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वो 42 साल जिंदा लाश की तरह रही:रेप बाद बरसों कोमा में गुजरे, जान जाने के बाद बना इच्छामृत्यु का कानून

नई दिल्ली3 महीने पहलेलेखक: सुनाक्षी गुप्ता
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कर्नाटक के एक छोटे से गांव हल्दीपुर से सपनों की नगरी मुंबई में पढ़ाई करने और अपनी पहचान बनाने आई एक लड़की। बचपन में पिता का साया उठा। मेडिकल की ट्रेनिंग लेकर नर्स बनी। लोगों की सेवा में दिन-रात निकालने वाली 25 साल की युवा, ईमानदार और मेहनती लड़की अरुणा शानबाग। जिससे प्यार किया उसके साथ सात फेरे लेने की तैयारी कर रही थी। मगर 27 नवंबर 1973 की रात को कुछ ऐसा हुआ जिसके बाद से इस खूबसूरत और मेहनती लड़की के जीवन में हमेशा के लिए अंधेरा छा गया।

मुंबई के किंग एडवर्ड मेमोरियल हॉस्पिटल में बतौर नर्स काम करने वाली अरुणा का उन्हीं के अस्पताल के वार्डबॉय सोहनलाल वाल्मीकि ने बलात्कार किया। वो सिर्फ यहीं नहीं रुका बल्कि कुत्ते के गले में बांधी जाने वाली चेन को अरुणा की गर्दन पर बांधकर उसे इतनी तेजी से खींचा कि अरुणा की गले की नसें दब गई। दिमाग में ऑक्सीजन और खून पहुंचाने वाली नसें ब्लॉक होने से अरुणा कोमा में चली गई। उसके बोलने-सुनने की शक्ति भी हमेशा के लिए खो गई। 42 साल तक अरुणा उसी दर्द और सदमे को बर्दाश्त करती हुई कोमा में रही।

आरोपी को कभी रेप की सजा नहीं मिली। एक हंसती-खेलती लड़की को जिंदा लाश बनाकर छोड़ देने वाले आरोपी सोहनलाल को सिर्फ 7 साल की सजा मिली। जब अरुणा ने कोर्ट में इच्छामृत्यु की गुहार लगाई तो उसे मौत भी नसीब न हो सकी।

पढ़िए अरुण शानबाग की कहानी जिसने दुनिया में सबसे लंबे समय एक जिंदा लाश बनकर जीवन काटा। जाने आखिर क्या हुआ था 27 नवंबर की उस रात। पढ़ें, आरुणा के जीवन की पूरी कहानी, जिनके संघर्ष ने बदला हजारों लोगों का जीवन।

मुंबई के किंग एडवर्ड मेमोरियल हॉस्पिटल में बतौर नर्स काम करती थीं अरुणा शानबाग।
मुंबई के किंग एडवर्ड मेमोरियल हॉस्पिटल में बतौर नर्स काम करती थीं अरुणा शानबाग।

पढ़ाई लिखाई में तेज अरुणा बनना चाहती थी नर्स... दो महीने में होनी थी शादी
10 भाई-बहनों के बड़े से परिवार में एक थी अरुणा। मात्र 10 साल की थी जब पिता चल बसे। घर के बड़े भाई-बहन ही जिम्मेदारी संभाल रहे थे। खुद पढ़ लिख नहीं पाए मगर बहन को आगे बढ़ाया। अरुणा को पढ़ाई का काफी शौक था, इसलिए वह मुंबई में अपनी बड़ी बहन के पास नर्सिंग की पढ़ाई करने पहुंची।

नर्स की ट्रेनिंग लेने के बाद 1971 में मुंबई के किंग एडवर्ड मेमोरियल हॉस्पिटल में पहली नौकरी जूनियर नर्स की लगी। यहां एक विंग था जहां कुत्तों के ऊपर दवाओं के एक्सपेरिमेंट हुआ करते थे। इसी डिपार्टमेंट में अरुणा कुत्तों को दवा देने का काम करती थीं।

दो साल काम करने के दौरान इसी अस्पताल के एक रेजिडेंट डॉक्टर से अरुणा को प्यार होता है। परिवार वालों ने दोनों की मंगनी भी करा दी थी और जनवरी 1974 में शादी होनी तय हुई। अरुणा भी अपने प्यार के साथ सात फेरे लेने की तैयारियों में जुटी गई।

अस्पताल के वार्डबॉय सोहनलाल वाल्मीकि ने किया था अरुणा का बलात्कार।
अस्पताल के वार्डबॉय सोहनलाल वाल्मीकि ने किया था अरुणा का बलात्कार।

कुत्तों का खाना चुराता था सोहनलाल, नर्स ने की शिकायत तो बदले में बना दिया जिंदा लाश
अस्पताल के इसी डिपार्टमेंट में दिहाड़ी पर साफ-सफाई का काम करता था वॉर्डबॉय सोहनलाल। काम करते हुए दो महीने ही हुए थे कि अरुणा ने सोहनलाल को कुत्तों का खाना चुराते हुए पकड़ लिया। सोहनलाल की मक्कारी से वह काफी परेशान थी शिकायत भी कर चुकी थी। दोनों में आए दिन झड़प होती रहती।

इसी बीच एक दिन सोहनलाल की सास बीमार हुई और उसने अरुणा से छुट्टी की अपील की, मगर अरुणा ने इसे कामचोरी का बहाना समझकर सोहनलाल को फटकार लगा दी, अपनी बेइज्जती होते देख सोहनलाल ने अरुणा से बदला लेने की ठानी। वर्ष 1973 की 27 नवंबर की उसी रात को करीब 8 बजे अरुणा अपनी ड्यूटी पूरी कर यूनिफॉर्म बदलने बेसमेंट में पहुंची। वहां पहले से सोहनलाल मौजूद था। जैसे ही अरुणा कपड़े बदल रही होती है सोहनलाल पीछे से आ जाता है। पहले वह अरुणा के साथ हाथापाई करता है, दोनों के बीच झगड़ा होता है। इसी बीच सोहनलाल अरुणा के साथ जबरदस्ती करने की कोशिश करता है।

सोहनलाल के पास पहले से ही कुत्तों को बांधने वाली चेन मौजूद थी। वह उस चेन को अरुणा के गले में डाल देता है और अरुणा पर काबू पाने के लिए चेन को जोर से कसता है। इस खींचतानी में गले की चेन इतनी तेज कस जाती है कि अरुणा की नसें दब जाती हैं जिससे दिमाग में खून पहुंचना बंद हो जाता है। अरुणा बेहोश हो जाती है। इसके बाद कहा जाता है कि सोहनलाल ने अरुणा का बलात्कार किया और फिर वहां से भाग निकला। करीब 10 घंटे तक अरुणा उसी अवस्था में फर्श पर पड़ी रही। सुबह जब दूसरा सफाईकर्मी वहां पहुंचा तब जाकर कहीं अरुणा को इलाज के लिए ले जाया गया।

डॉक्टर को शुरुआती जांच में पता लगता है कि अरुणा पहले ही कोमा में जा चुकी हैं। जब सारे टेस्ट की रिपोर्ट आती है तो पता चलता है कि गर्दन में फंसी चेन के कारण अरुणा के दिमाग में ऑक्सीजन और खून की सप्लाई बंद हो गई थी। इसका असर यह हुआ कि वह न सिर्फ कोमा में चली गई बल्कि पैरालाइज्ड भी हो गई। उसके सुनने-समझने की शक्ति लगभग खत्म हो चुकी थी, ठीक से कुछ दिखाई भी नहीं देता था। एक तरह से वह बस जिंदा लाश बनकर रह गई।

किंग एडवर्ड मेमोरियल हॉस्पिटल के वॉर्ड नंबर 4 का रूम ही अरुणा का पर्मानेंट घर था।
किंग एडवर्ड मेमोरियल हॉस्पिटल के वॉर्ड नंबर 4 का रूम ही अरुणा का पर्मानेंट घर था।

रेप भी अरुणा का हुआ और सजा भी उसे ही मिली ...
अरुणा का यौन उत्पीड़न करने के बावजूद सोहनलाल के खिलाफ रेप की धाराएं नहीं लगाई गईं और न ही उसे इसकी सजा मिली। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक सोहनलाल ने अरुणा का वजाइनल नहीं बल्कि एनल रेप किया था। इसलिए उस दौरान मेडिकल एग्जामिनेशन में जब अरुणा का फिंगर टेस्ट किया गया तब वह वर्जिन पाई गई। इसलिए सोहनलाल पर रेप के चार्जेज नहीं लगाए गए।

कई रिपोर्ट्स में यह भी लिखा गया है कि हॉस्पिटल ने शर्मिंदगी से बचने के लिए भी एनल रेप के बारे में रिपोर्ट नहीं की, यहां तक की अरुणा के मंगेतर ने भी शिकायतकर्ता बनने की हिम्मत नहीं दिखाई।

अरुणा की इस हालत पर पूरा अस्पताल हैरान था। धीरे-धीरे मुंबई के बाकी अस्पतालों में काम करने वाली नर्सों ने सुरक्षा की मांग उठाते हुए प्रदर्शन किए। जब सरकार और प्रशासन पर दबाव बना तो किसी तरह मुंबई पुलिस ने आरोपी सोहनलाल को ढूंढकर गिरफ्तार किया। कोर्ट में पेशी हुई और अदालत ने सोहनलाल को 'अटेम्प्ट टू मर्डर' यानी जान से मारने की कोशिश और अरुणा की कान की बालियां चुराने के जुर्म में सिर्फ 7 साल की सजा सुनाई। मगर रेप के लिए न ही पुलिस ने अपनी रिपोर्ट में कोई सेक्शन जोड़ा, न मुकदमा चला और न ही दोषी को सजा मिली।

उधर,आरोपी सोहनलाल अपनी सजा काटने पुणे की जेल चला गया। इधर अरुणा की हालत एक लाश जैसी ही थी।

38 साल बाद सुप्रीम कोर्ट में अरुणा के लिए यूथनेशिया (euthanasia) मर्सी किलिंग की अपील की गई।
38 साल बाद सुप्रीम कोर्ट में अरुणा के लिए यूथनेशिया (euthanasia) मर्सी किलिंग की अपील की गई।

रिश्ते भी पीछे छूटते गए ... तो परायों ने अपनाया
अरुणा के ठीक होने की कोई उम्मीद नहीं थी। डॉक्टरों के पास कोई इलाज था नहीं, सिर्फ चमत्कार के इंतजार में साल बीत रहे थे, अरुणा किसी को भी पहचानने से इंकार कर देती थी। ऐसे में धीरे - धीरे अरुणा के सारे रिश्ते भी उनसे दूर होते गए। वह डॉक्टर जिससे उनकी शादी होने वाली थी, उसने भी हॉस्पिटल आना बंद कर दिया। दूसरे शहर में नौकरी ढूंढ ली, 5 साल बाद वह भी अरुणा को भूल गए और नई जिंदगी बसा ली।

मुंबई में रहने वाली बहन ने माली हालत ठीक न होने का बात कहकर आना बंद किया तो उनके बाकी के भाई-बहन और परिवार जो कि कर्नाटक में रहता था शुरुआत में तो अरुणा से मिलने आते फिर धीरे-धीरे उन्होंने भी जिंदा लाश से दूरी बना ली। इस तरह अरुणा शानबाग किंग एडवर्ड मेमोरियल हॉस्पिटल के वॉर्ड नंबर 4 के रूम में एक बेड पर जिंदा लाश की तरह पड़ी रही।

इसके बाद एक वक्त ऐसा आया जब बीएमसी बॉम्बे म्यूनिसिपल कॉर्पोरेशन के अस्पताल में रह रही अरुणा के लिए बीएमसी ने कहा कि वह उनकी वजह से एक बेड और रूम पर्मानेंट घिर गया है तो उन्हें अस्पताल से बाहर निकालने का फैसला लिया। परिवार ने गरीबी की मजबूरी बताकर रखने से इंकार कर दिया तो अस्पताल का पूरा स्टाफ उनका परिवार बनकर बीएमसी से सामने खड़ा हो गया। आखिर में बीएमसी को झुकना पड़ा, अरुणा को उसी अस्पताल में रहने की इजाजत मिली।

हर साल हॉस्पिटल का स्टाफ मनाता था जन्मदिन
हॉस्पिटल की नर्सों ने आपस में तय किया कि वह रोजाना उसकी ड्यूटी निभाएंगी। हालांकि उन्हें यह अच्छे से पता था कि इस मरीज से उन्हें कभी फीस नहीं मिलेगी। नर्स उन्हें पाइप के जरिए खाना खिलाती, कपड़े बदलती, बेडशीट बदलती, कभी नहलाती, उनके नाखून काटती और बाल बनाती। यह तीमारदारी होती रहती थी और वक्त के साथ उनका हॉस्पिटल के स्टाफ के साथ परिवार जैसा रिश्ता बन गया।

यहां तक कि 1 जून को जब अरुणा का जन्मदिन आता। उनके कमरे में एक छोटा सा बर्थडे सेलिब्रेशन होता। यह परंपरा पूरे 42 साल तक चलती रही। अरुणा को लता मंगेशकर के गाने बहुत पसंद थे, तो इस दिन उनके पसंद के गाने बजाए जाते। म्यूजिक सिस्टम लगाया जाता। अरुणा को फिश करी बहुत पसंद थी तो इन दिन उन्हें फिश करी टेस्ट कराई जाती। मगर अरुणा की हालत में कोई बदलाव नहीं आया। वह जैसी पहले दिन थी वैसी ही इतने साल रहीं।

हर साल अस्पताल का स्टाफ 1 जून को अरुणा का जन्मदिन मनाता था।
हर साल अस्पताल का स्टाफ 1 जून को अरुणा का जन्मदिन मनाता था।

कोमा में भी बेचैन हो जाती थी अरुणा... होती थी तकलीफ
अरुणा भले ही चल-बोल नहीं सकती थी। इशारा करने में भी असमर्थ थी मगर डॉक्टरों का मानना था कि वह सबकुछ महसूस जरूर करती थी। जब कई साल बाद अरुणा की हालत बेहतर हुई तब नर्स उन्हें उस वार्ड नंबर 4 से निकालकर व्हीलचेयर पर धूप दिखाने या अस्पताल घुमाने ले जाती, लोग उन्हें देखते थे।

मीडिया में यह केस काफी चर्चा में रहा था, सभी को अरुणा के बारे में पता था, इसलिए अस्पताल में आने वाले दूसरे तीमारदार भी उन्हें पहचान जाते थे और उंगली से उनकी ओर इशारा करके बात करते थे। अस्पताल की नर्स बताती हैं कि अरुणा को कोमा में होते हुए भी इस बात का अहसास होता था, उन्हें लगता था कि लोग उन्हें देखकर उसी घटना के बारे में बात कर रहे हैं, यह सोचकर वह बेचैन हो जाती। उन्हें इस बेचैनी से बचाने के लिए उनको पब्लिक में न ले जाने का फैसला लिया। उन्हें सिर्फ रूम में रखा जाता। कभी कभार खिड़की के पर्दे खोले जाते। मगर सभी को पता था कि अरुणा को कहां रखा गया है तो लोग वहां से भी इशारे करते, इस कारण कई बार अरुणा की हालत खराब हो गई। फिर खिड़की में भी शटर लगाने पड़े।

मीडिया कर्मी ने उठाई थी इच्छामृत्यु की मांग, लिखी थी किताब
कुछ साल और बीते, एक मीडिया कर्मी अरुणा से मिलने पहुंची। उन्होंने अस्पताल की नर्सों से बात कर अरुणा की कहानी के ऊपर एक किताब लिखी। साल 2011 में यानी घटना के 38 साल बाद सुप्रीम कोर्ट में वह एक अर्जी दायर करती हैं कि अरुणा शानबाग को इच्छामृत्यु की इजाजत दी जानी चाहिए। तब यूथनेशिया (euthanasia) शब्द ज्यादा चर्चित हुआ जिसे मर्सी किलिंग या इच्छामृत्यु भी कहा जाता है। उन्होंने कहा कि 38 साल से कोमा में रहने वाली अरुणा तकलीफ में है और वह अपनी तकलीफ किसी को बता भी नहीं सकती हैं, इसलिए उन्हें इच्छामृत्यु की इजाजत मिलनी चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने पिटीशन पर फैसला सुनाया और मर्सी किलिंग की इजाजत देने से इंकार कर दिया। इस दफा पहली बार यह मुद्दा उठा कि अगर कोई व्यक्ति इस हालत में है कि उसे बहुत तकलीफ है और ठीक होने की कोई उम्मीद नहीं बची है तो क्या उसे इच्छामृत्यु की इजाजत दी जानी चाहिए। इस मुद्दे को लेकर देशभर में काफी बहस चली।

कोर्ट ने कहा कि संविधान के आर्टिकल 21 में हमें जीने का अधिकार दिया गया है। अगर हम किसी को मर्सी किलिंग या यूथनेशिया की परमिशन दे देते हैं तो यह आर्टिकल 21 का उल्लंघन होगा, क्योंकि हम किसी को मरने के लिए नहीं कह सकते। दूसरा, अगर हम इसके लिए इजाजत दे देते हैं तो यह आत्महत्या को लेकर जो कानून बना है उसका भी विरोध करेगा। इसलिए अरुणा शानबाग को कोर्ट ने इच्छामृत्यु देने से इंकार कर दिया था।

हालांकि इसमें डॉक्टरों की रिपोर्ट पर भी सवाल किए गए, साथ ही फैमिली की परमिशन भी चाहिए होती है मगर उनका कोई परिवार नहीं था, सिर्फ हॉस्पिटल का स्टाफ ही उनका परिवार था। इस बीच डॉक्टरों की रिपोर्ट आई जिसमें लिखा था कि अरुणा कोमा में है, मगर सांसें और धड़कनें चल रही हैं।

अस्पताल के स्टाफ ने अरुणा के रिश्तेदारों के साथ किया था अरुणा का अंतिम संस्कार।
अस्पताल के स्टाफ ने अरुणा के रिश्तेदारों के साथ किया था अरुणा का अंतिम संस्कार।

निमोनिया से हुई मौत, अंतिम संस्कार के लिए आया पूरा अस्पताल
केस के 4 साल और बीते, `8 नई 2015 को कोमा में जाने के 42 साल बाद अरुणा को निमोनिया हुआ जिसके कारण उनकी मौत हो गई। वह उसी अस्पताल में अपनी आखिरी सांस लेती हैं, जहां उन्होंने नौकरी की, जहां उनका रेप हुआ, भयानक हादसा हुआ, उसी वार्ड नंबर 4 के कमरे में जहां वह 42 साल तक जिंदा लाश बनकर जीती रहीं।

अरुणा की धड़कनें बंद होने के बाद अचानक से उनकी दो रिश्तेदार आकर कहती हैं कि इनका अंतिम संस्कार हम करेंगे। जिसके बाद किंग एडवर्ड हॉस्पिटल की सभी नर्स एकसाथ खड़ी हुईं और कहा कि हम ही इनकी रिश्तेदार हैं। 42 साल तक हमने इसकी देखभाल की है, इसलिए इनका अंतिम संस्कार का हक भी सिर्फ हमें होना चाहिए। इस मुद्दे पर काफी बहस हुई और अंत में यह फैसला लिया गया कि रिश्तेदारों की मौजूदगी में अरुणा का अंतिम संस्कार किया जाएगा। अपनी 42 साल की मेहमान को अंतिम विदाई देने के लिए अस्पताल का पूरा स्टाफ वहां मौजूद रहा।

1973 को कोमा में गई थीं अरुणा, 42 साल बाद निमोनिया के कारण उनकी मौत हुई।
1973 को कोमा में गई थीं अरुणा, 42 साल बाद निमोनिया के कारण उनकी मौत हुई।

सोहनलाल ने कहा ‘मैंने रेप नहीं किया’
सोहनलाल साल 1982 में रिहा हो गया था उसके बाद से उसका अता-पता नहीं था। अरुणा की मौत के बाद सोहनलाल को ढूंढते हुए महाराष्ट्र का एक रिपोर्टर यूपी के हापुड़ में पहुंचता है तो पता लगा कि वह अपनी ससुराल में रह रहा है। जेल में सजा के दौरान उसकी एक बेटी की मौत हो गई। आरोपी ने कहा कि इस हादसे ने उसे भी झकझोर दिया था। उसने हादसे की बात तो स्वीकारी पर अंत तक यही कहा कि उसने रेप नहीं किया।

भारत में मिली पैसिव यूथनेशिया की इजाजत
इस केस के बाद भारत में पैसिव यूथनेशिया की इजाजत दी गई। Passive Euthanasia में डॉक्टर्स उस मरीज का लाइफ सपोर्ट सिस्टम हटा देते हैं, जिसकी जीने की उम्मीद खत्म हो चुकी है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कोमा में जा चुके या मौत की कगार पर पहुंच चुके लोगों को वसीयत (Living Will) के आधार पर निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) का हक होगा। उसे सम्मान से जीने का हक है तो सम्मान से मरने का भी हक है।

सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया है कि लिविंग विल पर भी मरीज के परिवार की इजाजत जरूरी होगी। साथ ही एक्सपर्ट डॉक्टरों की टीम भी इजाजत देगी, जो यह तय करेगी कि मरीज का अब ठीक हो पाना नामुमकिन है।