अपनों की बेरुखी से बुजुर्ग लाचार:जिन बच्चों को पालने में जिंदगी खपा दी, कोरोना काल में वही मां-बाप को वृद्धाश्रम छोड़ रहे

नई दिल्लीएक महीने पहलेलेखक: पारुल रांझा
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  • बुजुर्गों का दर्द- जब जीते जी हमें नहीं पूछते, फिर श्राद्ध का क्या मतलब

उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद में इंसानियत को शर्मसार कर देने वाला मामला सामने आया है। हाल ही में एक बुजुर्ग दंपती ने पुलिस से अपने बेटे-बहू के खिलाफ शिकायत की। कहा, बेटे और बहू ने उन्हें मार-पीटकर घर से निकाल दिया। ये कोई पहला मामला नहीं है, बल्कि बुजुर्गों के हितों की रक्षा के कानून होने के बावजूद भी कोरोना काल में उनके साथ दु‌र्व्यवहार की घटनाएं बढ़ी हैं। एजवेल फाउंडेशन के सर्वे के अनुसार कोविड-19 की दूसरी लहर के बीच लगाए गए लॉकडाउन के दौरान करीब 73% बुजुर्गों ने दुर्व्यवहार का सामना किया।

यही वजह है कि घर परिवार में बेगाने होते जा रहे बुजुर्गों की स्थिति पर उच्चतम न्यायालय ने भी चिंता व्यक्त की है। सरकार और अदालत की ओर से वक्त-वक्त पर बुजुर्गों की देखभाल को लेकर दिशानिर्देश भी दिए जाते हैं। अगर इन बुजुर्गों को अपने अधिकार पता हों तो वे कानून की मदद से इन्हें पा सकते हैं।

'घरवाले ही बुजुर्गों को वृद्धाश्रम छोड़ रहे'
नोएडा सीनियर सिटीजन होम के संचालक कृष्णा बताते हैं, आजकल के बिजी लाइफस्टाइल में बुजुर्गों की उपेक्षा लगातार बढ़ रही है। लोग अपने स्वार्थ में इतने मगन हो गए हैं कि उन्हें रिश्तों और भावनाओं की कोई कद्र नहीं। परिवार के लोगों के दुर्व्यवहार और तिरस्कार से परेशान होकर बुजुर्ग कभी खुद घर छोड़ कर चले जाते हैं या इन्हें किसी वृद्धाश्रम में गुजारा करना पड़ता है।

बुजुर्गों के प्रति दुर्व्यवहार के मुख्य कारणों में समय का अभाव और एकल परिवार भी है। वह बताते हैं कि इस समय हमारे वृद्धाश्रम में करीब 50 बुजुर्ग हैं। इनमें से ज्यादातर लोगों को परिवार के सदस्य ही यहां छोड़कर गए हैं।

नोएडा के वृद्धाश्रम में ज्यादातर बुजुर्गों को उनके परिवार के सदस्य ही यहां छोड़कर गए हैं।
नोएडा के वृद्धाश्रम में ज्यादातर बुजुर्गों को उनके परिवार के सदस्य ही यहां छोड़कर गए हैं।

'सेवा जीते जी करो, मरने के बाद किसने देखा'
वृद्धाश्रम में रह रहे बुजुर्गों का एक ही दुख है। उनका कहना है कि इंसान भगवान से औलाद इसलिए मांगता है, कि बुढ़ापे में बच्चे उनकी लाठी बनें। ताकि जिंदगी का आखिरी दौर आसानी से कट जाए। पर अगर मां-बाप के जिंदा रहते बच्चे उन्हें न पूछें तो मरने के बाद श्राद्ध करने का क्या फायदा? सेवा करनी है तो जीते जी करो, मरने के बाद क्या होगा, किसने देखा है।

कानून का सहारा लेने से हिचकते हैं बुजुर्ग
दिल्ली एनसीआर में वरिष्ठ नागरिक कल्याण समिति के एसएस राघव बताते हैं, शहरी इलाकों में कई परिवारों की स्थिति काफी गंभीर है जिनके माता-पिता और बच्चे अलग-अलग शहरों में रह रहे हैं। ऐसे में बच्चे अपने मां-बाप का पूरा ध्यान नहीं रख पातें। वे अकेले ही जीवन गुजारने को मजबूर हैं। पर कई ऐसे बुजुर्ग हैं जो अपनों के साथ रहते हैं, लेकिन उनके बच्चे ऑफिस से घर आने के बाद अपनी दुनिया में मस्त हो जाते हैं। वे यह भी भूल जाते हैं कि बचपन में उन्हीं माता-पिता के बिना उनको चैन नहीं आता था।

राघव आगे कहते हैं कि बुजुर्गों से दु‌र्व्यवहार मामलों में पुलिस केस दर्ज कर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर लेती है। कई बुजुर्ग अपनों व गैरों से परेशान होकर भटक रहे हैं, लेकिन उनकी सुनने वाला कोई नहीं है। बुजुर्गों के संरक्षण के लिए कानून है, लेकिन जानकारी के अभाव और बदनामी के डर से वे कानून का सहारा लेने से हिचकते हैं।

बुजुर्गों के लिए राजस्थान है सबसे बेहतर
इंस्टीट्यूट फॉर कॉम्पिटिटिवनेस की रिपोर्ट के मुताबिक बुजुर्गों के रहने के लिए राजस्थान सबसे बेहतर राज्य है। इसके बाद महाराष्ट्र और बिहार हैं, जहां बुजुर्गों को बेहतर जीवन मिलता है। रिपोर्ट में बुजुर्गों के जीवन स्तर को मापने के लिए इकोनॉमिक एम्पावरमेंट, शिक्षा और रोजगार की प्राप्ति, सोशल स्टेटस, फिजिकल सिक्योरिटी, बेसिक हेल्थ, साइकोलॉजिकल हेल्थ, सोशल सिक्योरिटी को शामिल किया गया था।

कानून में बुजुर्गों की सुरक्षा के लिए प्रावधान हैं, लेकिन जानकारी के अभाव से वे कानून का सहारा लेने से हिचकते हैं।
कानून में बुजुर्गों की सुरक्षा के लिए प्रावधान हैं, लेकिन जानकारी के अभाव से वे कानून का सहारा लेने से हिचकते हैं।

गुजारा खर्च लेने को 3 लाख बुजुर्ग कोर्ट में
नेशनल ज्यूडिशियल डेटा ग्रिड के अनुसार वरिष्ठ नागरिकों के 25.02 लाख केस लंबित हैं। इनमें 18.73 लाख सिविल केस और 6.28 लाख आपराधिक मामले हैं। तीन लाख केस तो ऐसे हैं जिसमें बुजुर्ग गुजारा भत्ता पाने, अपने ही घर में रहने और बच्चों द्वारा मारपीट के खिलाफ संरक्षण के लिए कोर्ट जाने को मजबूर हुए हैं।

प्रॉपर्टी के लिए बुजुर्गों को किया जाता है परेशान
दिल्ली हाईकोर्ट में वकील योगेंद्र सिंह बताते हैं कि कोर्ट में ज्यादातर ऐसे बुजुर्गों के मामले आते है, जिनके बहू-बेटे प्रॉपर्टी हड़पना चाहते हैं। गरीब परिवारों की बजाय पैसे वाली फैमिली में इस तरह के केस देखने को मिलते हैं। कई मामलों में कोर्ट की फटकार पर दो से तीन सुनवाई में सकारात्मक परिणाम मिल जाते हैं। साथ ही बुजुर्गों को सम्मान से जीने का हक मिलता है।

कानून देता है बुजुर्गों को विशेष अधिकार
योगेंद्र सिंह बताते हैं, कानून में वरिष्ठ नागरिकों की सुरक्षा के लिए प्रावधान हैं यदि उनके साथ बुरा बर्ताव होता है तो वे पुलिस को इसकी शिकायत कर सकते हैं। सीनियर सिटीजन एक्ट 2007 के तहत कोई भी वरिष्ठ नागरिक जिसकी उम्र 60 या उससे ज्यादा है, जो अपनी आय या अपनी संपत्ति से होने वाली आय से अपना भरण पोषण करने में असमर्थ है, वे अपने बच्चों या रिश्तेदारों से भरण पोषण प्राप्त करने के लिए आवेदन कर सकते हैं।

यदि बुजुर्गों के साथ दुर्व्यवहार होता है तो तीन महीने की कैद के साथ जुर्माना भी हो सकता है। साथ ही वे बालिग संतान को घर छोड़ने के लिए बाध्य कर सकते हैं। वहीं, सरकारी अस्पतालों में बुजुर्गों के उपचार का अलग से प्रावधान है। उन्हें ज्यादा वक्त तक इंतजार न करना पड़े इसके लिए अलग से लाइन की व्यवस्था होती है।

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