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चूड़ी कारोबार से टीबी की चपेट में बच्चे:धुएं से भरे बंद कमरे में 8 से 12 घंटे करते हैं काम, चूड़ियां छांटने में कट जाते हैं हाथ

4 महीने पहलेलेखक: मीना
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सावन आते ही बाजार चूड़ियों से सज जाते हैं। ये चूड़ियां जितनी रूमानी दिखती हैं, दूसरी तरफ उतनी ही नन्हे हाथों की मजदूरी से सनी होती हैं। इन हाथों में किताब की जगह दूसरे हाथों को सजाने की जिम्मेदारी होती है।

बच्चे किन परिस्थितियों में चूड़ी इंडस्ट्री से जुड़ते हैं, प्रतिभा होते हुए भी स्कूली शिक्षा पूरी नहीं कर पाते और कैसी-कैसी गंभीर बीमारियों से जूझ रहे हैं। देखें फिरोजाबाद की चूड़ी इंडस्ट्री में चाइल्ड लेबर की मार्मिक तस्वीर।

आगे बढ़ने से पहले ये चार कहानियां पढ़ लें…

कहानी -1
9 साल की रेखा बगल में रहने वाली बूढ़ी दादी के घर से चूड़ियों का बेलन लेने आई है। एक चूड़ी के बेलन में लगभग 55 चूड़ियां होती हैं जिनमें रंगाई, डेकोरेशन का काम होना है। चूड़ी के ये बेलन आसपास के घरों में जाते हैं और पूरा घर इन पर काम करता है। रेखा कहती है कि स्कूल से आते ही वह चूड़ियों को सजाने में लग जाती है। एक चूड़ी रंगने के दो रुपए मिलते हैं। माल कम पड़ता है तो बगल वाली दादी से ले लेती हूं। हमारा खेलना, कूदना सबकुछ चूड़ियों के साथ जुड़ा है।

कहानी - 2

बड़े से बेसमेंट के घुप अंधेरे में लकड़ी की टेबल और दीवार पर काला रंग पोतकर बनाया ब्लैक बोर्ड है। इस पर सत्येंद्र मर्करी डालकर कुछ प्रयोग कर रहे हैं। 20 साल के सत्येंद्र बीएसी फाइनल ईयर में हैं, लेकिन सरकारी कॉलेज में लैब की अच्छी सुविधा न होने से उन्होंने घर में ही छोटी सी लैब बनाई है। इस लैब के सभी संसाधन उन्होंने चूड़ी की जुड़ाई की कमाई से जुटाए हैं।

सत्येंद्र कहते हैं, ‘मेरे पिता की मृत्यु कुछ साल पहले हो गई। चार भाई-बहन हैं और मैं सबसे बड़ा हूं। मेरे कंधों पर जिम्मेदारियां ज्यादा हैं, लेकिन आमदनी कुछ नहीं। मैंने दिन रात मोमबत्ती के उजाले में चूड़ियों की जुड़ाई करके कुछ पैसे जुटाए जो लैब में लगा दिए। कई बार स्थितियां इतनी खराब होती हैं कि समझ नहीं आता कि आज रात खाने की व्यवस्था कैसे की जाए। मुझे खूब पढ़ना है, पर्यावरण को बचाने के लिए कुछ रिसर्च करना चाहता हूं। आइडिया भी मेरे पास है, लेकिन पैसे नहीं हैं। तीन साल की बीएससी को भी तीन बार छोड़ना पड़ा। पैसे की कमी के चलते हर बार पढ़ाई बीच में छोड़नी पड़ती है।’

कहानी -3
15 साल के भारतेंदु रतन नीरज ने अभी 10वीं पास की है। इन्होंने ‘श्रेष्ठ’ योजना के तहत एंट्रेंस टेस्ट दिया और पूरे भारत में 167वी रैंक हासिल की। श्रेष्ठ योजना के तहत अनुसूचित जाति से आने वाले मेधावी छात्रों की स्कूली शिक्षा पूरी कराई जाती है।

भारतेंदु कहते हैं कि हमारे पास न लाइट की सुविधा है और ही पढ़ने के लिए कुर्सी मेज है। अगर है तो हमारे हाथों की मेहनत। स्कूल से आने के बाद मैं चूड़ियों की जुड़ाई के काम में लग जाता हूं। ज्यादा से ज्यादा काम करता हूं, ताकि अधिक मजदूरी मिले और मेरी पढ़ाई न रुके।

कहानी -4
बबीता ने इस साल बीए खत्म किया है। उन्होंने निफ्ट का एंट्रेंस भी निकाल लिया, लेकिन इतने पैसे नहीं थे कि किसी आर्ट कॉलेज में दाखिला ले पातीं। बबीता ने अपने बनाए पोट्रेट कहीं कोने में सहेज कर रखे हैं। कुछ तस्वीरें ऐसी हैं जिनपर अभी रंग नहीं लगे हैं, क्योंकि रंग खरीदने के लिए पैसे ही नहीं हैं।

एक तरफ यह खुशी की बात है कि बच्चों ने चूड़ी का काम करके अपनी पढ़ाई पूरी करने के लिए पैसा जुगाड़ा है। दूसरी तरफ, यह देश का दुर्भाग्य है कि बाल मजदूरी निषेध होने के बावजूद बच्चा पढ़ाई पर पूरा ध्यान लगाने के बजाए मजबूरी में मजदूरी कर रहा है।

चूड़ी इंडस्ट्री में लगे हैं 60 हजार बाल मजदूर
2011 की जनगणना से पता चलता है कि 5 से 14 वर्ष के करीब 26 करोड़ बच्चों में से 1 करोड़ से अधिक बच्चे बाल श्रम में शामिल हैं, जो देश के ग्रामीण हिस्से में स्थित हैं। ‘महिला एवं बाल अधिकार बचाओ’ अभियान के संयोजक और विकास संस्थान के संस्थापक दिलीप सेवार्थी का कहना है कि कानून के अनुसार 18 साल से कम उम्र के बच्चे से मजदूरी कराना अपराध है, लेकिन पूरे फिरोजाबाद में 6 लाख मजदूर हैं, जिसमें महिला, पुरुष और बच्चे शामिल हैं। इनमें 60 हजार बच्चे हैं जो चूड़ी के काम में लगे हैं।

नोबेल शांति पुरस्‍कार से सम्‍मानित कैलाश सत्‍यार्थी के साथ ‘बचपन बचाओ आंदोलन’ में काम कर चुके दिलीप सेवार्थी कहते हैं कि कारखाने के मालिक ठेकेदारों को काम देते हैं और ठेकेदार यह काम घरों में देता है। घरों में ज्यादातर बच्चे काम करते हैं। इनकी मजदूरी छुपे हुए श्रम में चली जाती है और इनका इसे मेहनताना भी नहीं मिलता। ठेकेदार जो कहीं भी लिखित दस्तावेजों में नहीं। यहां ज्यादातर काम बोलचाल में होता है, कहीं भी कुछ लिखा हुआ नहीं है। ठेकेदार घर के बड़ों को काम देता है और गरीबी के चलते घर के बच्चों को भी चूड़ी के काम में लगना पड़ता है।

‘जितना मिलता है उतने में खर्चे पूरे नहीं होते’
कांच एवं चूड़ी मजदूर सभा के संस्थापक और पिछले कई सालों से मजदूरों के हकों की मांग कर रहे, शरीर में बेड़ियां पहने समाजसेवी रामदास मानव कहते हैं कि कारखाने से चूड़ी कटकर आने के बाद उसकी जुड़ाई, झलाई, चकलाई, डेकोरेशन और पैकिंग के काम में ज्यादातर बच्चे लगे हैं।

एक्टिविस्ट रामदास के अनुसार, ठेकेदार डेकोरेशन का महीने में तीन से चार हजार रुपए एक बच्चे को देता है, जबकि उसी काम के बड़े को आठ से नौ हजार रुपए मिलते हैं। कायदे से जो मजदूरी बड़ों को भी दी जाती है वह इतनी कम है कि उनके घर के खर्च तक नहीं चल पाते। ऐसे में पूरे घर को चूड़ियों के काम में लगना पड़ता है।

‘बंद कमरे में घुटतीं सांसें’
बच्चे बिना बिजली के घंटों काम करते हैं। लंबे समय काम करने से उनकी सेहत पर बुरा असर पड़ता है। ‘फ्लेम यूनिवर्सिटी’ ने साल 2020 में ‘चूड़ियां’ नाम से रिसर्च की जिसमें सामने आया कि चूड़ी की झलाई, जुड़ाई बंद कमरों में छोटी सी लैंप के आगे होती है। लैंप में हवा लगेगी तो चूड़ी जुड़ नहीं पाएगी। इस वजह घर के अंदर वायु प्रदूषण बढ़ता है।

पतली सी गली में इधर-उधर पड़े कुछ खिलौन, फैला आंगन और एक बंद खिड़की, दरवाजे से आती घिर्र घिर्र की आवाज। दरवाजा खटखटाने पर मालूम हुआ कि 27 साल की आरती लैम्प पर चूड़ियों की जुड़ाई कर रही हैं। कमरे से घिर्र घिर्र की आवाज इसलिए आ रही थी क्योंकि लैम्प की रोशनी को तेजी देने के लिए एक छोटी सी मोटर से प्रेशर दिया जाता है। जिस जगह आरती काम कर रही हैं, वहां ऊपर मूंगफली और चने के कुछ डिब्बे रखे थे। पूछने पर मालूम हुआ कि उनके दो बच्चों को टीबी है। बड़े बेटे की उम्र की उम्र आठ और छोटे की तीन साल है। आरती कहती हैं, तीन बेटों में से बस बीच वाले को टीबी नहीं है। हम दोनों बेटों को डॉक्टर को दिखा रहे हैं, लेकिन हमारे खानदान में किसी को टीबी नहीं था, इन्हें न जाने क्यों हो गया है?

दिल्ली के राजन बाबू ट्यूबर क्लोसिस अस्पताल में डॉ अनुराग शर्मा का कहना है कि टीबी एक संक्रामक रोग है। अगर घर के आसपास या घर में किसी को टीबी होता है तो बाकियों को इसके होने की आशंका बढ़ जाती है। साथ ही छोटे घरों में ज़्यादा लोगो के रहने, गंदगी और वेंटिलेशन की कमी से भी यह रोग फैलता है।

फिरोजाबाद के चीफ मेडिकल ऑफिसर दिनेश प्रेमी का कहना है कि हमारे पास स्किन डिजीज, आंखों की परेशानियां और फेफड़ों से जुड़ी दिक्कतें लेकर लोग आते हैं।

तो वहीं, जिला अस्पताल में जनरल फिजिशियन डॉ. गौरव गुप्ता का कहना है कि यहां ज्यादातर बच्चियां खून की कमी, सर्दी-खांसी जुकाम और निमोनिया जैसी बीमारियों को लेकर आती हैं। मौसमी बीमारियां इन्हें जल्दी पकड़ लेती हैं।

अफसर बात नहीं करना चाहते
फिरोजाबाद के चूड़ी बाजार में लगे बच्चों की समस्याएं सुनने के बाद जब असिस्टेंट लेबर कमिश्नर (एलएससी) अरुण कुमार सिंह से बात करने की कोशिश की गई तो कोई जानकारी नहीं मिली। दूसरी बार जब फोन पर बात की गई तो फिर सवालों के जवाब नहीं मिल सके। वे बार-बार टालते रहे।

‘जो हक की मांग करेगा वो जेल भेज दिया जाएगा’
समाजसेवी दिलीप सेवार्थी का कहना है कि यहां जो बच्चों के हक या मजदूरों के हक की बात करता है, उसी पर उल्टे मुकदमे चला दिए जाते हैं। साल 1997 में मुझे जेल भी हुई क्योंकि उस समय एमसी मेहता बनाम तमिलनाड़ु सरकार केस में सुप्रीम कोर्ट का जजमेंट आया जिसमें था कि जो व्यक्ति बच्चों से काम कराएगा उसे 20 हजार रुपए और राज्य सरकार को पांच हजार रुपए का जुर्माना देना होगा।

इसी मांग को मैं फिरोजाबाद में लागू कराना चाहता था और जिला मजिस्ट्रेट के कार्यालय में जाकर धरना देने लगा। मेरी मांगों को मानने के बजाए मुझ पर उल्टे मुकदमे चले और जेल हुई। आज तक वो केस चल रहा है। कोरोना के चलते बढ़ी महंगाई के कारण बाल मजदूरी तेजी से बढ़ी है। जो मजदूरों के हक की मांग करता है उस पर मुकदमे ठोक दिए जाते हैं और यह धंधा चुपचाप ऐसे ही चलता रहता है।

…तो हल क्या है?
दिलीप सेवार्थी आगे कहते हैं- 'जब तक मजदूरों को इतनी मजदूरी नहीं मिलेगी जितने में उनके पूरे परिवार का पेट भर जाए और मुफ्त शिक्षा मुफ्त नहीं मिलेगी तब तक ये बाल मजदूरी बढ़ती रहेगी। सरकारों को फ्री राशन देने के बजाए फ्री शिक्षा और ज्यादा से ज्यादा सरकारी स्कूल-कॉलेजों की व्यवस्था करनी होगी ताकि पीढ़ियों में बढ़ रही बाल मजदूरी रुक सके।'

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