। आखिर क्या है मेटावर्स? पहले इसे समझते हैं। अक्टूबर 2021 में मेटा (फेसबुक) के सीईओ मार्क जकरबर्ग ने कंपनी का नाम मेटा (Meta) रखा। उस समय मार्क ने कहा था कि हम चाहते हैं कि हम दुनिया में मेटावर्स के नाम से जाने जाएं, हालांकि मेटावर्स कोई नया शब्द नहीं है।

वर्ष 1992 में नील स्टीफेंसन ने अपने डायस्टोपियन उपन्यास "स्नो क्रैश" में मेटावर्स का जिक्र किया था। स्टीफेंसन के उपन्यास में मेटावर्स का मतलब एक ऐसी दुनिया (वीडियो गेम) से था, जहां लोग गैजेट्स की मदद से आपस में कनेक्ट होते हैं। गैजेट्स में हेडफोन, वर्चुअल रियलिटी शामिल है। यह वीडियो गेम लोगो को एक आभासी दुनिया में ले जाता है। असल दुनिया में आप हर चीज को छू सकते हैं, उसे महसूस कर सकते हैं। लेकिन मेटावर्स (आभासी दुनिया) इससे बिलकुल विपरीत है। मेटावर्स एक आभासी दुनिया है जो कि पूरी तरह से हाई-स्पीड इंटरनेट पर निर्भर करती है। बिना हाई स्पीड इंटरनेट और गैजेट्स के बिना इस दुनिया में जाना मुमकिन नहीं। असल दुनिया में आपको किसी जगह का भ्रमण करने के लिए उस जगह पर शारीरिक रूप से जाना पड़ता है, लेकिन मेटावर्स में आप घर बैठे-बैठे अमेरिका या दुनिया के किसी भी कोने का भ्रमण कर सकते हैं। यहां तक कि आप घर बैठे अंतरिक्ष का भी अनुभव ले सकते हैं। मेटावर्स में हर एक चीज आभासी है। कुछ भी वास्तविक नहीं है।

मेटावर्स वर्चुअल रियलिटी के बाद की दुनिया यानी ऑग्मेंटेड रियलिटी पर आधारित है। ऑगमेंटेड रियलिटी से मतलब है, किसी भी चीज को बेहतर बनाकर दिखाना, जिससे वह बिलकुल वास्तविक लगे। ऑगमेंटेड रियलिटी वर्चुअल रियलिटी का ही दूसरा रूप है। इस तकनीक में आपके आसपास के वातावरण से मेल खाता हुआ एक कंप्‍यूटर जनित वातावरण तैयार किया जाता है जो कि देखने में वास्तविक जैसा लगता है। हालांकि, विभिन्न संसाधनों और कंपनियों के सहयोग से मेटावर्स बनाने में कई वर्ष लग सकते हैं। ब्लूमबर्ग इंटेलिजेंस का अनुमान है कि 2024 तक मेटावर्स का बाजार 800 बिलियन डॉलर तक का हो जाएगा। यानी जनरेशन अल्फा के आखिरी साल में पूरी दुनिया में मेटावर्स की पहुंच बढ़ने वाली है।

बैंक ऑफ अमेरिका ने मेटावर्स को उन 14 टेक्नोलॉजी में शामिल किया है जो हमारी जिंदगी में क्रांतिकारी बदलाव लाने जा रही हैं। हाल ही में बैंक ऑफ अमेरिका थीमैटिक रिपोर्टः द 14 टेक्नोलॉजी दैट विल रिवोल्यूशनाइज़ ऑर लाइव्स में जानकारों ने लिखा, ‘मेटावर्स में अनगिनत वर्चुअल वर्ल्ड होंगे और ये एक दूसरे को वास्तविक दुनिया से जोड़े रखेंगे। लंबे समय से चल रही इंडस्ट्री और मार्केट जैसे कि- फाइनेंस और बैंकिंग, रिटेल और एजुकेशन, हेल्थ और फिटनेस के साथ-साथ एडल्ट बिजनेस में भी इससे बदलाव आएगा तो आप काम पर हों या फुरसत में इनकी मौजूदगी होगी और ये अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाएंगी।’ कई तकनीक के जनक और 2012 से गूगल के इंजीनियरिंग डायरेक्टर अमेरिका के रेमंड कुर्ज़वेल कहते हैं, ‘इस दशक के अंत में, यानी 2030 में, जनरेशन अल्फा के लोग वास्तविक दुनिया के बजाय मेटावर्स में अपना अधिक समय गुजारेंगे।’

मेटावर्स गेमिंग के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए दिल्ली में रहने वाली सोनिका राजपूत बताती हैं कि मेरी बेटी 11 साल की हो चुकी है और वह मोबाइल में मेटावर्स गेम डाउनलोड करने के लिए मुझ पर दबाव बनाए रहती है। इस तरह के गेम कई बार बच्चों को वास्तविक दुनिया से परे ले जाते हैं। हालांकि इस तरह के गेम फ्री में डाउनलोड हो जाते हैं। लेकिन बच्चे जब इस गेम को खेलते हुए आगे बढ़ते हैं तो एक लेवल ऐसा आता है जब वे अपनी समझ पर कंट्रोल नहीं रख पाते हैं। उस लेवल से आगे बढ़ने के लिए आपको पैसा तो देना ही होता है साथ ही बच्चे का गेम से बाहर निकला भी मुश्किल हो जाता है।

यानी इसका मतलब है कि यह सबकुछ किसी क्रांति से कम नहीं होगा।

कैसी होगी अल्फा जनरेशन के दौर की दुनिया

यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि जनरेशन अल्फा के बच्चे आने वाली समस्याओं को किस तरह से हल करेंगे। कई एक्सपर्ट और मानव विज्ञानियों की मानें तो ‘जनरेशन अल्फा’ की क्रिएटिविटी और तुरंत फैसले लेने की क्षमता ही उन्हें बाकी पिछली जनरेशन से आगे करने वाली है। यही वह जनरेशन होगी जो कि मंगल और चंद्रमा पर अपनी मौजूदगी बड़ी संख्या में दर्ज कराएगी।

कुल मिलाकर, इस जनरेशन का खान-पान, हेल्थ, रहन-सहन और समाज के प्रति जागरूकता ऐसी होगी जो कि मानव सभ्यता को क्रांतिकारी दौर में पहुंचाने वाली है। ऐसे में आप भी अल्फा जनरेशन का दौर देखने, जानने और समझने के लिए तैयार हो जाइए।

एक सवाल यह भी है कि जनरेशन अल्फा के बच्चे तो 2024 तक ही माने जा रहे हैं तो फिर अगली जनरेशन कौन सी रहने वाली है?

ग्राफिक्स: सत्यम परिडा

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