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रेस्क्यू पेरेंटिंग से बचें:बच्चे को हर स्थिति के लिए मजबूत बनाना है, तो मानें फैमिली काउंसिलर की बात

6 महीने पहलेलेखक: श्वेता कुमारी
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पेरेंट्स अपने बच्चों का हमेशा बेहतर और कामयाब बनाना चाहते हैं, लेकिन कई बार अपनी गलतियों से ही बच्चों को ऐसा बना देते हैं, जिसकी वजह से वह जिंदगीभर के लिए पिछड़ जाता है। ऐसा ही होता है रेस्क्यू पेरेंटिंग में, जहां पेरेंट्स ओवर केयरिंग नेचर की वजह से बच्चे को दुनिया के दुख और परेशानी से अनजान रखते हैं। क्या है रेस्क्यू पेरेंटिंग और क्यों जरूरी है इससे बचना, बता रही हैं, फैमिली काउंसलर पीयूष भाटिया।

क्या है रेस्क्यू पेरेंटिंग?

पीयूष कहती हैं कि हम अपने बच्चों से चाहते क्या हैं? यही कि वो इमोशनली मजबूत बनें, जिंदगी की चुनौतियों का डटकर सामना करें। दूसरी ओर कई पेरेंट्स अपने बच्चे की जिंदगी में हर पल दखल देते रहते हैं। उन्हें लगता है कि बच्चे को किसी तरह कि परेशानी न हो, इसलिए उसे हर उस चीज से दूर रखते हैं, जो किसी भी तरह से बच्चे को इमोशनली बुरा महसूस कराए। ऐसा करते हुए पेरेंट्स को लगता है कि वो अच्छी पेरेंटिंग के सारे रास्ते अपना रहे हैं, लेकिन होता इसके बिल्कुल उलट है। बच्चा कब, कहां, क्या कर रहा है, इसमें दखलंदाजी करते हुए ऐसे पेरेंट्स कहीं न कहीं रेस्क्यू पेरेंटिंग कर रहे होते हैं, जो आज तो बच्चे को हर मुसीबत से बचा लेता है, लेकिन आने वाले जिंदगी में उसे चुनौतियों के सामने कमजोर बना देता है।

क्या अलग है रेस्क्यू और हेलिकॉप्टर पेरेंटिंग?

पीयूष बताती हैं कि रेस्क्यू और हेलिकॉप्टर पेरेंटिंग में अंतर नहीं है। ये दो अलग टर्म हैं। पेरेंट्स जब अपने बच्चे के फ्यूचर को लेकर बेहद चिंतित होते हैं, तो जाने-अनजाने वो कई बार रेस्क्यू पेरेंटिंग करने लगते हैं। इसमें माता-पिता बच्चे को मेहनत करने से बचाते हुए उसके लिए समस्याओं का मैदान साफ रखते हैं, जिसकी वजह से बच्चा जीवन की कठिन चुनौतियों को नजदीक से नहीं देख पाता। पेरेंट्स के इस व्यव्हार से बच्चे की आजादी पर तो असर पड़ता ही है, साथ ही साथ उसककी भावनाएं भी प्रभावित होती हैं। इसे ऐसे समझिए कि कई पेरेंट्स बच्चे को दोस्ती भी उसी से करने को कहते हैं, जो क्लास में टॉप करता हो। पेरेंट्स को लगता है कि ऐसे बच्चे के साथ रहकर ही उनका बच्चा पढ़ने में अच्छा बन सकेगा। यहां तक कि पेरेंट्स बच्चों पर इस बात का भी प्रेशर बनाते हैं कि वो किससे बात करें या किससे अपना टिफिन शेयर करें।, जिसकी वजह से सही- गलत का अंतर बच्चे खुद कभी नहीं समझ पाते।

एक्सपर्ट बता रही हैं, ऐसी पेरेंटिंग से बचना क्यों है जरूरी?

पीयूष कहती हैं कि चौबीसो घंटे बच्चे के आसपास मंडराना छोड़ दीजिए। जो अनुभव आपने अपने बचपन में किया है, आज बदले दौर में आपका बच्चा वो अनुभव नहीं पा सकता। ये समझने की जरूरत है कि बच्चा तब तक अच्छे दौर के लिए आगे नहीं बढ़ सकता, जब तक उसने बुरा समय नहीं देखा हो। बचपन से हुई एक्स्ट्रा केयर के बाद जब बच्चे कॉलेज और जॉब की दुनिया में निकलते हैं, तब उन्हें खुश रहने के लिए जद्दोजहद करनी पड़ती है। बीते समय में अच्छा समय पाने वाले कई बच्चे इस स्थिति में खुद को संभाल नहीं पाते हैं। उन्हें दुनिया बुरी लगने लगती है और खुद को वो इस दुनिया से अलग करने लगते हैं। उस वक्त अपने बच्चे को देखकर अफसोस करने से अच्छा है कि आज आप बच्चे को गिरने-संभलने का मौका दें, ताकि कल को आपकी गैर मौजूदगी भी आपके बच्चे को तोड़ने नहीं, मजबूत बनाने का काम करे।

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