सिंगल फादर्स की दास्तां:बच्चे पूछते हैं- 'मम्मी जॉब से कब लौटेगी'...इसका जवाब किसी इम्तिहान से कम नहीं होता

11 दिन पहलेलेखक: पारुल रांझा
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कभी हवा में उछालते, कभी करतब दिखाते। मेरी एक मुस्कान के लिए कभी हाथी कभी घोड़ा बन जाते। सो सकूं मैं चैन से, वो पूरी रात एक करवट में गुजारते। गलती पर थोड़ी डांट लगाते और फिर साइकिल के डंडे पर बैठाकर स्कूल छोड़कर आते। ये अल्फाज सिर्फ मेरे या आपके नहीं, बल्कि हर बेटे और बेटी के हैं, जिनके पास हैं पापा।

कुछ बच्चे ऐसे भी हैं जिनके पिता मां की भी जिम्मेदारी बखूबी निभा रहे हैं। इन सिंगल फादर्स के लिए भले ही अपने काम के साथ बच्चों को संभालना आसान नहीं, पर वे न सिर्फ खुद को मजबूत कर आगे बढ़ रहे हैं, बल्कि अपने बच्चों का भी मजबूती से हाथ थामे हुए हैं, ताकि उन्हें कभी मां की कमी न खले। 'इंटरनेशनल मेन्स डे' पर दैनिक भास्कर ने ऐसे सिंगल फादर्स से बात की, जो पिता के फर्ज के साथ बच्चों को दे रहे मां की ममता।

तीनों बच्चों को अपना सबसे करीबी दोस्त बनाया..
उत्तर प्रदेश के इंडस्ट्रियलिस्ट मोहन सिंह एक ऐसे सिंगल पेरेंट हैं, जिन्होंने मुश्किल दौर का सामना करने के बाद भी अपने बच्चों को सही मुकाम तक पहुंचाया। पत्नी की मौत के बाद दूसरी शादी से इंकार कर माता-पिता दोनों का प्यार बच्चों को दिया। ममता के मोती पिरो कर तीनों बच्चों को अपना सबसे करीबी दोस्त भी बनाया।

मोहन सिंह कहते हैं, 'बात 32 साल पहले की है जब मेरे तीनों बेटे 4, 6 और 8 साल के थे। अचानाक पत्नी को हाथ में इंफेक्शन हुआ। नोएडा के कैलाश अस्पताल, दिल्ली के गंगाराम और एम्स में इलाज कराया। फिर भी पत्नी को नहीं बचा पाया। शायद यही लिखा था और नियति को यही मंजूर था। पर उन हालातों में मैंने खुद को समझा लिया कि मुझे जिंदा रहना है अपने बेटों के लिए। इसी हौसले ने मुझे जिदंगी में आगे बढ़ने की हिम्मत दी। बच्चों को अकेले संभालना आसान नहीं था, ऐसे में काफी संघर्ष किए। बेटों ने भी अपना पूरा सहयोग दिया। यही वजह है कि आज दो बेटे बिजनेसमैन और एक कॉलेज में प्रोफेसर है।'

वे कहते हैं, मैं हमेशा बच्चों के साथ पिता नहीं, दोस्त बनकर रहता हूं। कभी खुद गलत राह पर नहीं चला। मुझे देखकर बेटों का भी जिंदगी को लेकर नजरिया बदला, और उन्हें एक बेहतर इंसान बनाया। तीनों बेटे अब मैरिड हैं और मैं पोते-पोतियों वाला हो गया हूं।

अब मैं सब चीजें बैलेंस करना सीख गया हूं....
चंडीगढ़ के गुमान सिंह अपनी दो बेटियों को संस्कार देने के साथ-साथ बीमार पड़ने पर उनका ख्याल रखने, खिलाने-पिलाने और पढ़ाई-लिखाई का ध्यान अकेले ही रखते है। अगर वह पिता बनकर डांटते है तो अगले ही पल मां की भूमिका में गले भी लगाते है।

गुमान सिंह कहते हैं, एक साल तक कैंसर से लड़ते हुए मेरी पत्नी जिंदगी से जंग हार गई। तब ही समझ लिया था कि खुद ही हिम्मत से काम लेकर बच्चियों की परवरिश करनी है। सुबह उन्हें स्कूल के लिए तैयार करने से लेकर बालों को टाई करना, हर फर्ज निभाता हूं। इन जिम्मेदारियों के बीच अपने करियर पर ध्यान देना थोड़ा मुश्किल लगता है, पर सब चीजें बैलेंस करना सीख गया हूं।

वे कहते हैं, 6 साल की बेटी कभी कभार मुझसे पूछती हैं, 'पापा मम्मी जॉब से कब लौटेगी।' इसका जवाब देना मेरे लिए किसी इम्तिहान से कम नहीं होता। आंखों में दर्द छिपाने की कोशिश के साथ मैं हंसकर कहता हूं, 'जब तुम बड़ी हो जाओगी।' मस्ती करना हो या टीचर की तरह पढ़ाई करवाना, अब सब जान गया हूं।

छुट्टियों में पूरा दिन कैसे उनके साथ हंसते खेलते बीत जाता है इसका अंदाज़ा लग ही नहीं पाता। मां की तरह उनसे अपनी जिंदगी की हर बात शेयर करता हूं। दोनों बेटियां अभी से इमोशनली काफी स्ट्रॉन्ग हो गई हैं और अपनी उम्र के दूसरों बच्चों के मुकाबले इंडिपेंडेट भी ज्यादा हैं।

अच्छा लगता है जब लोग कहते हैं मैं मां की तरह हूं..
दिल्ली के स्वदेश सिंह एक आईटी कंपनी में काम करते हैं। पिछले तीन सालों से पति-पत्नि, दोनों अलग रह रहे हैं। अब सिंगल फादर बनकर अपने आठ साल के बेटे का मजबूती से हाथ थामे हुए हैं।

स्वदेश कहते हैं, जब मैं किसी रिश्तेदारी में जाता हूं, या फिर दोस्तों के फंक्शन में जाता हूं तो सभी के पार्टनर होते हैं और मैं अकेला। लोग तरह-तरह के सवाल पूछते हैं। पर मैं इन बातों को इग्नोर कर देता हूं। खुद पर खर्च करने की बजाय मुझे बच्चे की पढ़ाई और उसके शौक पूरा करने के लिए रुपये बचाकर रखना अच्छा लगता है। कोरोना के चलते हुए वर्क फ्रॉम होम में मुझे अपने बेटे के साथ ज्यादा वक्त बिताने का मौका मिला। बेटे को लाड़ प्यार करना, खाना खिलाना और नींद आने पर उसे अपनी गोद में सुलाना... इस सुकून को शब्दों में बयां नहीं कर सकता।

वे कहते हैं, जो लगाव बेटे का मां के साथ था, आज वही मेरे साथ भी बन गया है। जो संस्कार मुझे मेरे पेरेंट्स ने दिए, वहीं मैं अपने बेटे को दे रहा हूं। हमेशा यही कोशिश रहती है कि उसे वो खुशी दे सकूं जो एक मां देती हैं। बेटा समझता है कि किसी से किस लिमिट तक रिश्ता रखना है और किसे किस वक्त मना करना है। उसे मालूम है कि पापा को सब कुछ अकेले करना है इसलिए घर के कामों में भी हैल्प करता हैं। रिश्तेदारों और ऑफिस वालों से ये सुनकर काफी अच्छा लगता है कि मैं एक मां की तरह हूं।

देश में 12.5% सिंगल पेरेंट फैमिली
संयुक्त राष्ट्र महिला (यूएन वूमेन) की रिपोर्ट के अनुसार देश 4.5% घरों को सिंगल मदर्स चला रही हैं। यानी सिंगल मदर की संख्या 1.3 करोड़ है, जबकि ऐसी 3.2 करोड़ महिला जॉइंट फैमिली में रह रही हैं। 46.7% फैमिली में कपल्स और उनके बच्चे रहते हैं। 31% जॉइंट फैमिली में रहते हैं। वहीं, सिंगल पेरेंट फैमिली 12.5% हैं। इसमें ये बात भी सामने आई कि दुनिया में 10.13 करोड़ परिवारों में सिंगल मदर्स अपने बच्चों के साथ रहती हैं।

सिंगल फादर्स के लिए पेरेंटिंग टिप्स

  • बच्चों की परवरिश के दौरान चीजों की प्लानिंग जरूर करें।
  • रोज ऑफिस के काम और बच्चों के साथ समय बिताने का रूटीन तय करें।
  • स्ट्रेस और डिप्रेशन से बचने के लिए रोजाना मेडिटेशन और एक्सरसाइज करें।
  • दूसरे पेरेंट्स से अपनी तुलना बिल्कुल भी न करें। इससे मन में निगेटिव चीजें ख्याल नहीं आएंगे।
  • सोशल सर्कल बनाए रखें, खासकर अपने जैसे सिंगल पेरेंट्स से।
  • बच्चे को समझाएं कि हमारी फैमिली में मां नहीं हैं। उसके मन की असुरक्षा को दूर करें, अकेला न महसूस होने दें।
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