E-इश्क:चार साल बाद मैंने उसे अस्पताल में देखा.. समझ नहीं आ रहा था कि पहली दुआ पत्नी के लिए करूं या प्यार के लिए..

7 दिन पहलेलेखक: वरुण शैलेश
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वह सरकारी अस्पताल का ऊंघता हुआ सामान्य वार्ड था। लोगबाग उदास चेहरे लिए भीतर कहीं प्रार्थनाओं में डूबे हुए थे। चारों तरफ दवाइयों और फिनाइल की गंध तैर रही थी।

मेरे सामने मेरा हाथ थामे सुहाना बेड पर पड़ी हुई थी। वह बुखार के भंवर में थी। बीच में कराहती हुई सी, मोहसिन की पुकार लगाती हुई सी। मैं उससे कहता, “मैं यहीं हूं सुहाना।” डेंगू की वजह से उसके प्लेटलेट्स काउंट दस हजार के करीब पहुंच गए थे। ‘इसे मेडिकल की दुनिया में खतरनाक माना जाता है’, नर्स किसी मशीन की तरह यह सूचना देकर अभी-अभी गयी थी। मैंने सुहाना को देखा और कहा, “हम अस्पताल में हैं। दवाइयां चढ़ेंगी और तुम जल्दी ठीक हो जाओगी। मैं नीचे से तुम्हारा पसंदीदा नारियल पानी लेकर आता हूं।”

बाहर शाम होने में देर थी। सुबह का आया हुआ था और अब तक तीन ही बजे थे। अस्पताल में समय जैसे रुक सा जाता है। घंटे सुस्त हो जाते हैं। ‘बस किसी तरह सुहाना ठीक होकर घर आ जाये’, मैं बुदबुदाया और अस्पताल के बाहर खड़े ठेले वाले को एक बड़ा नारियल काटने का इशारा किया।

लौटा तो देखा, सुहाना सो हुई है। मैंने उसे जगाना ठीक नहीं समझा। पास के खाली बेड पर कोई आ गया था। उसने करवट ली। यह कोई दुबली-सी लड़की थी, नहीं, कोई लड़की नहीं, यह तो सरिता थी। मेरी अपनी सीरी। प्यारी सीरी।

मैं जैसे फ्रीज हो गया। ऐसे संयोग जीवन में एक-आध दफ़े ही होते हैं। मुझे कुछ पल लगे वापिस सरिता की तरफ देखने में। पर जब उसकी तरफ पलटा, उसकी मां उसके सिर पर ठंढी पट्टियां रखती नजर आईं। सामने खड़ी नर्स ‘ये ख़तरनाक डिजीज है’ कहती हुई ड्रीप लगा रही थी।

सामने अचानक सरिता को देख जैसे मेरे भीतर का वक्त उल्टा चलने लग गया। नारियल का पानी सुहाना के सिरहाने पड़ा था। मैं सुहाना को देख रहा था, लेकिन नहीं भी देख रहा था। आंखें खुली थीं पर ज़ेहन में चार साल पहले का समय किसी मोंटाज की तरह भागने लगा।

मैंने अपने हाथ पर लिखा ‘एस’ का टैटू देखा। सुहाना को आज भी लगता है, यह मैंने निकाह से पहले उसके लिए गुदवाया था। मुझे उसके इस प्यारे भरम को तोड़ने का कोई कारण नहीं समझ आया और मैंने उसे सरिता की बात नहीं बताई। बताने का कोई मतलब भी नहीं था। सुहाना मोहब्बत के लिए बनी थी। और मुझे लगा, हाथ पर गुदे इस ‘एस’ को एक नाम मिल गया है।

लेकिन आज सरिता के इस तरह एकाएक दिख जाने ने मुझे भीतर से बेचैन कर दिया। मुझे अभी सुहाना की तबीयत के लिए बेचैन होना था। जबकि मैं सरिता का हाल जानने के लिए बेताब था। वह करवट बदल कर कुनमुनाई, जिसकी चिरपरिचित आवाज़ मेरे कानों ने पहचान ली।

हम एक ही मोहल्ले के रहवासी थे। लेकिन हम अपने मोहल्ले में नहीं मिलते थे। हमारा मोहल्ला काफी बड़ा था, जिसमें आधे मुस्लिम और तक़रीबन उतने ही हिंदू घर हैं। मैं मोहल्ले के पश्चिम और सरिता पूरब की तरफ रहती थी। मोहल्ले में मिलने के अपने ख़तरे थे। मोहसिन और सरिता, ये जुदा किस्म के नाम ही खतरों के लिए किसी न्योते की तरह था। इसलिए हम जल्द ही कॉलेज के परिंदे बन गए। हम साथ इतिहास पढ़ते और साथ उड़ते हुए भविष्य के सपने बुनते। हमारा प्रेम मेट्रो, बसों से लेकर सड़कों पर पैदल दिल्ली को नापने लगा। कमला मार्केट की दुकानें, जिनके मोमोज मुंह में जाते ही बिला जाते, जामा मस्जिद के इलाके, गालिब वाली दिल्ली की तंग गलियां, दिल्ली की वो बावली सब हमारे प्यार के चश्मदीद बने। हम हाथों में हाथ डाले किसी बेफिक्रे की तरह घूमते। तब कैलेंडर में 2016 चढ़ा तब एक फिल्म आई, ‘बेफिक्रे’ जिसकी टाइटल धून पर थिरकती सरिता कहती, “मैं जब कभी बीमार पडूं, यही गाना चला देना। देखना बिस्तर से उठ खड़ी होऊंगी।”

मैं पलटा तो देखा सरिता की मां दवाइयां लेने बाहर जा रही थीं। अब तक सरिता ने मुझे नहीं देखा था। मैं उसके पास गया। सरिता की आंखें बंद थीं। मैंने मोबाइल निकाला और ‘उड़े दिल बेफिक्रे..’ का टाइटल ट्रैक चला दिया।

उसने किसी जादू की तरह आंखें खोल दीं। वह मुझे थकी पर कुतूहल वाली नज़रों से ताके जा रही थी। फिर उसने अचानक मुंह फेर लिया।

“क्या हुआ है सीरी?” मैंने हौले से उसके हाथ को स्पर्श कर पूछा। ज्वर से उसका हाथ तप रहा था। वह कुछ नहीं बोली। “कुछ तो बोलो, क्या हुआ? डेंगू, वायरल, मलेरिया..क्या हुआ..?”

इस दफ़ा उसने आंखें खोली, “धोखा हुआ। तुम्हें पहचानने में धोखा हुआ..”

उसकी बात सुन मैं जम सा गया। मुझे चार साल पहले के उसके ताबड़तोड़ आ रहे मैसेज याद आने लगे।

उस दिन सरिता के लिए रिश्ता आया हुआ था। वह मैसेज पर मैसेज, व्हाट्सएप पर व्हाट्सएप किए जा रही थी। वह मेरे साथ बस कहीं दूर निकल जाना चाहती थी। मैंने लिखा था, ‘पंद्रह मिनट में आ रहा हूं’ और भागने के लिए अपना बैग पैक करने लगा।

सरिता ने जोर लगाकर उठकर बैठने की कोशिश की। मैंने सहारा देने के लिए हाथ बढ़ाया तो उसने मेरा हाथ परे धकेल दिया। “तुम्हारे सहारे की जरूरत नहीं है। ठीक हूं मैं।” मेरा मन उसकी बातों से आहत हो गया था। पर मैंने कुछ नहीं कहा।

“तो तुम लोग इसी को लव जेहाद कहते हो?” सरिता के बीमार चेहरे पर भी घृणा साफ देखी जा सकती थी।

मैं सब सह सकता था, लेकिन इतनी घिनौनी बात नहीं।

“ख़ुदा के लिए ऐसा मत बोलो सीरी। गालियां दो। बेशक नफ़रत करो। लेकिन इतनी गलीज तोहमत मत लगाओ।” मुझे अपना कलेजा चाक होता लगा।

“क्यों..एक लड़की के साथ पहले प्रेम के सपने बुनो। फिर उसे धोखा दे निकल जाओ। क्या है ये?” उसके चेहरे पर नफरत के भाव तनिक भी कम नहीं हुए। वह सुहाना की तरफ अजीब नज़रों से देखे जा रही थी।

मुझसे और वहां नहीं बैठा गया। मैं उससे क्या कहता कि बैग पैक कर निकलते हुए अब्बा ने मेरा हाथ पकड़ लिया था। उन्हें हमारे प्रेम की ख़बर थी। उन्होंने मुझे ख़ुदा का वास्ता दिया था। अपनी सीरी का वास्ता दिया था। कहा था, “मत करो ऐसा। समूचे मोहल्ले की जान तुम्हारे हाथों में है। तुम्हें कुछ नहीं पता। तुम दोनों पर कुछ लोग लम्बे समय से नज़रें गड़ाए हुए हैं। वे बस इसी बात का इंतज़ार कर रहे हैं कि तुम दोनों कुछ करो और उन्हें दंगे का मौका मिले। तुम दोनों इधर भागे और मोहल्ले में जलजला आ जायेगा। मोहल्ले की नालियों में बस खून बहेगा।”

मैं उसे कैसे बताता, "प्यारी सीरी, तुम्हारा ख़ुद का चचेरा भाई इसमें शामिल है। मुझे माफ करना। मुझे एक बस्ती को जलने से बचाना था। बस्तियां बच गईं, पर हम जल गए।