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  • In The Drugs Case, No One Is Taking Shahrukh's Son Aryan As A Victim, Blaming Him, An Average Of 1 Teenager Is Being Killed Every 10 Days Due To Drug Overdose In The Country, Know Remove Such Children From This Quagmire What To Do For Parents

डोंट पनिश, बट रिहैबिलिटेट:ड्रग्स केस में आर्यन को विक्टिम नहीं मुजरिम ठहरा रहे लोग, ड्रग ओवरडोज से हर 10 दिन में 1 किशोर की जा रही है जान, जानिए-क्या करें पेरेंट्स

नई दिल्ली14 दिन पहलेलेखक: दिनेश मिश्र
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पापा शाहरुख खान के साथ आर्यन। - Dainik Bhaskar
पापा शाहरुख खान के साथ आर्यन।
  • NCRB के आंकड़ों के मुताबिक, ड्रग्स ओवरडोज से 2016, 2017 और 2018 में कुल 2,398 लोगों की गई जान
  • इन तीनों साल में सबसे ज्यादा कुल 342 मौतें राजस्थान से हैं। इसके बाद पंजाब, कर्नाटक और यूपी का नंबर

ड्रग्स मामले में एक्टर शाहरुख खान के बेटे आर्यन मुश्किलों में फंस गए हैं। मामला सुर्खियों में है। ज्यादातर आर्यन को ही कसूरवार ठहरा रहे हैं। कोई कह रहा है कि सेलेब्रिटी के बच्चे ऐसे ही होते हैं, तो कोई माता-पिता को ही इसके लिए जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (NCRB) के 2019 में जारी आंकड़ों के मुताबिक, देश में 2018, 2017 और 2016 तीनों साल में हर 10 दिन में औसतन एक किशोर की ड्रग्स ओवरडोज के चलते जान गई है। वुमन भास्कर ने ड्रग्स एडिक्शन से खुद पीड़ित रहे और उससे उबरकर देश में ड्रग्स एडिक्शन पर शानदार काम कर रहे ड्रग्स डीएडिक्शन एक्सपर्ट अनिल कुमार से बात कर उनके अनुभव को जाना और यह पड़ताल करने की कोशिश की है कि ऐसे बच्चों को ड्रग्स के दलदल से निकालने के लिए क्या करना चाहिए, ताकि ऐसे परिवार की जिंदगी फिर से खुशहाल बन सके।

भीतर का खालीपन भरने के लिए करते हैं नशा, शाहरुख भी नहीं दे रहे थे बच्चे को वक्त
ड्रग्स एक्सपर्ट के मुताबिक, बात सेलेब्रिटी के बच्चे की नहीं है। बात बच्चे की है। हर कोई उसे मुजरिम ठहरा रहा है। कोई उसे विक्टिम की तरह नहीं ले रहा है। वह बच्चा कोई नशे का धंधा नहीं कर रहा है। वह उसे बेच नहीं रहा है। नशा पूरी दुनिया करती है। कुछ नशे सोशली एक्सेप्टबल है और कुछ सोशली एक्सेप्टेबल नहीं है। ड्रग्स बहुत से लोग करते हैं। प्रॉब्लम तब आती हैं, जब अपनी समस्याओं से पार पाने के लिए नशा किया जाता है। या फिर अपने भीतर के खालीपन को भरने के लिए ज्यादातर लोग ड्रग्स लेते हैं। ऐसे लोग नशा करने के बाद बेहतर फील करते हैं। आर्यन के मामले में भी यह बात सामने आई है कि उसे अपने पिता शाहरुख खान से बात करने के लिए भी अपॉइंटमेंट लेनी पड़ती है। उसके पिता के पास वक्त नहीं मिलता है कि वह अपने बच्चे से बात कर सकें। यही स्थिति वर्किंग माता-पिता के साथ भी हो रही है। खासकर कोविड के दौरान जब स्कूल बंद थे, तब बच्चों को मनोवैज्ञानिक रूप से यह प्रॉब्लम ज्यादा आई। वे अपने दोस्तों और साथियों से नहीं मिल पा रहे थे।

ड्रग एडिक्ट बच्चे को लेकर जजमेंटल न बनें, उसे अपराधी नहीं, बीमार मानें
बच्चा जो पीड़ित है, उसको मुजरिम न ठहराएं। उसे लेकर जजमेंटल न बनें। दुनियाभर में उसे ही पनिश किया जाता है, जो ड्रग्स का कारोबार कर रहा है। हमें डोंट पनिश, बट रिहैबिलिटेट वाले कॉन्सेप्ट पर चलना होगा। हर पीड़ित बच्चे को उसी नजर से देखना होगा। प्रॉब्लम बेहद गंभीर है। इसे रिहैबिलिटेट की नजर से देखना होगा। माता-पिता को उस बच्चे के साथ सहानुभूति की नजर से देखना होगा। उसे अपराधी नहीं, बीमार मानकर चलना होगा। उसके प्रति जजमेंटल नहीं होना चाहिए। उससे बात करते हुए उसके साथ दोस्ताना रवैया रखना होगा, ताकि वह अपनी प्रॉब्लम्स शेयर कर सके।

आखिर बच्चे क्यों इस दलदल में फंस जाते हैं, बच्चों का फ्रेंड सर्किल ज्यादा अहम
साइकोलॉजिकली बच्चों में अपने आसपास के माहौल का प्रेशर ज्यादा होता है। ऐसे में बच्चों का फ्रेंड सर्किल ज्यादा महत्वपूर्ण होता है। अगर किसी बच्चे के फ्रेंड सर्किल में कोई ड्रग्स ले रहा है तो इस बात की संभावना ज्यादा होती है कि वह बच्चा भी ड्रग्स को जरूर ट्राई करे। वह शौकिया तौर पर इसे ट्राई कर सकता है। ऐसे में उसके आसपास के माहौल पर माता-पिता को ध्यान जरूर देना चाहिए। इसके अलावा, कई बार घर की समस्याएं, माता-पिता के बीच के झगड़े या फिर कोई और समस्या बच्चे को इस ओर ले जाती है। इसलिए, यह ध्यान जरूर दिया जाना चाहिए।

सेलेब्रिटी के बच्चे पर एक्स्ट्रा बर्डन होता है, हर कोई उसे अलग नजर से देखता है
आर्यन जैसे सेलेब्रिटी के बच्चे पर एक्स्ट्रा बर्डन होता है। उसे स्कूल से लेकर हर जगह इस बर्डन को लेकर चलना होता है। हर कोई कहता है कि अरे देखो वह शाहरुख का बेटा है। आम तौर पर कोई भी बच्चा यह नहीं चहता है कि उसकी पहचान किसी और वजह से हो। उसे खुद की पहचान बनानी होती है। वह आम रूप से जीना चाहता है। यही वजह है कि उसमें एक तरह से साइकोलॉजिकली वैक्युम क्रिएट हो जाता है।

भारत में 13-14 साल की उम्र में बच्चों को लगती है लत, घर के माहौल पर गंभीर असर
भारत में 13-14 साल की उम्र से बच्चों में ड्रग्स की लत लग जाती है। अमेरिका, यूरोप समेत दुनिया के बाकी देशों में बच्चों में यह लत इससे भी कम उम्र में ही लग जाती है। कोई बच्चा अगर इससे पीड़ित है तो उसके घर का माहौल एकदम से बदल जाता है। घर में झगड़े शुरू हो जाते हैं। माता-पिता में तनाव से लेकर तलाक तक की नौबत आ जाती है। रिलेशनशिप पर गंभीर असर पड़ता है।

स्ट्रीट चिल्ड्रन करते हैं नशा, ज्यादातर को पता ही नहीं यह कितनी बड़ी समस्या
एक्सपर्ट कहते हैं कि भारत में स्ट्रीट चिल्ड्रन को देखें तो पता चलेगा कि वे कितना नशा करते हैं। दिल्ली में सड़कों और झुग्गियों पर रहने वाले बच्चे बड़ी संख्या में यह नशा करते हैं। कोई उन पर ध्यान भी नहीं देता है। बहुतों को तो यह पता भी नहीं होता है। ऐसे बच्चे पेट्राेल और व्हाइटनर जैसे हल्के नशे करते हैं। इसके पीछे सामाजिक-मनोवैज्ञानिक वजहें भी होती हैं।

राजस्थान, यूपी के आंकड़े डराने वाले, समस्या कितनी भयावह
एनसीआरबी के आंकड़ों के मुताबिक, ड्रग्स ओवरडोज के चलते 2016, 2017 और 2018 तीनों साल मिलाकर 2,398 लोगों की जान गई। यानी हर 12 घंटे में एक की जान गई। इनमें से 5 फीसदी तो नाबालिग ही हैं। इसमें सबसे ज्यादा 342 मौतें राजस्थान से हैं। वहीं, 287 मौतों के साथ पंजाब दूसरे, 212 मौतों के साथ कर्नाटक तीसरे, 197 मौतों के साथ यूपी चौथे और बाकी के राज्य 1,360 मौतों के साथ पांचवें स्थान पर रहे थे। एनसीआरबी के 2019 के आंकड़ों के अनुसार, 2019 में ड्रग्स ने हर दिन 21 लोगों की जान ले ली। 7,860 लोग ऐसे थे जिन्होंने ड्रग्स की वजह से खुदकुशी कर ली।