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Parenting:मैं ऑफिस जा रही हूं, तुम कपड़े सुखा देना! जुबान पर है, लेकिन आदत में नहीं

4 दिन पहले
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  • सुप्रिया सुबह से काम निपटाने में लगी है, उसे ऑफिस जाना है। किचन से उसने पति सुयश को आवाज़ लगाकर कपड़े मशीन से निकालकर सुखा देने को कहा। ये सुनते ही उसकी सास बिदक पड़ी। मेरा बेटा रसोई में मदद करता है, अब क्या कपड़े भी वही सुखाएगा?

ऐसी सुप्रिया आपको हर घर में मिल जाएगी और बिदकने वाली सास भी! कभी आपके रिश्तेदार के रूप में, तो कभी किसी परिचित के रूप में। जिसे इस बात से आपत्ति होगी कि महिलाएं घर का काम पुरुषों से क्यों कह रही हैं! लड़का और लड़की का अंतर समझना और उनमें अलग लिंग के कारण फर्क करना दो अलग-अलग बात है। आइए जानते हैं कैसे तोड़ें हम लिंग के उस अंतर को, जिसे बनाया भी हमने है और उससे जूझते भी हम ही हैं।

क्या है जेंडर न्यूट्रल होने का मतलब?

जब हम जेंडर न्यूट्रल होने कि बात करते हैं, तो इसका सीधा मतलब ये होता है कि स्त्री और पुरुष को हम समान अधिकार, ज़िम्मेदारी और संभावनाओं के साथ देखे जाने की बात करते हैं। फैमिली काउंसिलर पीयूष भाटिया कहती हैं कि लिंग के आधार पर ये तय करना कि महिलाएं इस काम के लिए बनीं हैं या पुरुषों की वो ज़िम्मेदारी है। इस कुतर्क को नकारना और बदलती दुनिया को स्वीकारना ही अच्छी पैरेंटिंग की पहली सीढ़ी है। एक स्टडी के मुताबिक भारत में लिंग भेद का प्रभाव हर क्षेत्र में अपनी जड़ें जमाए है। शिक्षा, रोज़गार, स्वास्थ्य, आमदनी हर जगह महिलाओं को पुरुषों का दबाव झेलना पड़ता है।

जब माएं देती हैं जेंडर इन-इक्वालिटी को हवा

लड़का-लड़की के बीच भेदभाव के उदहारण हमें बाहर बाद में, लेकिन घर पर पहले ही देखने को मिलते हैं। जब मां कहती है, घर के काम सीखो, ससुराल में नाक कटाओगी क्या? ये सुनकर लगता है कि हमारा जन्म ही ससुराल जाने के लिए हुआ है! उससे भी अजीब लगता है विधि का विधान वाला ज्ञान। जैसे शादी के लिए खुद को तैयार न करके हम हजारों साल पुरानी किसी परंपरा को तोड़ देंगे।

बाज़ार से लौटकर सिर्फ पति थकता है, पत्नी नहीं!

महिला को अबला बनाने में पुरुष भी कम पीछे नहीं है। पति-पत्नी बाज़ार जाते हैं, लेकिन लौटकर सिर्फ पति थकता है और आराम कुर्सी पर बैठकर सुनो, जरा एक कप चाय बना देना की अर्जी लगा देता है. जबकि पत्नी को रात के खाने से लेकर, बच्चों को संभालना और बाज़ार से आए समान का रख-रखाव करना होता है।

सुनो तुम लड़की हो...trong>...

तुम लड़की हो देर रात तक बाहर नहीं रहना।

बैठने-बोलने का ढंग सीख लो, तुम्हें दूसरे घर जाना है।

उम्र निकली जा रही है। शादी कर लो

खाना बनाना सीख लो, काम आएगा।

इंजीनियरिंग क्यों करना है? वहां लड़कों की भीड़ होती है, टीचिंग का सोचो।

अरे तुम लड़के हो<...rong>...

अपनी जिम्मेदारियां समझो और घर खर्च संभालो।

तुम्हारी पढ़ाई पर हमने बहुत खर्च किया है, बिना दहेज़ लिए शादी नहीं करेंगे।

तुम्हारी बहनों की शादी हो जाएगी, तो ये घर तुम्हारा ही होगा।

लड़के होकर किचन में क्या कर रहे हो?

कहां से बजेगा जेंडर न्यूट्रल पैरेंटिंग का बिगुल?

डॉ भाटिया कहती हैं शुरुआत हमेशा ही चुनौतीपूर्ण होती है, लेकिन पहले कदम के बाद दूसरा कदम आसन हो जाता है। 2 साल का बच्चा सबकुछ कर सकता है। फिर चाहे वो लड़का हो या लड़की, क्योंकि उसे ये नहीं बताया जाता है कि तुम लड़के हो इसलिए ऐसा करो या तुम लड़की हो इसलिए वैसा करो। बढ़ती उम्र के साथ बच्चों की प्रोग्रामिंग शुरू होती है। उन्होंने आगे कहा कि सबकुछ परिवार से शुरू होता है। आप अपने बच्चे को चाहे लाख अच्छी बातें सिखा दें, लेकिन जब तक उन्हें अपने पेरेंट्स की आदतें वैसी नहीं दिखेंगी, बच्चा उन बातों को अपनी जिंदगी में नहीं उतारेगा।

फैमिली एक्सपर्ट कह रही हैं, अब तो मान जाओ?

  • हर हफ्ते फैमिली मीटिंग करें और हर किसी को अपनी बात रखने का मौका दें।
  • अपने बच्चों को खुलकर बात करने का माहौल दें और उनके पक्ष को समझें।
  • बच्चों को मां की मजबूती और पिता की कमजोरी से रूबरू करवाएं।
  • स्त्री-पुरुष से ऊपर बच्चों को इंसान का महत्व समझाएं।
  • करियर और पढ़ाई में चुनाव की पूरी आज़ादी दें।
  • मां बाहर के काम में भागीदारी दिखाएं, पिता खाना बनाने से पीछे न हटे।
  • लड़की वाले काम और लड़के वाले काम की गलतफ़हमी से बच्चों को दूर रखें।
  • लड़कों को घर के काम सिखाएं, लड़कियों को बाहर की ज़िम्मेदारी सौपें।
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