दुनिया में सबसे ज्यादा खाया जाता है केला:‘लोहे के चने’ जैसे इसके बीज, MP की बैगा जनजाति में परिवार नियोजन का साधन

नई दिल्ली2 महीने पहलेलेखक: अनिमेष मुखर्जी
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दुनिया की सबसे बड़ी रीटेल चेन वॉलमार्ट में सबसे ज़्यादा बिकने वाली चीज़ क्या है? जवाब है केले। जी हां, पूरी दुनिया में फैले वॉलमार्ट के स्टोर्स में सबसे ज़्यादा केला ही बिकता है। दूसरा नंबर टॉयलेट पेपर का है।

फलों की बात करते समय आम और सेब सारी लोकप्रियता चुरा ले जाते हैं, लेकिन सरकारी स्कूलों के मिड-डे मील से लेकर साउथ दिल्ली, साउथ बॉम्बे और मैनहटन के महंगे अपार्टमेंट तक एक जैसी मौजूदगी रखने वाला केला दुनिया का सबसे ज़्यादा खाया जाने वाला फ्रूट है। नवरात्र के उपवास हों, या बैचलर्स और जिमगोअर्स का नाश्ता, केले से ही पेट पूजा होती है।

हेल्दी फूड होने के अलावा भी केला एक ऐसा फल है जिसने दुनिया के इतिहास, व्यापार और राजनीति को बहुत ज़्यादा बदला है। इसीलिए हम राजनीति में ‘बनाना रिपब्लिक’ जैसा शब्द सुनते हैं।

सुनहरी उंगलियों जैसे दिखने वाले इस फल के राजनीतिक शिकंजे की बात भी करेंगे, लेकिन उससे पहले भारत और केले के सदियों पुराने रिश्ते को समझते हैं।

करीब 8 हजार साल पहले भारत आया था केला

माना जाता है कि केले की पैदाइश दक्षिण पूर्व एशिया के मलेशिया, इंडोनेशिया और फिलीपींस में कहीं हुई और यह लगभग 6,000 ईसा पूर्व में भारत आ गया। यानी, हम भारतीय प्राचीन काल से ही केला खा रहे हैं और इसके पेड़ अलग-अलग तरह से संस्कृति में समाए हुए हैं।

आज भारत के 29 में से 26 राज्यों में केला उगाया जाता है, लेकिन इसका सबसे ज़्यादा उत्पादन दक्षिण भारतीय राज्यों में होता है।

जन्नत के वर्जित फल की कहानी में ‘सेब’ को टक्कर देता है ‘केला’

संस्कृत में केले को दो नाम दिए गए; कुछ ने इसे ‘मोचा’ कहा और कुछ ने ‘कदली’। भारतीय भाषाओं ने ‘कदली’ को ज़्यादा सहजता से अपनाया, जबकि सिकंदर के सैनिक जब भारत से वापस गए तो केले के पेड़ साथ ले गए और उन्होंने लैटिन में इसे ‘मोचा’ से ‘मूसा’ कर दिया।

इस कहानी के बीच इस ग्राफिक से जान लेते हैं कि दुनिया में केले की कौन-कौन सी वैरायटी पाई जाती है

वनस्पति विज्ञान में खाने योग्य केले का नाम ‘मूसा पैराडिसिका’ है जिसका अर्थ होता है ‘जन्नत का पेड़।’ अब दो सवाल उठते हैं कि खाने योग्य केले से हमारा क्या मतलब है। दूसरा सवाल-जन्नत का वर्जित फल तो सेब है, फिर कहानी में केले की एंट्री कैसे हुई?

ईसाइयों के ‘आदम और हव्वा’ की कहानी में भी केले का जिक्र

दूसरे सवाल का जवाब पहले देते हैं। रोमन कैथोलिक चर्च के प्रचारक जब पहली बार अफ़्रीकी देशों में पहुंचे तो उन्हें केले के दर्शन हुए। इन लोगों ने इसे देखकर कहा कि यह परफेक्ट फ्रूट है।

इसे बराबर बांटा जा सकता है, इसके छिलके के अंदर का फल बिना मेहनत के निकल सकता है और अनछुआ यानी प्योर रहता है। केले के बीच में जो हल्की काली सी आकृति दिखती है उसे ईसाइयों ने क्रॉस जैसा माना और इसे ‘जन्नत का पेड़’ कहा।

कुछ यहां तक मानने लगे कि आदम और हव्वा की कहानी में वर्जित फल सेब नहीं केला था और वे दोनों अंजीर नहीं केले के पत्ते लपेटते थे।

एकमात्र फल जिसका पाली ग्रंथों, वेदों और भगवद्गीता में भी जिक्र

ईसाइयों की तरह बौद्ध अनुयायियों को केले के बीच में पृथ्वी की उर्वरता का चिह्न दिखा, तो उत्तर भारत में हिंदू धर्म वाले इसमें नारायण का वास मानते हैं। इसके अलावा इसे गुरु यानी बृहस्पति का प्रतीक भी माना जाता है। तुलसीदास के शब्दों में कहें तो, ‘जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी।’

बंगाल में दुर्गा पूजा के समय सप्तमी वाले दिन केले को लाल किनारी वाली सफेद साड़ी पहनाकर गणेश के बगल में खड़ा किया जाता है और इसे शक्ति का एक रूप मानकर ‘कॉला बोऊ’ यानी ‘केला वधु’ के नाम से पूजा जाता है। केला एकमात्र फल है जिसका जिक्र पाली ग्रंथों, वेदों और भगवद् गीता तीनों में मिलता है।

असली केले के बीज दांत तोड़ सकते हैं

अब केले के अंदर बनी इस छवि से पहले सवाल का रास्ता निकलता है। केले की मूल प्रजातियां जंगली केला कहलाती हैं। हरे रंग के ये केले उंगली जितने लंबे होते हैं और इनमें काले बीज भरे होते हैं।

काले रंग के ये सख्त बीज किसी के भी दांत तोड़ने की क्षमता रखते हैं। लोगों ने इन जंगली केलों की अलग-अलग प्रजातियों का क्रॉस कराया और समय के साथ हमें वो केला मिला जो आज हमारी फलों की टोकरी का हिस्सा है।

यह खाने योग्य केला बाहर से बड़ा सुनहरा और बीज रहित होता है, जिसके चलते केला बीज से नहीं उगता, बल्कि इसके पेड़ की जड़ से नया अंकुर निकलता है और उससे नया पौधा बनता है। यही कारण है कि किसी एक प्रजाति के सभी केले के पेड़ एक दूसरे के क्लोन हैं।

केला अपने मीठे स्वाद और औषधीय गुणों के अलावा भी काफी उपयोगी होता है, जिसे इस ग्राफिक के जरिए बताया गया है

सारे केले एक-दूसरे के क्लोन हैं, इसलिए सब एक जैसे मीठे

केले की इस खासियत के फायदे हैं। आपको केले खरीदते समय हर बार एक जैसा स्वाद मिलता है। यह चिंता नहीं करनी पड़ती कि पिछला वाला तो मीठा था, इस बार कहीं कम मीठा तो नहीं होगा। जो मुश्किल हम आम खरीदने में झेलते हैं। इसी कारण से केले के पत्ते और पौधे के बाकी अंग भी बिल्कुल एक से होते हैं और एक जगह लगाने के बाद ढेर सारे पेड़ उगाना आसान होता है।

बंगालियों ने सिखाया केले के हर तरीके का इस्तेमाल करना

इन सब विशेषताओं के चलते दक्षिण भारत और पूर्वी बंगाल आदि के इलाकों में केला संस्कृति का अभिन्न अंग बन गया। शुचितावाद के प्राचीन समय में इसके वॉटरप्रूफ पत्तों ने थाली का काम किया, जिसे एक बार खाकर दूसरी बार इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। और तो और खुद केला भी छिलके के अंदर पूरी तरह सुरक्षित रहता है और किसी के छूने से कोई फर्क नहीं पड़ता।

बंगाल में नदियों के आस-पास केले की बहुतायत थी, तो बंगालियों ने केले के हर हिस्से को इस्तेमाल कर लिया। बंगाली वैष्णवों ने केले के फूल की सब्ज़ी बनाकर निरामिष (वेजीटेरियन) आहार में एक नया आयाम जोड़ा, तो कायस्थों ने मछली का एक नया विकल्प निकाला।

वे कच्चे केले को मछली के टुकड़ों की आकृति में काटकर उसे पकाते हैं। स्टार्च से भरा कच्चा केला ग्रेवी के साथ बिल्कुल मछली जैसा स्वाद देता है।

केले के पत्ते यानी पातूड़ी ने पाककला को भी बदला

इसी तरह पूर्वी बंगाल से आए लोगों ने केले के वॉटरप्रूफ पत्तों का पाक कला में बढ़िया इस्तेमाल किया। मछली, अंडा या इस तरह की किसी चीज़ को मैरिनेट करके उसे केले के पत्ते के अंदर लपेटकर बांध लेते हैं। इसके बाद उसे तवे पर सेंकते हैं।

अंदर पकने वाली चीज़ की भाप बाहर नहीं निकल पाती और केले के पत्ते की भुनी महक भी अंदर ही घुल जाती है। पातूड़ी कहे जाने वाला और इस तरीके से पके व्यंजन का स्वाद अलग ही होता है।

बंगालियों का केला प्रेम इतना बढ़ा कि उन्होंने इसके रेशों को धागों में मिलाकर ‘बनाना सिल्क’ बना डाला। वहीं, केले के छिलकों की भी चटनी बना ली। केले के छिलकों की चटनी में कच्चे केले के छिलकों को उबालकर उसे लहसुन, नमक, मिर्च के साथ पीस लेते हैं।

फिर पैन में कलौंजी और सूखी लाल मिर्च का तड़का लगाकर छिलकों का कच्चापन दूर कर लेते हैं। ऊपर से थोड़ा नींबू का रस मिलाइए और आपकी चटनी तैयार।

केरल के येलक्की केले का दीवाना था मुगल बादशाह जहांगीर

बंगाल की ही तरह दक्षिण भारत भी केलों की भरमार वाला इलाका है। भगवान की अपनी धरती कहे जाने वाले केरल में केले की कई किस्में मिलती हैं।

अगर आप केरल में फलों की दुकान पर जाएं, तो 8-10 तरह के केले मिल जाएंगे। पूवन, मोंदन, पेयन, माटी, पाजहम और इनमें लाल छिलके वाले केले भी हैं। और छोटे-छोटे पीले येलक्की केले भी हैं जिनकी खासियत है कि ये बेहद मीठे होते हैं और खाने के बाद स्वीट डिश की तरह भी खाए जा सकते हैं। कहते हैं, मुगल बादशाह जहांगीर ने जब ये केले खाए तो वो इनका दीवाना हो गया था।

अब स्टोरी में यहां से आगे बढ़ने पहले से इस ग्राफिक पर भी नजर डाल लीजिए और जान लीजिए कि केले के नाम से क्या क्या वर्ल्ड रिकॉर्ड जुड़े हुए हैं

केले का सबसे पसंद किया जाने वाला रूप है बनाना चिप्स

दक्षिण भारत की बात करते ही केले के पत्तों पर भोजन करना याद आता है, लेकिन केले से जुड़ा सबसे लोकप्रिय दक्षिण भारतीय उत्पाद केले के चिप्स हैं।

केले के चिप्स कुछ मामलों में आलू के चिप्स पर भारी पड़ते हैं। मसलन, घर पर आलू के करारे चिप्स बनाने में जहां उन्हें पानी में रखने और फिर छत पर सुखाने जैसी कड़ी मेहनत लगती है।

केले के चिप्स बनाना काफ़ी आसान है। कच्चा केला छीलें और नमक के पानी में कुछ मिनट के लिए डुबो दें। इसके बाद गर्म तेल के ऊपर ही केले को चिप्स की तरह काटकर डालते जाएं। बढ़िया करारे चिप्स आसानी से और तुरंत बन जाएंगे।

केरल में ओणम के मौके पर मीठे चिप्स भी बनते हैं। इनमें चिप्स को थोड़ा मोटा काटकर उसे पिघले हुए गुड़ में पिसी सोंठ और दालचीनी के साथ मिलाते हैं। इसके बाद ऊपर से चावल का आटा डालते हैं और ठंडा होने पर केले के ठेकुआनुमा मीठे चिप्स तैयार हो जाते हैं।

सस्ते केले उगाने के लिए कई देशों पर किया गया कब्जा

अब केले के इतने सारे इस्तेमाल और इतनी लोकप्रियता से एक बात समझ लें कि दुनिया भर में इसकी बहुत ज़्यादा मांग है।

जब डिमांड ज़्यादा है, तो सप्लाई भी ज़्यादा होगी। ऐसे में कारोबार भी बड़ा होगा। केले के इस कारोबार के चलते दुनिया भर में इसकी खेती करने की होड़ लगी।

अब समस्या यह थी कि इसकी खेती छोटे-छोटे लैटिन अमेरिकी देशों में होती थी और वहां से जहाज पर लादकर केले अमेरिका वगैरह में भेजे जाते थे। इनमें से बहुत से सड़ जाते, कुछ खराब निकल जाते, तो मुनाफा कमाने के लिए केले की पैदावार का सस्ता होना जरूरी था।

केले से ही मिला भ्रष्ट राजनीति को नया नाम- ‘बनाना रिपब्लिक’

सस्ते केले की पैदावार का एक ही तरीका था कि उस देश पर कब्जा करके लोगों से बंधुआ मज़दूरी करवाओ और बिना बड़े खर्च के केले उगाओ। इसके लिए सेना और भ्रष्टाचार का सहारा लिया गया और यहीं से ‘बनाना रिपब्लिक’ शब्द की शुरूआत हुई। ‘बनाना रिपब्लिक’ यानी ऐसा देश जहां नीतियां सरकार नहीं, बड़े उद्योगपति बनाते हैं और भ्रष्टाचार के दम पर जबरन लागू करवाते हैं।

दुनिया का सबसे टेस्टी केला अब धरती पर नहीं मिलता

केले की इस पैदावार की कहानी छोटे देशों की दुर्दशा पर ही नहीं रुकी। इसमें जीव विज्ञान ने भी अपने जौहर दिखाए। आज से लगभग 70 साल पहले पूरी दुनिया में मिलने वाला केला आज मिलने वाले वाले केले से ज़्यादा स्वादिष्ट था। इसे ‘ग्रॉस मिशेल’ कहते थे।

इस ग्राफिक से जानिए केले से जुड़ी कुछ अहम और रोचक जानकारियां

अब हम पहले ही बता चुके हैं कि खाने योग्य केला बीज से नहीं, जड़ से उगता है और किसी एक प्रजाति के केले के सभी पेड़ एक दूसरे के क्लोन हैं। इसलिए 1950 के आस-पास ‘ग्रॉस मिशेल’ केलों में जब पनामा डिजीज नाम की बीमारी लगी तो दुनिया के सभी ग्रॉस मिशेल केले इसकी चपेट में आ गए। एक झटके में ग्रॉस मिशेल केला दुनिया से खत्म हो गया।

इसकी जगह ली, कम स्वादिष्ट माने जाने वाले कैवेंडिश केले ने। आज हमें जो आम केला हर जगह मिलता है उसका नाम कैवेंडिश है और वैज्ञानिक डरते हैं कि कहीं अचानक से दुनिया से सारे कैवेंडिश केले भी न खत्म हो जाएं। केलों की इस महामारी को रोकने के लिए लगातार शोध जारी हैं।

डरें नहीं, केले की 1000 से ज्यादा प्रजातियां आज भी हैं

अगर आपको इस बात से डर लग रहा हो कि कहीं कैवेंडिश केला भी दुनिया से गायब हो गया तो बनाना शेक कैसे बनेगा, तो डरने की जरूरत नहीं है। कैवेंडिश दुनिया में सबसे लोकप्रिय केला है, लेकिन केले की 1000 से ज़्यादा प्रजातियां दुनिया में मौजूद हैं। ‘मोनालिसा’, ‘आइसक्रीम’, ‘लेडीफ़िंगर’ जैसे नाम वाली इन प्रजातियों से कई और प्रजातियां विकसित करने पर काम चल रहा है। केले के वैज्ञानिक पहलुओं पर बात कर रहे हैं, तो इसके गुणों पर भी बात कर लेते हैं।

गुस्सा और भूख दोनों को काबू में रखता है केला

केले में विटामिन डी के अलावा सभी विटामिन होते हैं। इसके अलावा केला पोटैशियम से भरपूर होता है। माना जाता है कि केले को चीनी या शहद के साथ मिलाकर खाने से गुस्सा शांत होता है। वहीं, केले और दही का शेक आपकी भूख को काफी देर तक शांत रखता है। आयुर्वेद के मुताबिक केले के पत्ते आंखों की जलन में सुकून पंहुचाते हैं।

केले को कम्पलीट फूड माना जाता है, इस ग्रैफिक से जान सकते हैं कि इसमें क्या क्या पाया जाता है

केले के तने का जूस परिवार नियोजन में मददगार

इसके अलावा अगर कभी मछली का कांटा गले में अटक जाए तो केला खाने से निकल जाता है। केले के इन तमाम गुणों के अलावा इसके दोष से जुड़ा एक मत प्रचलित है।

माना जाता है कि केले के सफ़ेद तने का जूस पीने से पुरुषों की संतान उत्पत्ति की क्षमता खत्म हो जाती है। मध्य प्रदेश की ‘बैगा’ जनजाति इस तरीके का इस्तेमाल परिवार नियोजन के लिए करती है।

और इस अंतिम ग्राफिक से जान सकते हैं कि केले खाने के क्या क्या फायदे होते हैं

वैसे केले के साथ एक और समस्या है कि उसे फ़्रिज में रखने पर छिलका काला पड़ जाता है। ऐसी स्थिति वाले केले को खाने में कोई हर्ज नहीं है, इन पिलपिले केलों से मालपुए बनाए जा सकते हैं, लेकिन केलों को फ़्रिज में स्टोर करने का सही तरीका भी है। अगर आपको फ़्रिज में केले रखने हैं, तो छिलका हटाकर, काटकर एयरटाइट डिब्बे में फ्रीज कर दें। केले कई दिन तक सुरक्षित बने रहेंगे।

1 करोड़ रुपए का इकलौता केला जब गप्प से खा गया कोई

अब केले की बातें शुरू हुईं, तो देखिए कितनी बातें निकल आईं। साहित्यकारों ने जहां आम को बड़ी तवज्जो दी, वहीं केला कलाकारों की पसंद रहा। केले का इस्तेमाल कई तरह से कलाकृतियों में हुआ और आधुनिक कला में इसे पुरुष सत्ता के प्रतीक के तौर पर कई जगह इस्तेमाल किया गया।

इसके अलावा इसे कई जगह डबल मीनिंग चीजों के तौर पर भी अपनाया गया। केले और आधुनिक कला की बात करते-करते दो साल पहले की वो मजेदार घटना याद आती है, जिसमें माउरिजियो कैटेलेन नाम के कलाकार ने एक दीवार पर टेप से केला चिपका दिया और उसे एक कलाकृति का नाम दिया। जिसका नाम था ‘हंगर’ यानी भूख। करीब सवा लाख डॉलर मतलब करीब 1 करोड़ रुपए की इस कथित कलाकृति को दूसरे कलाकार ने दीवार से निकालकर खा लिया और दुनियाभर में खबर बन गई।

कला की दुनिया में प्रचार के लिए इस तरह के स्टंट होते रहते हैं और इनसे कुछ गंभीर निष्कर्ष निकालने की जरूरत नहीं है।

हां, हिंदी पट्टी में केले से जुड़ी पहली याद की बात करें तो बचपन की वो कविता जरूर याद आती है, ‘लाला जी ने केला खाया, केला खाकर मुंह बिचकाया।’

आज के दौर में जब फिसलने के लिए दुनिया में बहुत सी चीजें हो गई हैं, तो केला खाकर मुंह मत बिचकाइए, उसके छिलके को डस्टबिन में डालिए। स्वास्थ्य और स्वच्छता दोनों दुरुस्त रहेंगे।

(अनिमेष मुखर्जी फूड और फैशन ब्लॉगर हैं)

ग्राफिक्स: सत्यम परिडा

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