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डिजिटली एम्पावर्ड मदर्स:जब सब घर में कैद हो गए, सब कुछ ऑनलाइन हो गया, तब हमने भी बच्चों के लिए खुद को अपग्रेड कर लिया

नई दिल्ली16 दिन पहले
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मां बनने के बाद महिलाओं की जिंदगी बच्चों के इर्द-गिर्द सिमट जाती है, लेकिन आज हम बात करेंगे उन मांओं की, जिन्होंने बच्चे को जन्म देने के बाद भी नई-नई चीजें सीखने का रास्ता जारी रखा। खुद को डिजिटली एम्पावर्ड किया। घर-परिवार और बच्चों की जिम्मेदारी संभालते हुए कमाई का साधन तैयार किया। आज वे पति के कदम से कदम मिलाकर चल रहीं हैं। मदर्स डे सीरीज पर मिलिए ग्रेटर नोएडा की पूजा रावत, जयपुर की ज्योति सिंह और मुरैना की एस्सर जॉय मॉरिस से, जिन्होंने साबित किया कि सीखने की कोई उम्र नहीं होती...

1. पूजा रावत: नोएडा वालों को लगाया राजस्थानी स्वाद का चस्का
'आरोगो-सा' नाम से ऑनलाइन राजस्थानी फूड डिलीवर कराने वाली पूजा रावत 6 साल की बेटी, पति और ससुर के साथ ग्रेटर नोएडा में रहती हैं। पूजा बताती हैं,''साल 2014 में मेरी शादी हुई। दिसंबर, 2016 में एक प्यारी सी बेटी की मां बन गई। मेरी दुनिया मेरी बेटी और परिवार बन गया। मैं बच्ची को मेड के भरोसे छोड़कर बाहर काम करने नहीं जा सकती थी।''

ऑनलाइन राजस्थानी फूड डिलीवर कराने वाली पूजा रावत। पूजा अपनी 6 साल की बेटी की देखरेख के साथ-साथ अपना काम को भी बखूबी संभाल रहीं हैं।
ऑनलाइन राजस्थानी फूड डिलीवर कराने वाली पूजा रावत। पूजा अपनी 6 साल की बेटी की देखरेख के साथ-साथ अपना काम को भी बखूबी संभाल रहीं हैं।

कोरोना से पहले आम हाउस वाइफ की तरह मेरी भी जिंदगी की गाड़ी दौड़ रही थी। हर सुबह बेटी और पति के जागने से पहले बिस्तर छोड़ना। साफ-सफाई। नहाना-धोना और फिर किचन में घुस जाती। चाय और नाश्ता बनाती। उनके लिए टिफिन पैक करती। बेटी को तैयार करती। बेटी और पति के जाने के बाद घर के काम में लग जाती। बस यही चल रहा था। फिर एक रोज पूरा देश बंद हो गया। बेटी का स्कूल और पति का दफ्तर ऑनलाइन घर से ही चलने लगा।

अब पति और बेटी को घर से बाहर जाने की जल्दी नहीं थी तो मेरी भागदौड़ भी थोड़ी कम हो गई। हालांकि, बेटी की ऑनलाइन क्लासेज और होमवर्क का काम तो था ही। मुझे कुकिंग का बहुत शौक है। मेरी बेटी और परिवार को मेरे हाथ का खाना बहुत पसंद है। एक दिन मैंने सोचा कि अगर मैं फूड बिजनेस शुरू कर दूं तो खूब चलेगा। बस फिर क्या था। यूट्यूब पर वीडियो देख-देखकर जुलाई, 2020 में खुद को फूड डिलीवरी कंपनियों में रजिस्टर कराया। आरोगो-सा नाम से मेरा ऑनलाइन राजस्थानी रेस्तरां खुल गया। शुरुआत में तो ऑर्डर आते तो मेरे हाथ-पैर फूल जाया करते थे। कस्टमर्स के इंस्ट्रक्शन्स, डिलीवरी बॉय से कॉर्डिनेशन जैसी बहुत सारी चीजें समझने में वक्त लगा। अब एंजॉय करती हूं। हर दिन 10 से 20 तक ऑर्डर आते हैं। महीने पर 60 से 80 हजार तक कमा रही हूं। नोएडा वालों को मेरे हाथ का बना खाना खूब भाता है।

2. एस्सर जॉय मॉरिस: बच्चों के लिए की टेक्नोलॉजी से दोस्ती
मध्य प्रदेश के मुरैना की रहने वाली एस्सर जॉय मॉरिस शहर के सेंट मेरी स्कूल की टीचर हैं। मॉरिस की दो बेटियां- एक 9वीं और 5वीं में पढ़ती हैं। टीचर मॉरिस बताती हैं कि हर दिन घरेलू काम निपटाकर स्कूल पहुंचती। वहां छोटे बच्चों को प्यार से दुलार से पढ़ाती। नई-नई चीजें कहानी और किस्से सुनाकर याद कराती। उनकी कॉपियां चेक करते हुए नोट लगाती ताकि वे मोटिवेट हों। गंदी आदत हो या फिर झिझक सबको प्यार और कंफर्ट वाला माहौल देकर सुधार देती।

सेंट मेरी स्कूल की टीचर एस्सर जॉय मॉरिस। टीचर मॉरिस अपनी दोनों बेटियों की पढ़ाई-लिखाई कराने के साथ ही नन्हे मासूमों को भी क, ख, ग सिखा रहीं हैं।
सेंट मेरी स्कूल की टीचर एस्सर जॉय मॉरिस। टीचर मॉरिस अपनी दोनों बेटियों की पढ़ाई-लिखाई कराने के साथ ही नन्हे मासूमों को भी क, ख, ग सिखा रहीं हैं।

एस्सर जॉय मॉरिस कहती हैं कि जब स्कूल बंद हुआ और ऑनलाइन क्लासेस शुरू हुईं तो मुझे बहुत दिक्कत हुई। क्योंकि उससे पहले सोशल मीडिया या फिर गूगल पर कुछ पढ़ने तक ही सीमित थी। ऑनलाइन ग्रुप बनाना। गूगल मीट का लिंक क्रिएट करना और फिर बच्चों को पढ़ाना। कभी नेटवर्क चले जाते तो कभी आवाज नहीं आती। सबसे बड़ी दिक्कत तब आती, जब बच्चे होमवर्क भेजते। कोई पीडीएफ भेजता तो कोई मोबाइल से फोटो क्लिक कर के भेज देता। ऐसे में होमवर्क चेक कर नोट लगाने की दिक्कत। बेटियों से पूछकर और यूट्यूब वीडियो देखकर खुद हर दिन कुछ सीखती। आज मैं ऑनलाइन क्लासेज लेनी हो या फिर होमवर्क पर नोट लगाना सब अच्छे से आता है। अब मैं टीचर से स्मार्ट टीचर बन चुकी हूं।

3. ज्योति सिंह: बेबी के लिए बंद की बेकरी, अब घर-घर पहुंचा रहीं राजस्थानी आर्ट
राजस्थान की राजधानी जयपुर की रहने वाली ज्योति सिंह पहले बेकरी चलाती थी। उनके हाथ की कुकीज, केक और कप केक बड़े से बच्चों तक खूब पसंद आते थे। साल 2020 में ज्योति प्रेग्नेंट हुईं तो कुकीज, केक और कप केक बनाने के लिए घंटों मेहनत करना मुश्किल हो गया। ऐसे में उन्होंने बेकरी छोड़ दी। साल 2021 में उन्होंने एक बेटे का जन्म दिया।

जयपुर की रहने वाली ज्योति सिंह। ज्योति ने अपने बेटे के इस दुनिया में आने के बाद रीसेलिंग के जरिये राजस्थानी आर्ट को देश-विदेश पहुंचा रहीं हैं।
जयपुर की रहने वाली ज्योति सिंह। ज्योति ने अपने बेटे के इस दुनिया में आने के बाद रीसेलिंग के जरिये राजस्थानी आर्ट को देश-विदेश पहुंचा रहीं हैं।

ज्योति सिंह ने सोचा कि ऐसा किया जाए, जिससे बच्चे की देखभाल भी होती रहे और काम भी चलता रहे। बहुत सोचने के बाद ज्योति ने जयपुर के बाजार को एक्सप्लोर किया। तब फैसला किया कि राजस्थानी आर्ट वाली बेडशीट और साड़ियों को रीसेल करने का काम ऑनलाइन शुरू किया जा सकता है। इसके बाद ज्योति ने कुछ दुकानदारों से डील की और ई-कॉमर्स कंपनियों के साथ खुद को रजिस्टर किया। अब वे उन दुकानों से सामान खरीद कर देश के कई राज्यों और विदेश में भी कस्टमर्स को सप्लाई कराती हैं।

ज्योति कहती हैं कि जब बेकरी चलाती थी, तब ऑनलाइन की जरूरत ही नहीं पड़ी। आसपास जानने वाले ही इतने कस्टमर्स आते थे कि कभी ऑनलाइन के बारे में सोचा नहीं। जब रीसेलिंग का काम शुरू किया तब बहुत सारी चीजें सीखनी पड़ीं। अब घर में रहकर बेटे के साथ वक्त भी बिताती हूं और चार पैसे भी कमाती हूं। साथ ही राजस्थानी आर्ट को देश-विदेश पहुंचाती हूं।