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बिंज वॉचिंग:वेबसीरीज ने की कजरारी अंखियों में किरकिरी

10 दिन पहलेलेखक: निशा सिन्हा
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  • दिनभर में एक या दो एपिसोड ही काफी है, वो भी ब्रेक लेकर देखें
  • वीकेंड में पूरी मूवी देखी जा सकती है, लेकिन वीक-डेज में स्क्रीन टाइम कम रखें

लगातार मोबाइल देखने से महिलाओं की आंखों पर बुरा असर पड़ा है। बता दें कि कोरोना के चलते लंबा लॉकडाउन चला, जिस दौरान अमेजन और नेटफ्लिक्स से लेकर कई नए सब्सक्रिप्शन लिए गए और खूब सीरीज देखी गई। ये सिलसिला चला आ रहा है। अब इसका असर महिलाओं की आंखों पर दिख रहा है। साथ ही बच्चों की ऑनलाइन स्टडी और दूसरी वजहों से बढ़े स्क्रीन टाइम ने इनकी आंखों का बैंड बजा दिया है।

आंखों का दुश्मन बन गया है मोबाइल
आंखों का दुश्मन बन गया है मोबाइल

लगी ओटीटी की लत
एक के बाद दूसरा और दूसरे के बाद तीसरा और फिर चौथा, पांचवां… छठां….जब तक वेबसीरीज का द एंड ना हो जाए। कोविड में लगी वेबसीरीज देखने की बुरी लत ने आंखों का बैंड बजा दिया है।वेलोसिटी एमआर के सर्वे में पाया गया कि लॉकडाउन के दिनों में अमेजन प्राइम के सब्सिक्रिप्शन में 67 प्रतिशत और नेटफ्लिक्स के सब्सिक्रिप्शन में 65 प्रतिशत बढ़त हुई। एक अनुमान के अनुसार केवल लॉकडाउन के दिनों में ही 80 प्रतिशत लोगों ने ओवर द टॉप प्लेटफॉर्म के लिए नए सब्सिक्रिप्शन लिए। यह आंकड़े साफ-साफ इशारा करते हैं कि किस तरह लोगों ने खूनखराबा, मारधाड़, गरमागरम सीन्स से भरे किस्सोंवाले सीरीज के खूब मजे लिए। जहां तक महिलाओं की बात है, तो ‘यूगव’ के डेटा के अनुसार वीडियो ऑन डिमांड देखनेवालों में महिलाओं और युवाओं की संख्या ज्यादा रही। उस दौरान बोरियत दूर करने वाले एंटरटेनमेंट प्रोग्राम्स अब इनकी आंखों को रुला रहे हैं।

लॉकडाउन में बढ़ा सोशल मीडिया से प्यार
लॉकडाउन में बढ़ा सोशल मीडिया से प्यार

मृगनयनियों के दोषी और भी
हिरण जैसी आंखों पर चश्मा चढ़ाने के लिए केवल ओटीटी को जिम्मेदार ठहराना सही नहीं है। सोशल मीडिया के सारे पॉपुलर एप्स जैसे वॉट्सएप, यूट्यूब और फेसबुक ने भी आंखों की चमक उड़ाने का काम किया है। वॉट्सएप पर चैटिंग-शैटिंग करने की आदत, यूट्यूब से कुकिंग सीखने के शौक और फेसबुक पर फोटो चस्पा करने वाली मोहब्बत को इसके लिए दोषी ठहराया जा सकता है।
क्या कहना है एक्सपर्ट का
सोशल साइट्स में वॉट्सएप को 92 प्रतिशत, यूट्यूब को 84 और फेसबुक को 80 प्रतिशत लोगों ने खंगाला। मुंबई के डॉ. अग्रवाल आई हॉस्पिटल की क्लिनिकल सर्विसेज हेड डॉ. नीता शाह यह स्वीकारती हैं कि कोविड के दिनों में बाहर की एक्टिविटीज कम हुई और स्क्रीन टाइम बढ़ गया। मोबाइल हो, टेबलेट हो, या फिर कंप्यूटर, इन सब गैजेट्स का सीधा असर आंखों पर पड़ा। लॉकडाउन खुलने के बाद बहुत सारे बच्चों और बड़ों की आंखों का पावर बढ़ा है। लेकिन महिलाओं पर इसका असर ज्यादा दिख रहा है।
इसमें एक फैक्टर बिंज वॉचिंग तो है, इसके साथ ही ऑनलाइन क्लासेज या स्टडी से जुड़ी दूसरी एक्टिविटीज में मांएं बच्चों की मदद कर रही हैं, इससे भी उनकी स्क्रीन टाइमिंग बढ़ी। फिर टीवी सीरियल्स को भी मोबाइल स्क्रीन पर देखा जा रहा है। जो दिन में नहीं देख पाते, वे सोते समय सीरियल्स देखते हैं। नतीजा ये है कि सोते समय भी आंखों को चैन नहीं मिल पा रहा है, ये सारी वजहें आंखों को थका रही हैं। इसके अलावा स्लीप पैटर्न पर भी इसका बुरा असर हो रहा है। जैसे अमेरिकी नेशनल स्लीप फाउंडेशन के मुताबिक, बिस्तर पर जाने के कम से कम आधे घंटे पहले मोबाइल या टीवी जैसी स्क्रीन से दूर हो जाना चाहिए। ऐसा न करने पर नींद न आने की समस्या होने लगती है। ये समस्या अब कमोबेश सभी को हो रही है कि वे ठीक से सो नहीं पाते। इसकी बड़ी वजह सोने से पहले बढ़ा स्क्रीन टाइम है।

ऑनलाइन स्टडी ने मां और बच्चे दोनों की आंखों को थकाया
ऑनलाइन स्टडी ने मां और बच्चे दोनों की आंखों को थकाया

सोते समय मोबाइल देखेंगे तो यही होगा
डॉक्टर्स बताते हैँ कि ऐसे भी कपल हैं, जिन्होंने रात को बच्चों के सो जाने पर पूरी की पूरी मूवी देख डाली। बहुत सारे लोगों को लंबी दूरी तय करके ऑफिस जाना पड़ता है और पूरे रास्ते वह मोबाइल पर एंटरटेनमेंट का सुख लेते हैं। जबकि सफर करते समय मोबाइल देखने से आंखों का और भी नुकसान होता है। कुछ लोगों के चश्मे का नंबर पहले से अधिक इसलिए बढ़ा क्योंकि लॉकडाउन की वजह से वे चेकअप के लिए नहीं आ सके। ऐसे कई मामलों में चश्मे का नंबर दोगुना हो गया। कोच्चि के अमृता हॉस्पिटल के डिपार्टमेंट ऑफ ऑफ्थेलमोलॉजी (नेत्ररोग) और विट्रिओ रेटिनल सर्जरी के डॉ. गोपाल एस पिल्लई के अनुसार आईटी सेक्टर में काम करनेवाली युवतियों की आंखों पर भी बुरा असर हुआ है। स्क्रीन टाइम बढ़ने से आंखों में ड्राइनेस आती है। ऐसा महसूस होता है जैसे आंखों में कचरा चला गया हो। लगातार कुछ चुभता हुआ लगता है। चिकित्सक से पूछ कर कुछ आईड्रॉप का इस्तेमाल करने से आंखों को सुकून पहुंचेगा।

अब और मत रुलाओ इन आंखों को
अब और मत रुलाओ इन आंखों को

दो एपिसोड में बस करें मैडम

  • रात में मोबाइल या टीवी देखने से बचें, क्योंकि दिनभर की थकी आंखों को रात को ही आराम मिलता है।
  • पूरी मूवी को एक ही बार में खत्म करने के बजाय इसे आधा- आधा करके 2 दिन में देखें
  • अगर कोई महिला टीवी, मोबाइल और कंप्यूटर लगातार देख रही है, तो उसे स्क्रीन टाइम को कंट्रोल करना चाहिए। जैसे दिनभर में टेलीविजन 1 से 1.5 घंटा देखें, मोबाइल पूरे दिन में आधा घंटा होना चाहिए, इसमें भी बीच-बीच में 5 या 10 मिनट ब्रेक लें।
  • ध्यान रहे महिलाएं अगर मां है, तो उनका स्क्रीन टाइम बच्चों की वजह से भी बढ़ जाता है।
  • गाड़ियों और मेट्रो से सफर करते समय मोबाइल पर पूरे के पूरे एपिसोड देखना या बिंज वॉचिंग करना खतरनाक है। इससे आंखों पर और भी बुरा असर पड़ेगा।
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