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नवाब ने कम घी पर वजीर को धुना:6 पराठों के लिए 30 किलो घी लेने वाले शाही बावर्ची को रोका था, पढ़िए-अजब किस्से

नई दिल्ली2 महीने पहलेलेखक: संजीव कुमार
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आज ‘फुरसत का रविवार’ है, आपका मूड भी खुशगवार है। इसलिए हमने सोचा कि इस रविवार क्यों न हम आपको राजा-रानियों के किस्से ही सुनाएं। राजा-रानियों की कहानी सुनने की कोई उम्र नहीं होती, इन्हें कभी भी सुना जा सकता है।

ये बात इसलिए छिड़ी है क्योंकि हाल ही में दुनिया ने सबसे लंबे समय तक राज करने वाली महारानी एलिजाबेथ-II को अलविदा कहा है। ब्रिटेन की महारानी हमेशा अपनी नरमदिली और अलग अंदाज के लिए जानी जाती रहीं।

बात जब शाही घरानों की चली ही है तो हम देश विदेश की ऐसी रॉयल हस्तियों के बारे में जान लेते हैं जो अपने शौक, अच्छी-बुरी आदतों और रंगीनियों की वजह से अपनी प्रजा के बीच ही नहीं, दुनिया भर में मशहूर रहीं।

रविवार है, आपके नाश्ते के लिए घर में आज पराठे जरूर बने होंगे। पराठे से याद आया एक ऐसे नवाब का किस्सा जो आपको मुस्कुराने पर मजबूर कर देगा।

खाने के शौकीन नवाब ने जब देसी घी को लेकर वजीर-ए-आजम पर कर दी थप्पड़ों और घूंसों की बरसात

बात अवध के पहले नवाब गाज़ीउद्दीन हैदर की है। नवाब का शाही बावर्ची उनकी पसंद के छह पराठे पकाने के लिए 30 सेर यानी करीब 30 किलो घी लिया करता।

उसका दावा था कि एक पराठे में पांच सेर घी खप जाता है और जो बच जाता है, वह घी नहीं रह जाता। एक बार इसे लेकर बड़ा हल्ला मचा। हुआ यूं कि वज़ीर-ए-आज़म मोतमउद्दौला आगा मीर ने शाही बावर्ची को फटकार लगा दी कि हर पराठे पर एक सेर (933 ग्राम) से ज्यादा घी नहीं दिया जाएगा।

यह बात जब नवाब गाज़ीउद्दीन हैदर तक पहुंची तो उन्हें इतना गुस्सा आया कि उन्होंने आगा मीर को बुलाकर उन पर थप्पड़ों और घूसों की बरसात कर दी। इसके बाद तो घी की मात्रा प्रति पराठा पांच सेर पक्की हो गई। आपको नहीं लगता पुरानी दिल्ली के ‘पराठे वाली गली’ में बनने वाले पराठों को ‘तलकर’ बनाने की परंपरा अवध के जरिए दिल्ली तो नहीं पहुंची?

निजामों, बादशाहों, बेगमों के कई शौक ऐसे थे जिनसे उन्होंने हमारी कल्चर को काफी हद तक बदला। हमारे खानपान पर इसका सबसे ज्यादा असर पड़ा। देखिए इस ग्रैफिक में:

नाश्ते के पराठे ही नहीं, नवाबों के दस्तरख्वान के लजीज किस्से भी सुनते चलें, जो मुंह में पानी ले आएंगे।

नवाबों के लिए रोज तैयार किया जाता था 101 डिश का ‘तोरा’

नवाबों की राजसी दावतों के लिए खाने के सभी व्यंजनों के कलेक्शन को ‘तोरा’ कहते थे। बादशाह सलामत के महल में खास उनके लिए 101 व्यंजनों का ‘तोरा’ जाता था। इसमें पुलाव, जर्दा, मीठा पुलाव यानी मुजाफर, खटाई वाला मीठा पुलाव यानी मुतरंजन, शीरमाल, मुजाफर के रंग वाला मीठा चावल यानी सफेदा, बैंगन का रायता, दूध में पके चावलों से बनी खीर यानी शीर विरंज के ख्वांचे, कोरमा, बिरयानी, गोश्त के साथ पकी हुईं अरबियां, शाही कबाब, मुरब्बे, चटनी और अचार तो जरूर हुआ करते थे। अक्सर इन सबकी एक से ज्य़ादा और कई बार कई तरह की क़िस्में बनतीं। कभी-कभी मेहमानों की पसंद के अनुसार उनमें दूसरी तरह की रोटियां, पराठे और सालन भी शामिल होता। बिना इसका ध्यान रखे कि इनमें कौन ‘हिंदुस्तानी’ है और कौन ‘परदेसी’।

निजामों ने खाने में शामिल कीं मुगल, अरबी और दक्षिण भारत की डिश

हैदराबाद के निजामों ने खाने को लेकर कई तरह के प्रयोग किए। उन्होंने तुर्क, अरबी और मुगलों के तरीकों को अपनाते हुए दक्षिण भारत के व्यंजनों को भी शामिल किया। इनमें हलीम, पुलाव अरब से, तंदूरी नान मध्य एशिया से, मुगलों से मुगलई तड़का और दक्षिण भारत के बघारे बैंगन, मिर्च का सालन जैसी डिश पसंद की जाती थीं।

बात जब निजामों की चली है तो यहां ग्रैफिक के जरिए बताते चलें कि जब देश आजाद हुआ तो कुछ महाराजा ऐसे भी थे जो भारत में शामिल नहीं होना चाहते थे

नवाबों के लिए एक पैर पर खड़े होकर खाना बनाने वाले बावर्चियों का दर्जा उस समय इतना ऊंचा था कि दरबार में कई मंत्रियों में जलन की वजह बनता था।

बावर्चियों के भी थे शाही नखरे, मिलती थी शानदार तनख्वाह

हैदराबाद के निजामों के जमाने में वजीर-ए-आजम सालारजंग के बावर्चीखाने के खास बावर्ची की तनख्वाह 1200 रुपए महीना थी। जो करीब 200 साल पहले बहुत बड़ी रकम थी।

फिर कुछ बावर्ची भी इतने नकचढ़े थे कि अपनी शर्तों पर काम करते। एक बावर्ची ने शर्त रखी थी कि वह केवल सालारजंग के लिए खाना पकाएगा। एक बार तो उसने नवाब शुजाउद्दौला की दावत के लिए भी पुलाव बनाने से इनकार कर दिया।

सालारजंग ने बड़ी खुशामद की तो इतना भर करने को राजी हुआ कि वह सालारजंग के लिए जितना पुलाव पकाता है, उस दिन उसका दोगुना पका देगा। वह उसमें से जिसे भी चाहें, खिलाएं, उससे कोई मतलब नहीं होगा।

नवाबों के अलावा खान-पान के मामले में बेगमें भी कम नहीं थी। इस ग्रैफिक जरिए बताते चलें कि कौन-से व्यंजन भोपाल की बेगमों को पसंद थे

ये तो हुई खाने की बात, लेकिन नवाब और महाराजाओं के पीने-पिलाने के शौक के भी किस्से कम नहीं।

महाराजा जिसने दुनिया को दिया ‘पटियाला पैग’, रात को 25 पैग ब्रांडी जरूर पीते थे

20वीं सदी के शुरुआती चार दशकों में पटियाला के महाराजा रहे भूपेंदर सिंह के अजब-गजब कारनामों की चर्चा जरमनी दास ने अपनी किताब ‘महाराजा’ में की है। वे बताते हैं कि भूपेंदर सिंह की 365 रानियां थीं।

भूपेंदर सिंह हर रोज अलग रानी के साथ समय बिताते थे। समय बिताने के लिए रानी का सिलेक्शन भी अजीबो-गरीब अंदाज में किया जाता।

जरमनी दास ने अपनी किताब में लिखा है कि सभी रानियों को एक लालटेन दी जाती। जिस रानी की लालटेन देर तक जलती उसी के साथ राजा रात गुजारते।

इन रानियों के साथ समय बिताने के किस्से तो आम रहे हैं मगर हम यहां आपको उनकी एक ऐसी आदत के बारे में बता रहे हैं जो कम ही लोगों को पता है।

महाराजा भूपेंदर सिंह रात को भोजन करना कम ही पसंद करते थे जबकि वे 25 पैग ब्रांडी लेना कभी नहीं भूलते। उनके इसी मिजाज के चलते ड्रिंक्स के शौकीन लोगों में 'पटियाला पैग' लेने का ट्रेंड शुरू हुआ और आजकल की पार्टियों में ‘पटियाला पैग’ शब्द का चलन आम बात हो गई है।

यहां ग्रैफिक के जरिए यह भी जान लीजिए कि आधुनिक दुनिया में सबसे ज्यादा दिनों तक शासन करने वाले राजा-रानी कौन रहे हैं:

खाने-पीने के अलावा नवाबों के कुछ बेतुके शौक भी हुआ करते थे जिनके बारे में आज लोग चटखारे लेकर किस्से सुनाते हैं।

800 कुत्ते पालने वाले नवाब ने डॉगी की शादी में खर्च किए थे 2.5 करोड़ रुपए

जूनागढ़ के नवाब महाबत रसूल खान को कुत्ते पालने का शौक ऐसा था कि उसने एक-दो नहीं बल्कि 800 कुत्तों की पूरी फौज पाल रखी थी।

सोचिए, इन सबके लिए वह कितना खर्च करता होगा। नवाब ने इन कुत्तों के लिए अलग-अलग कमरे और नौकर रखे हुए थे। इनकी देखभाल का सारा खर्च राजकोष से किया जाता था।

कुत्तों के बीमार पड़ने पर उनका इलाज ब्रिटिश डॉक्टर्स और सर्जन से करवाया जाता था। किसी कुत्ते की मौत हो जाए तो उसको पूरे रीति-रिवाज के साथ दफनाया जाता और उसके लिए एक दिन का शोक घोषित किया जाता था। इतना ही नहीं नवाब ने अपने प्यारे डॉग की जब शादी की तो उसमें 22 हजार रुपए खर्च किए जो कि आज के समय में 2.5 करोड़ रुपए के बराबर होंगे।

यहां ग्रैफिक के जरिए बताते चलें कि दुनिया में एक राजा ऐसा भी हुआ जो जानवरों को ही नहीं अपने दुश्मनों को बुरी तरह मारकर सरेआम सूली पर लटका देता था:

ये तो हो गई शाही शौक की बात, अब जरा शाही कंजूसी का भी लुत्फ लीजिए।

35 साल तक एक ही टोपी पहनता रहा हैदराबाद का ये कंजूस निजाम

बेपनाह दौलत और कंजूसी के लिए दुनिया में मशहूर रहे हैदराबाद के निजाम उस्मान अली खान ( सन् 1911-1948) अपनी लाइफस्टाइल के लिए भी जाने जाते हैं।

दीवान जरमनी दास ने अपनी किताब 'महाराजा' में जिक्र किया है कि आमतौर पर ये निजाम मामूली कुर्ता पजामा पहनते थे, जिस पर इस्‍तरी तक भी नहीं कराते थे। पैरों में मामूली चप्‍पल या फिर सालों तक एक ही जोड़ी जूते में काम चलाते थे।

निजाम के पास एक ऐसी तुर्की टोपी थी जिसको उन्होंने करीब 35 साल तक लगातार पहना। आखिर में उस टोपी की हालत इतनी खस्ता हो गई थी कि उसकी सिलाई भी उधड़ गई और उसमें फफूंद तक लग गई लेकिन टोपी निजाम के सिर से नीचे नहीं उतरी।

आज के दौर में एक ऐसे भी महाराज है जो कि लोगों को धर्म का पाठ पढ़ाते हैं और तकनीकी तौर पर देश के राजा कहलाते है जानिए इस ग्रैफिक में-

अब रानियों और बेगमों का जिक्र करते चलें जिन्होंने शौक के मामले में नवाबों को टक्कर दी।

खूबसूरत बने रहने के लिए फूल और जड़ी बूटियों का इस्तेमाल करती थीं क्लियोपेट्रा

बेहद बुद्धिमान और 12 भाषाओं की जानकार मिस्र की रानी क्लियोपेट्रा के बारे में कौन नहीं जानता। आज भी उनकी सुंदरता के चर्चे होते हैं और सिनेमा व मीडिया में उनको लेकर बातें होती रहती हैं।

हाल ही में यूके में आई एक रिपोर्ट से पता चला है कि मिस्र में पुरातात्विक खुदाई के दौरान 200 से ज्यादा ऐसे सिक्के मिले हैं जिन पर क्लियोपेट्रा की आकृति है। ये सिक्के पहली सदी ईसा पूर्व के आस-पास के माने गए हैं।

क्लियोपेट्रा वाइन पीने की बेहद शौकीन थीं। यंग एज में जूलियस सीजर के अलावा क्लियोपेट्रा से रोमन जनरल मार्क एंथनी भी प्रेम करता था। रानी ने मार्क को अपना जीवनसाथी चुना जो कि बहादुर और तेज दिमाग के अलावा आदतों में उनके जैसा ही था।

मसलन दोनों की जिंदगी जीने का अंदाज और शौक एक से थे। इनके शौक की इंतहा थी कि दोनों अपने वफादारों के साथ रातभर पार्टी करते और शहर में भेष बदलकर घूमा करते।

कई और राजा-रानी हुए जिनके कारनामों ने उनको मशहूर कर दिया उनमें से तीन के बारे में जानिए इस ग्रैफिक से:

अब आइए बात करते हैं हिंदुस्तान की उस बेगम की, जिसकी ड्रेस डिजाइनिंग, जूलरी और सलीके का असर आज के मशहूर डिजाइनर्स के काम में भी दिखता है।

मुगल बेगम नूरजहां थीं ड्रेस डिजाइनर, आर्किटेक्ट, शिकार और इत्र की शौकीन

मुगलिया सल्तनत में नूरजहां एक ऐसी जानी-मानी हस्ती थीं, जिन्होंने बादशाह जहांगीर से रोमांस करने के अलावा, अपने शौक और राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को भी पूरा किया।

नूरजहां के पिता अफगानी सरदार थे जिन्होंने एक सिख सरदार से अपनी बेटी की शादी कराई थी। बाद में मुगलों से लड़ाई में नूरजहां के पिता और पति मारे गए। बाद में वह मुगल हरम में पहुंची तो अपने कौशल से पूरी सल्तनत पर छा गईं।
नूरजहां के पिता अफगानी सरदार थे जिन्होंने एक सिख सरदार से अपनी बेटी की शादी कराई थी। बाद में मुगलों से लड़ाई में नूरजहां के पिता और पति मारे गए। बाद में वह मुगल हरम में पहुंची तो अपने कौशल से पूरी सल्तनत पर छा गईं।

नूरजहां के पिता अफगानी सरदार एतमातउद्दौला थे। उनकी हत्या के बाद नूरजहां और उनकी मां को जहांगीर ने अपने हरम में जगह दी। हरम में मुगलिया दरबार की सभी महिलाएं और उनकी दासियां रहती थीं।

नूरजहां ने बादशाह जहांगीर के हरम में रहते हुए चोलियां, पोलकों, दुपट्‌टों, लहंगे के नए-नए डिजाइन बनाए। इतना ही नहीं, नूरजहां को खास तरह के तेल और इत्र बनाने में महारत हासिल थी। पहली बार गुलाब से इत्र बनाने का श्रेय नूरजहां को ही जाता है।

नूरजहां के शिकार के शौक को लेकर एक किस्सा मशहूर है। लेखिका रूबी लाल ने अपनी किताब 'एंप्रेस: द अस्टोनिशिंग रेन ऑफ़ नूरजहां' में लिखा है कि एक बार मुगल शासन के एक गांव में आदमखोर बाघ का कहर इतना बढ़ गया कि बात शाही महल तक पहुंच गई।

नूरजहां को इस बात का पता चला तो वह उसके शिकार के लिए हाथी पर सवार होकर निकल पड़ीं। नूरजहां का बाघ से जब आमना-सामना हुआ तो उन्होंने हाथी पर बैठे-बैठे बंदूक की एक गोली से उसको मौत के घाट उतार दिया।

आर्किटेक्ट की बहुत बड़ी जानकार नूरजहां ने अपने पिता एतमातउद्दौला का मकबरा आगरा में बनवाया जो कि आर्किटेक्चर के मामले में बेहतरीन नमूना है।

अब बात करते हैं ऐसी महारानी की जिन्होंने अलग अंदाज में जिंदगी जी और फैशन का नया ट्रेंड शुरू किया। उनकी फ्रेंच शिफॉन की साड़ियां हमेशा चर्चा में रहीं, जिसे भारतीय महिलाओं ने अपनाया।

जयपुर घराने की महारानी गायत्री देवी को शिकार और शिफॉन का शौक

20वीं सदी में जयपुर राजघराने की राजमाता गायत्री देवी दुनिया की सबसे खूबसूरत महिलाओं की लिस्ट में शामिल रही हैं। उनकी समाज सेवा और राजनीति के चर्चे तो आपने सुने होंगे। वह शिकार की भी बहुत बड़ी शौकीन थीं। महज 12 साल की उम्र में उन्होंने चीते का शिकार किया था। बता दें कि तब भारत में चीते खत्म नहीं हुए थे।

जयपुर घराने की महारानी गायत्री देवी को नये जमाने का फैशन बहुत लुभाता था। वेस्टर्न स्टाइल के कपड़े पहनना और घुड़सवारी करना उन्हें बेहद पसंद था। उन्होंने ऐसे ट्रेंड चलाए जिन्हें बाद में ऊंचे घरानों की महिलाओं ने बड़ी तेजी से अपनाया।
जयपुर घराने की महारानी गायत्री देवी को नये जमाने का फैशन बहुत लुभाता था। वेस्टर्न स्टाइल के कपड़े पहनना और घुड़सवारी करना उन्हें बेहद पसंद था। उन्होंने ऐसे ट्रेंड चलाए जिन्हें बाद में ऊंचे घरानों की महिलाओं ने बड़ी तेजी से अपनाया।

इस उम्र में ही उन्होंने अपने से 9 साल बड़े जयपुर के महाराज मानसिंह से प्यार किया और शादी कर रानी बनीं। राजमाता गायत्री को फैशन का एक नया ट्रेंड चलाने का क्रेडिट भी है। उन्होंने बेल बॉटम और फ्रेंच शिफॉन की साड़ी को अलग अंदाज में पहना जिसको महिलाओं ने फॉलो किया।

ऐसी ही एक और महारानी थीं जिन्हें अपनी जूतियों में हीरे-मोती जड़वाने का शौक था।

एक साथ 100 जोड़ी जूतों का ऑर्डर देने वाली महारानी, पसंद थे हीरे-मोती जड़े सैंडल

बड़ौदा के गायकवाड़ राजवंश से ताल्लुक रखने वाली इंदिरा देवी जूतियों की बहुत शौकीन थीं। इटली के साल्वातोर फेरागेमो उनके पसंदीदा वेस्टर्न डिजाइनर्स में थे।

महारानी इंदिरा देवी (1892-1968) ने जीवनसाथी चुनने में कोई कंप्रोमाइज नहीं किया। उनकी सगाई बचपन में हो गई थी, मगर जब वे कूच बिहार के छोटे युवराज जितेंद्र नारायण से मिलीं तो उन्हीं को दिल दे बैठीं और शादी कर ली।
महारानी इंदिरा देवी (1892-1968) ने जीवनसाथी चुनने में कोई कंप्रोमाइज नहीं किया। उनकी सगाई बचपन में हो गई थी, मगर जब वे कूच बिहार के छोटे युवराज जितेंद्र नारायण से मिलीं तो उन्हीं को दिल दे बैठीं और शादी कर ली।

साल्वातोर ने अपनी आत्मकथा में लिखा, एक बार महारानी ने उनकी कंपनी को एक साथ 100 जोड़ी जूते बनाने का ऑर्डर दिया, इसमें एक ऑर्डर इस तरह की सैंडल बनाने का था जिसमें हीरे-मोती जड़े हों। उन्हें ये हीरे-मोती अपने कलेक्शन के लिए चाहिए थे। लिहाजा उन्होंने ऑर्डर के साथ हीरे और मोती भी भेजे।

अब बात ऐसे सुल्तान की जिसकी दौलत के सामने मौजूदा समय के सबसे अमीर शख्स एलन मस्क की संपत्ति भी कम पड़ जाएगी।

आज के सबसे अमीर एलन मस्क की संपत्ति से ज्यादा दौलत वाला सुल्तान था सबसे बड़ा दानवीर

हाल ही में जारी फोर्ब्स रियल टाइम बिलेनियर इंडेक्स के मुताबिक, इस समय दुनिया के सबसे अमीर व्यक्ति एलन मस्क माने गए हैं जिनकी संपत्ति 2.18 लाख करोड़ रुपए आंकी गई है।

हैरानी की बात यह है कि मस्क की संपत्ति भी माली के सुल्तान मनसा मूसा (सन 1280-1337) की दौलत से कम ही है। मनसा मूसा के पास करीब 2.5 लाख करोड़ रुपए की दौलत थी।

13वीं-14वीं सदी में मूसा की सल्तनत आज के उत्तर अफ्रीकी देशों- मॉरिटानिया, सेनेगल, गांबिया, गिनी, बुर्किनाफासो, नाइजर, चाड, नाइजीरिया और माली तक फैली हुई थी।

मूसा ने इतना दान दिया कि पूरे इलाके में महंगाई बढ़ गई

हालांकि, दुनिया में दौलतमंद राजा-महाराजा तो बहुत हुए मगर मनसा मूसा ऐसे सुल्तान थे, जो दौलतमंद होने के साथ-साथ बहुत बड़े दानवीर भी रहे। वे ऐसे दानवीर थे कि एक बार मिस्र की यात्रा करने गए तो वहां के लोगों को इतना पैसे बांटे कि उस पूरे इलाके में महंगाई ही बढ़ गई।

यूरोपीय लोगों को जब मनसा मूसा की अकूत दौलत के बारे में पता चला तो उनमें से कई लोग इस हकीकत को जानने के लिए उनसे मिलने भी पहुंचे। जब यह बात पुख्ता हो गई तो यूरोपियनों ने कैटलन एटलस के नक्शे में माली की रियासत और उसके बादशाह मनसा मूसा का नाम शामिल किया।

दुनिया आज भले ही बदल गई हो लेकिन अभी भी कई देश ऐसे हैं जहां राजशाही मौजूद है। जानिए इस ग्रैफिक से:

ये तो हुई पुराने शासकों, नवाबों और रानियों की बात। अब चलते-चलते ऐसे सम्राट के बारे में भी जान लीजिए, जो अभी सलामत हैं और जिनकी दौलत को आज तक ठीक-ठीक मापा नहीं जा सका है।

आज के दौर में दुनिया के सबसे अमीर और ‘अय्याश’ सम्राट हैं थाईलैंड के 'राम दशम'

एशियाई देश थाईलैंड में आज भी राजशाही मौजूद है। यहां के सम्राट ‘राम दशम’ की छवि एक अय्याश व्यक्ति की मानी जाती है। कुछ समय पहले वे जर्मनी में दौरे के वक्त अपने हरम की महिलाओं के लिए पूरा होटल बुक करने की वजह से मीडिया की सुर्खियाें में बने थे।

उन पर रंगीनमिजाज और अय्याश होने का तमगा ऐसे ही नहीं लगा है। वे पांच शादियां कर चुके हैं जिनमें से तीन पत्नियों से वे तलाक ले चुके हैं जिनसे उनके 7 बच्चे हैं।

चौथी पत्नी सुतिदा तिजाई फ्लाइट अटेंडेंट रह चुकी हैं और पांचवीं पत्नी नीरामॉन आउनप्रोम सम्राट की बॉडीगार्ड और आर्मी ऑफिसर रही हैं। राम दशम थाईलैंड की जनता के बीच बहुत कम ही दिखाई पड़ते हैं। कहा जाता है कि वह ज्यादातर समय विदेश में बिताते हैं।

6 साल पहले 13 अक्टूबर को 'राम दशम' थाईलैंड की गद्दी पर बैठे थे। भूमिबोल अदुल्यादेज के निधन के बाद उन्होंने सम्राट का पद हासिल किया था। राम दशम का वास्तविक नाम महा वाचिरालोंगकोन है। आज के दौर में वे दुनिया के सबसे अमीर सम्राट माने गए हैं। फोर्ब्स के मुताबिक, उनकी कुल संपत्ति 2 से 4 लाख करोड़ रुपए के बीच है। यह एलन मस्क से दोगुनी हो सकती है।

ग्रैफिक्स: सत्यम परिडा

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