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मैरिज मार्केट की डिमांड है वर्किंग गर्ल:लड़कियों का कहना, घर का काम भी करें और कमाकर भी लाकर दें, लड़के वाले हमें एटीएम मशीन न समझें

12 दिन पहलेलेखक: मीना
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‘31 साल की आरती प्रजापति पिछले दो सालों से लड़का ढूंढ रही हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय में गेस्ट टीचर रह चुकी हैं और अभी एक रिसर्चर हैं। वे कहती हैं,’मेट्रीमोनियल साइट्स पर जो लड़के मिलते हैं। उनकी पहली डिमांड पढ़ी-लिखी और वर्किंग लड़की होती है। वर्किंग भी हो और उनके शहर की भी हो। मैं दहेज के बिल्कुल खिलाफ हूं, जैसे ही ये बात लड़कों को कहती हूं तो वे पूछते हैं आपकी सैलरी कितनी है? स्कॉलरशिप मिलती है? सैलरी का कितना हिस्सा परिवार में दे पाएंगी? वे सीधे-सीधे दहेज नहीं मांगते, बल्कि उनके दहेज की फरमाइश तन्ख्वाह, लड़की घर में कितना पैसा देगी, उसको मिलने वाली स्कॉरलशिप जैसे सवालों से होकर गुजरती है।’

आरती प्रजापति
आरती प्रजापति

वर्किंग लड़कियां जब शादी के लिए लड़के देखना शुरू करती हैं, तब कुछ बातें उन्हीं पूरी तरह शादी को लेकर मन खट्टा कर देती हैं या लड़के वालों का ये ढोंग कि हमारी कोई डिमांड नहीं, उससे दुखी हो जाती हैं। ऐसे में एक पढ़ी-लिखी लड़की अगर खुद को एक ब्लैंक चैक की तरह समझती है तो वो गलत नहीं सोचती। क्योंकि वो हर महीने जो कमा रही है वो ससुराल का है, लेकिन शादी से पहले लड़के वालों की घुमा फिराकर जो डिमांड होती है, वहां शादी प्यार भरे रिश्ते के बजाए एक फाइनेंशियल डील बन जाती है।

आरती कहती हैं, उन्होंने बचपन से अपनी मां को पिताजी से पैसे मांगते देखा। अपनी शादी के बाद वे पति के आगे हाथ नहीं फैला सकतीं, इसलिए नौकरी की सोची। अब इतना पढ़ने-लिखने के बाद भी लड़के गोल रोटी बनाने वाली लड़की और अच्छा पैसा कमाने वाली देखेंगे तो ये दोनों चीजें नहीं मिल पाएंगी। हम एटीएम मशीन नहीं हैं। हम लड़कियां तो परिवार में बराबरी को समझती हैं, लेकिन लड़के वाले या लड़का नहीं समझता। वे वर्किंग लड़की तो ढूंढ़ लेते हैं, लेकिन किचन के काम का बराबर बंटवारा नहीं कर पाते। 35 साल की अकांक्षा सक्सेना एक टीचर और समाजसेविका हैं। वे बताती हैं, लड़कियां वर्किंग रहना चाहती हैं, लेकिन शादी के बाद उन्हें उसकी भी कीमत चुकानी पड़ती। वे घर और नौकरी दोनों के बीच पिसने लगती हैं। मेंटली और फिजिकली दोनों रूपों में परेशान होती हैं। क्योंकि हमने लड़कों की ऐसी ट्रेनिंग नहीं दी है कि वे घर के कामों को बराबर रूप से देखें। अब लड़के वालों की वर्किंग लड़की की डिमांड मंथली इंस्टॉलमेंट बन गई है और दहेज डाउन पेमेंट। ऐसा नहीं है कि दहेज की व्यवस्था खत्म हो गई है, बल्कि इसका रूप बदल गया है। वे कहती हैं, कोई वर्किंग वुमन अपने घर में सैलरी का कितना हिस्सा देगी, ये उसके मायके और ससुराल की फाइनेंशियल कंडिशन पर भी निर्भर करता है।

हेल्थ काउंसलर इंदु शर्मा का कहना है कि आजकल लड़के वर्किंग लड़कियां इसलिए भी चाहते हैं, ताकि उनकी फैमिली फाइनेंशियल सस्टेनेबल बने। घर के इएमआई केवल लड़का ही न चुकाए, बल्कि लड़की भी इसमें मदद करे। डॉक्टर इंदु का कहना है कि कई फैमिलीज ऐसी हैं जो ये मानती हैं कि उनका बेटा बड़ी नौकरी कर रहा है। वो उनका डायमंड है तो हमें बहू भी पढ़ी-लिखी और उतने पे स्केल वाली चाहिए। अच्छी कमाऊ लड़की भी लेते हैं और साथ में दहेज भी। इतना सबकुछ मिलने के बावजूद लड़की नौकरी और घर दोनों संभालती है और उसमें भी घर के काम में कोई कमी रह जाए तो ससुराल वाले उसे सुनाते हैं। रोज के ताने लड़कियों के लिए मेंटल इशुज का भी कारण बन रहे हैं। लड़कियों पर दोहरे काम का बोझ बढ़ रहा इस वजह से जल्दी बीमार पड़ती हैं। कई बार उन्हें नींद की गोलियां लेनी पड़ती हैं। कई परिवारों में ये हाल है कि लड़कियां कमा रही हैं तब भी अपनी कमाई पति से पूूछकर इस्तेमाल करती हैं। कुछ पति पत्नियो के सैलरी अकाउंट ऑपरेट करते हैं। जॉइंट अकाउंट रखते हैं। पत्नियों की तनख्वाह आते ही पतियों का प्रेम उन पर बरसने लगता है। पत्नी के कमाए पैसे उन्हें गिनकर देते हैं। महिलाओं की सैलरी आते ही 24 घंटे के अंदर उस पैसे के वारे न्यारे हो जाते हैं। उन्हें ये फीलिंग ही नहीं आती कि ये पैसा उनका कमाया हुआ है। अब लड़कियों को ये समझना जरूरी है कि अपनी कमाई का कुछ हिस्सा बचाना जरूरी है।

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