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कैंपस में चमकीं, मुख्यधारा में फीकी पड़ीं:कन्हैया-जिग्नेश के आसपास ही सियासत में रखा था कदम, आज आइशी, शेहला जैसी दमदार छात्र नेता कहां रह गईं

नई दिल्ली21 दिन पहले
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शेहला रशीद - Dainik Bhaskar
शेहला रशीद

जेएनयू छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष और युवा नेता कन्हैया कुमार काफी दिनों बाद चर्चा में हैं। 2019 लोकसभा चुनाव के बाद से वो लगभग सुर्खियों से गायब थे। अब वो लेफ्ट का दामन छोड़ चुके हैं और कांग्रेस का हाथ थामने जा रहे हैं। कन्हैया के अलावा गुजरात के युवा नेता जिग्नेश मेवानी भी कांग्रेस में शामिल हो रहे हैं।

कन्हैया और जिग्नेश दोनों ही छात्र और आंदोलनकारी राजनीति से मुख्यधारा की राजनीति तक पहुंचे हैं। उनके आसपास रही कई ऐसी लड़कियां भी रही हैं, जिन्होंने छात्र राजनीति में कमाल किया। कैंपस की राजनीति से वह न्यूज की सुर्खियों बनीं। देश के युवाओं को इनका अंदाज भी खूब भाया। लेकिन ये लड़कियां राष्ट्रीय राजनीति में पीछे रह गईं। आइए जानते हैं कि आजकल कहां हैं ये युवा नेता-

दीप्सिता धार

दीप्सिता पश्चिम बंगाल के हावड़ा जिले से आती हैं। इन्हें राजनीति विरासत में मिली है, यह कहना गलत नहीं होगा। दीप्सिता के दादा पदम निधि धार दोमजूर विधानसभा सीट से विधायक थे। पिता पीयूष धार और मां दीपिका ठाकुर चक्रवर्ती दोनों ही ट्रांसपोर्ट विभाग में काम करते हैं। साथ ही इनकी मां राजनीति में भी सक्रिय हैं। वो सीपीएम की एरिया कमेटी सदस्य हैं। दीप्सिता ने आशुतोष कॉलेज से जियोग्राफी में ग्रेजुएशन किया। आगे की पढ़ाई के लिए उन्होंने देश के सबसे प्रतिष्ठित संस्थान जवाहर लाल नेहरु यूनिवर्सिटी का रुख किया। यहां से जियोग्राफी से ही एमफिल और पीएचडी की। अपने ग्रेजुएशन के दिनों में स्टूडेंट फेडरेशन ऑफ इंडिया (SFI)से जुड़ीं। एसएफआई के लिए कई जिम्मेदारियां संभालीं। देश के अलग-अलग इलाके के छात्र आंदोलन और सामाजिक धरने में काफी सक्रिय रहीं।

दीप्सिता धार
दीप्सिता धार

साल 2018 में स्टूडेंट फेडरेशन ऑफ इंडिया के शिमला में आयोजित कांफ्रेंस में दीप्सिता को ऑल इंडिया ज्वाइंट सेक्रेट्री बनाया गया। इस साल पश्चिम बंगाल में हुए विधानसभा चुनाव में सीपीएम ने दीप्सिता को बल्ली विधानसभा से अपना उम्मीदवार बनाया। दीप्सिता के सामने यहां पर बीजेपी ने आईसीसी के पूर्व अध्यक्ष जगमोहन डालमिया की बेटी वैशाली डालमिया और टीएमसी ने डॉ. राणा चटर्जी को मैदान में उतारा। दीप्सिता चुनाव हार गईं। लेकिन दीप्सिता के भाषण और उम्मीदवारी दोनों ही काफी सुर्खियों में रहीं। हालांकि, इसके बाद वह सुर्खियों में नहीं आ सकीं।

आइशी घोष

दीप्सिता की तरह आइशी भी पश्चिम बंगाल से आती हैं। आइशी का जन्म दुर्गापुर में हुआ। मां शर्मिष्ठा घोष हाउसवाइफ हैं और पिता देबशीष मुखर्जी सरकारी कर्मचारी। दिल्ली यूनिवर्सिटी के दौलत राम कॉलेज से ग्रेजुएशन करने के बाद मास्टर डिग्री के लिए आइशी जेएनयू पहुंचीं। यहां स्कूल ऑफ इंटरनेशनल रिलेशन सेंटर से पीएचडी की। साल 2019 में वो जेनएयू की अध्यक्ष चुनी गईं। यूनिवर्सिटी प्रशासन द्वारा फीस वृद्धि, बिजली बिल में वृद्धि, लाइब्रेरी फंडिंग को कम करना, ड्रेस और टाइम रिस्ट्रिक्शन को लेकर किए गए बदलाव के खिलाफ काफी मुखर रहीं। आइशी मौजूदा सरकार की नीतियों की बड़ी आलोचक हैं। कई मौकों पर उन्होंने खुलकर सरकार की नीतियों की आलोचना की है। साल 2020 के जनवरी में जेएनयू कैंपस में कुछ अज्ञात लोगों ने घुसकर छात्रों से मारपीट की थी। उस वक्त आइशी को काफी चोटें आई थीं।

आइशी घोष
आइशी घोष

इस घटना के बाद आइशी को देशभर से समर्थन मिला। बॉलीवुड अभिनेत्री दीपिका पादुकोण उनके समर्थन में जेएनयू पहुंचीं। केरल के मुख्यंत्री पिनराई विजयन भी उनसे से मिले। हालांकि इस पूरे विवाद में दिल्ली पुलिस ने आइशी को ही आरोपी बनाया, जिसे लेकर दिल्ली पुलिस की काफी आलोचना हुई थी। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में सीपीएम ने आइशी को अपनी पारंपरिक सीट जमुरिया विधानसभा से उम्मीदवार बनाया। उनके कद का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि पार्टी ने अपने मौजूदा विधायक का टिकट काटकर जेएनयू अध्यक्ष को मैदान में उतारा। हालांकि आइशी छात्र राजनीति का जादू बरकरार नहीं रख पाईं और टीएमसी उम्मदीवार हरेराम सिंह से 46 हजार से चुनाव हार गईं। इसके बाद से वह राजीनित पटल पर नहीं आईं।

ऋचा सिंह

साल 2015 में इलाहाबाद यूनिवर्सिटी की पहली महिला अध्यक्ष बनकर सुर्खियों में आईं। यूनिवर्सिटी के इतिहास में यह पहला मौका था जब कोई महिला यूनिवर्सिटी की अध्यक्ष चुनी गईं। ऋचा की पहचान उनकी कार्यशैली भी रही है। कैंपस में एबीवीपी के मजबूत पकड़ के बाद भी वो निर्दलीय चुनाव लड़ीं और जीतीं। यूनिवर्सिटी में इतिहास बदलने के बाद ऋचा देश भर के लोगों की नजर में उस वक्त आईं, जब इन्होंने योगी आदित्यनाथ को कैंपस में घुसने नहीं दिया था। उस समय योगी आदित्यनाथ कैंपस में एक बिल्डिंग के उद्घाटन के लिए बतौर चीफ गेस्ट पहुंचे थे।

ऋचा सिंह
ऋचा सिंह

पढ़ाई की बात करें अलीगढ़ की ऋचा ने तो एजुकेशन के लिए इलाहाबाद यूनिवर्सिटी को चुना। यहां से इन्होंने ग्लोबल एंड डेवलपमेंट स्टडीज सेंटर से पीएचडी की। एमफिल में वो गोल्ड मेडलस्टि रही हैं। राजनीतिक करियर की बात करें तो कैंपस की राजनीति के बाद इन्होंने समाजवादी पार्टी ज्वाइन की। पार्टी के टिकट पर प्रयागराज जनपद के शहर पश्चिम विधानसभा क्षेत्र से चुनाव भी लड़ीं। फिलहाल वो पार्टी की स्पोक्सपर्सन हैं, लेकिन सुर्खियों से दूर हैं।

शेहला रशीद शोरा

शेहला रशीद शोरा छात्र राजनीति के सबसे चर्चित नामों में से एक। जम्मू-कश्मीर के श्रीनगर के हब्बा कडाल इलाके से आती हैं। श्रीनगर के नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी से कंप्यूटर सांइस की डिग्री ली। बतौर सॉफ्टवेयर इंजीनियर एचसीएल के साथ कुछ समय तक काम भी किया। लेकिन आगे की पढ़ाई के लिए वो जेएनयू पहुंचीं। सोशियोलॉजी से एमए, लॉ एंड गर्वनेंस से एमफिल और फिर पीएचडी की डिग्री भी जेएनयू से ही ली। जेएनयू में पढ़ाई के दौरान वो छात्र राजनीति में काफी एक्टिव रहीं। शेहला 2010 से ही सोशल वर्क में एक्टिव रहीं। कश्मीर के मुद्दों को कई मंचों पर उठाती थीं। लाइमलाइट में साल 2015 में आईं, जब वो जेएनयू छात्रसंघ की उपाध्यक्ष चुनी गईं। साल 2016 में जब जेएनयू में विवादित देशविरोधी नारे लगे, उस समय शेहला जेएनयू की उपाध्यक्ष थीं और कन्हैया कुमार अध्यक्ष। इस घटना के बाद दोनों ही देशभर में चर्चित नाम बन गए।

शेहला रशीद शोरा
शेहला रशीद शोरा

शेहला कैंपस राजनीति के बाद मुख्य राजनीति के लिए अपने राज्य को चुना। प्रशासनिक सेवा छोड़ राजनीति में आए शाह फैसल की पार्टी जम्मू-कश्मीर पीपुल्स मूवमेंट (JKPM) पार्टी को ज्वाइन किया। चुनाव भी लड़ीं लेकिन हार का सामना करना पड़ा। फिर पार्टी से इस्तीफा दे दिया। फिलहाल वह राजनीतिक हलचल से दूर हैं।

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