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महिला नेता क्यों रह जाती हैं ऊंची कुर्सियों से दूर:देश को दूसरी महिला PM का आज भी इंतजार, सुषमा-ममता समेत लंबी रही है कतार

नई दिल्ली5 दिन पहलेलेखक: निशा सिन्हा
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मुझसे एक इंटरव्यू में पूर्व मुख्यमंत्री स्व. शीला दीक्षित ने स्वीकारा था कि महिला कार्यकर्ता से वरिष्ठ पद तक पहुंचने की राहें बहुत कठिन होती हैं। उनके लिए यह स्थिति आसान थी लेकिन सबके साथ ऐसा नहीं होता। कांग्रेस नेता अलका लांबा और भाजपा नेता रेखा गुप्ता भी यह स्वीकारती हैं कि महिला नेताओं के चरित्र पर कीचड़ उछाल कर उनके मनोबल को तोड़ने का प्रयास किया जाता है। उन्हें आगे बढ़ने के लिए कदम-कदम पर अग्नि परीक्षा देनी पड़ती है। पार्टी कोई भी हो, महिला नेताओं का रास्ता हमेशा कांटों भरा रहा है।

हर महिला नेता ममता या शीला या जयललिता क्यों नहीं बन पाती?
जयललिता, ममता बनर्जी, मायावती, शीला दीक्षित जैसे कुछ नाम को छोड़ दें, तो उच्च पदों पर महिला नेताओं को कम ही देखा गया। मार्गरेट अल्वा, रेणुका चौधरी, गिरिजा व्यास, उमा भारती वे नाम हैं जो नब्बे की दशक में कद्दावर महिला नेताओं के रूप में देखी जाती थीं लेकिन जनता के बीच होते हुए भी ये नाम आज गुमनाम से क्यों हैं ? आज की पीढ़ी को इनके बारे में जानने के लिए गूगल का सहारा क्यों लेना पड़ रहा क्यों पड़ रहा है ? कभी राजनीति में इन महिला नेताओं के शीर्ष पर जाने की संभावनाएं दिखती थीं। चुनिंदा महिला नेताओं को छोड़ दें तो वो राज्य की राजनीति में भी शीर्ष पर नहीं पहुंच सकीं। कुछ राज्य में शीर्ष पर पहुंचीं लेकिन केंद्रीय राजनीति में सर्वाइव नहीं कर सकीं। आलम यह है कि देश को इंदिरा गांधी के बाद अलावा दूसरी महिला प्रधानमंत्री नहीं मिली।

फायर ब्रांड उमा भारती भी देश की महिला नेताओं के लिए एक प्रेरणा रही हैं।
फायर ब्रांड उमा भारती भी देश की महिला नेताओं के लिए एक प्रेरणा रही हैं।

मार्गरेट अल्वा गर्वनर बनकर रह गईं
मार्गरेट अल्वा कांग्रेस की बड़ी महिला नेता के तौर पर जानी जाती रही हैं। वे गोवा, गुजरात, राजस्थान, उत्तराखंड की गवर्नर रहीं। पेशे से वकील मार्गरेट अल्वा ने तीन बार केंद्रीय मंत्री रहीं। अहम पदों और संसद की समितियों की सदस्य होने के बावजूद उनको सक्रिय राजनीति से किनारे कर दिया गया। कर्नाटक में 2008 विधानसभा चुनावों में टिकट बंटवारे को लेकर उनके सोनिया गांधी से मतभेद सामने आए और उनको पार्टी से बाहर कर दिया गया। बाद में अल्वा ने कई इंटरव्यू और किताब के माध्यम से अपनी बातें सामने रखीं।

भारतीय महिला मोर्चा की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रेखा गुप्ता (बाएं) सक्रिय राजनीति से जुड़ी हैं।
भारतीय महिला मोर्चा की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रेखा गुप्ता (बाएं) सक्रिय राजनीति से जुड़ी हैं।

महिलाओं को सरकार में अहम पद नहीं मिले
भाजपा वरिष्ठ नेता रेखा गुप्ता कहती हैं कि आजादी के बाद से ही केंद्रीय कैबिनेट में महिलाओं को अहम जिम्मेदारी नहीं मिल पाती थी। वह कहती हैं कि जब इंदिरा जी प्रधानमंत्री थी, तो उनके मंत्रिमंडल में महिला नेता नहीं थीं। उसके पहले नेहरू जी के समय भी यही हाल रहा। तब ऐसा माना ही नहीं जाता था कि इनको ऊंचा महकमा भी सौंपा जा सकता है।

गिरिजा व्यास ने हासिल किए कई मुकाम
कवियत्री, लेखिका और राजनीतिज्ञ गिरिजा व्यास केवल 25 साल की उम्र में राजस्थान विधान सभा की सदस्य बनी। वह दो बार राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष भी रहीं। नरसिंह्म राव सरकार में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय और मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यपूीए सरकार की केंद्रीय कैबिनेट में शहरी आवास और गरीबी उन्मूलन मंत्रालय की जिम्मेदारी संभालने का मौका मिला। लेकिन देखा जाए, तो कांग्रेस में लंबे समय तक रहने के बावजूद इनको योग्यता के हिसाब से कम आंका गया।

कई राज्यों में होने वाले चुनावों में अलका लांबा महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं।
कई राज्यों में होने वाले चुनावों में अलका लांबा महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं।

कांग्रेस की महिला नेता अलका लांबा बताती है कि प्रियंका गांधी ने यूपी चुनाव में महिलाओं के लिए 40% सीटें आरक्षित की हैं। केंद्र में दूसरी बार मोदी जी की पूर्ण बहुमत की सरकार है। इनके घोषणा पत्र में 33% महिला आरक्षण की बात है। अब इनके कार्यकाल के दो साल बचे हैं, ऐसे में ईमानदार नीयत के साथ ये बड़ी आसानी से इसे पास कर सकते हैं क्योंकि अगर आनेवाली सरकार पूर्ण बहुमत की नहीं हुई, तो यह आरक्षण बिल फिर से लटक जाएगा।

सुषमा स्वराज भाजपा के आक्रामक और दक्ष राजनेताओं में रहीं लेकिन विश्लेषक कहते हैं कि उनकी प्रतिभा के साथ भी न्याय नहीं हो सका।
सुषमा स्वराज भाजपा के आक्रामक और दक्ष राजनेताओं में रहीं लेकिन विश्लेषक कहते हैं कि उनकी प्रतिभा के साथ भी न्याय नहीं हो सका।

तो क्या सबको ममता बनर्जी बनना जरूरी
ममता बनर्जी ने कांग्रेस में रहने के दौरान यह भांप लिया था कि यहां रहने के दौरान उनके हाथ बहुत कुछ लगने वाला नहीं। शायद यही वजह था कि उन्होंने तृणमूल कांग्रेस का गठन कर अपनी योग्यता साबित की। कांग्रेस की नेता कृष्णा तीर्थ का कहना है कि इंदिरा जी की तरह कई और महिला नेता प्रधानमंत्री बन सकती हैं लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि हमारा पुरुष प्रधान समाज कई बार इसमें बाधा बन जाता है। समाज में ही नहीं घरों में भी बेटों का वर्चस्व देखा गया है। ऐसी सोच को कुछ हद तक इसके लिए जिम्मेदार ठहराया जा सकता है।

महिलाओं को गर्व महसूस कराने के लिए यह एक तस्वीर ही पर्याप्त है।
महिलाओं को गर्व महसूस कराने के लिए यह एक तस्वीर ही पर्याप्त है।

महिलाओं को पीछे रखने के लिए सिस्टम जिम्मेदार
साल 2021 के मध्य में नरेंद्र मोदी सरकार में हुए विस्तार के बाद महिला मंत्रियों की संख्या 11 (पहले 6) हो गई। साल 2004 के बाद केंद्र की सरकार में सबसे अधिक महिला मंत्री इस बार दिखीं। भारतीय जनता पार्टी की महिला नेता रेखा गुप्ता का कहना है कि भाजपा की सरकार आने के बाद से हमेशा ही महिलाओं को उच्च पदों पर बिठाया गया है। सुषमा स्वराज, निर्मला सीतामरण, स्मृति ईरानी जैसी महिला नेता ने अहम पदभार संभाले हैं। यह दिखाता है कि बराबरी की बात केवल पन्नों तक सीमित नहीं रह गई है।

हर घर में इंदिरा देखने की चाहत है, तो महिलाओं की भागीदारी को मजबूती देनी होगी।
हर घर में इंदिरा देखने की चाहत है, तो महिलाओं की भागीदारी को मजबूती देनी होगी।

33 प्रतिशत आरक्षण पर लफ्फाजी कब तक
देश में चुनाव प्रचार शुरू होते ही या महिला दिवस के आसपास महिलाओं के लिए 33 %आरक्षण की मांग तेज हो जाती है लेकिन यह पिछले 25 सालों से यह बिल लटक रहा है। हर बार पार्टियां एक-दूसरे पर इसे पास न होने का इल्जाम मढ़ कर मुद्दे से कन्नी काट लेती हैं। अलका लांबा कहती हैं कि पंचायतों और नगर निकायों में 33% महिला आरक्षण का श्रेय राजीव गांधी को जाता है। इसके बाद करीब 10 लाख महिलाएं सामने आईं। बेशक आरोप लगते रहते हैं कि कुछ महिला सरपंचों की जगह उनके पति एक्टिव हैं लेकिन इस बात से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता कि सक्रिय राजनीति में भागीदार इन महिलाओं की एक बड़ी संख्या समाज के लिए निर्णय लेने ल्गी है।

महिला लीडर्स की बढ़ती संख्या दूसरी लड़कियों के लिए उदाहरण बन रही है।
महिला लीडर्स की बढ़ती संख्या दूसरी लड़कियों के लिए उदाहरण बन रही है।

वुमन लीडर बनने के लिए क्या जरूरी
रेखा गुप्ता स्वीकारती हैं कि वह एक आम वैश्य परिवार की लड़की रही हैं। अपने माता-पिता के सपोर्ट ने उनकी राहें आसान कीं। पिछले कुछ सालों से महिलाओं ने हर क्षेत्र में खुद को साबित किया है यही वजह है कि आज आम घराें की लड़कियां भी राजनीति का रुख कर रही हैं। फैमिली और सोसाइटी सिस्टम में और भी बदलाव आए, तो परिणाम सकारात्मक दिखेंगे।

केपीएमजी की ओर से बिजनेस में वुमन लीडरशिप रोल पर हुए सर्वे में शामिल महिलाओं में 86% ने माना कि वह महिला लीडर को देखकर आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित होती हैं। वहीं करीब 88% महिलाओं ने माना कि महिला लीडर्स की बढ़ रही संख्या उन्हें आगे बढ़ने को प्रेरित करती है। यह स्टडी इस बात का इशारा करती है कि उच्च पदों पर पदस्थ मुट्‌ठीभर महिला नेता उन चिंगारियों की तरह है, जो कल इंदिरा नाम की मशाल बन खड़ी हो सकती हैं।

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