महिला के कंधे पर पति को बैठाकर निकाला जुलूस:बाल खींचकर थप्पड़ मारे, कपड़े फाड़े, स्त्री के शरीर पर पुरुष क्यों चाहते हैं 'कब्जा'

7 महीने पहलेलेखक: भाग्य श्री सिंह
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मध्य प्रदेश के देवास के उदयनगर के बोरपड़ाव गांव में आदिवासी महिला के साथ बर्बरता हुई। 3 बच्चों वाली शादीशुदा महिला प्रेमी के घर मिली। आक्रोशित पति और भीड़ ने महिला पर इतने थप्पड़ बरसाए कि वह बेसुध होकर जमीन पर गिर पड़ी। हिम्मत बटोर कर जब वो दोबारा उठी तो फिर से तमाशबीनों ने उसके साथ बेदर्दी से मारपीट की। लोगों ने महिला के पति को उसके कंधे पर बैठाकर पूरे गांव में जुलूस निकला और उसके बाल कतर डाले।

इतने से भी जी न भरा तो लोगों ने महिला और उसकी प्रेमी को जूतों की माला पहनाई। इस बर्बरता को पुलिस वाले ने भी देखा। इस दौरान कोई उसे बचाने नहीं आया, तमाशबीन भीड़ हंसते हुए वीडियो बनाती रही। जानें अगर पुरुष ऐसा करे तो समाज में उसे किस तरह देखा जाएगा।

उदित नारायण पीजी कॉलेज पडरौना- कुशीनगर, उत्तर प्रदेश के समाजशास्त्र विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर विश्वंभर नाथ प्रजापति और आदिवासी लेखक-विचारक डॉ सुनील कुमार 'सुमन' बता रहे हैं कि महिला और पुरुष के बीच इस असमानता की वजह क्या है?

आदिवासी समाज का खुलापन कैसे बदला?
आदिवासी समाज प्रकृति के नियमों को मानता है। पीड़ित महिला भिलाला आदिवासी सामज से है। इस समुदाय में साथी चुनने की आजादी है। होलिका दहन से 7 दिन पहले यहां भगोरिया पर्व होता है। यहां सांस्कृतिक, हाट जैसी कई चीजें होती हैं। मेले में युवा जीवनसाथी चुनते हैं। स्त्री और पुरुष को समान दर्जा मिला है। दोनों सामान रूप से जीवनसाथी चुनने के लिए आजाद हैं।

कई आदिवासी समाज मातृसत्तात्मक हैं और बहुत से पितृसत्तात्मक। बारीकी से देखा जाए तो जहां स्त्रियां आदिवासी समाज की मुखिया हैं वहां भी पुरुषों का सत्ता में दखल है। मुख्य धारा की तरह वहां लिखित नियम नहीं हैं। आदिवासी समाज में इस बदलाव की शुरुआत तब हुई जब वह मुख्यधारा के समाज के संपर्क में आया। इसके साथ ही कई बुराइयां भी पनपीं। पहले की तरह आदिवासी स्त्रियां उन्मुक्त नहीं रहीं। आदिवासी समुदाय में पहले दहेज प्रथा नहीं थी, लेकिन अब ऐसा हो रहा है।

महिला के शरीर को परिवार की इज्जत से कैसे जोड़ा जाता है?
महिला किसके साथ रहना चाहती है या प्रेम में है यह तय करने का अधिकार उसका व्यक्तिगत है। पितृसत्तात्मक समाज ने स्त्री का सम्मान उसकी योनि से जोड़ कर उस पर मानसिक रूप से नियंत्रण करने की कोशिश की है। कई मामलों में बलात्कारी से महिला की शादी कराने की कोशिश पुरुष के अत्याचारों को छिपाने के लिए की जाती है।

शुरुआत में साहित्य पर पुरुषों का प्रभुत्व रहा, ऐसे में समाज के नियम उन्होंने बनाए। मंगलसूत्र, सिंदूर, चूड़ियां और बलात्कार जैसी चीजें महिला को मानसिक रूप से कंट्रोल करने की कोशिश भर है। पितृसत्ता ने महिला के शरीर को सम्मान से जोड़ कर ऐसा हथियार बना लिया है कि जब हारता है तब उस पर वार करके अहम संतुष्ट करता है। पुरुष के बिना महिला के शरीर का कोई अस्तित्व ही तय नहीं हो पा रहा है।

बंद कमरे में हो रही हिंसा के खिलाफ करें आवाज बुलंद
भीड़ जब महिला के साथ हिंसा करती है तो वीडियो वायरल होता है, लेकिन घर में भी औरतों के साथ मारपीट, ताने मारना और उन पर अपनी मर्जी थोपने जैसे अन्याय होते हैं। चहारदीवारी में लड़कियों के पैदा होने के साथ ही यह देखने को मिलता है। पैदा होने के 1 महीने के भीतर तक गर्ल चाइल्ड का सर्वाइवल रेट मेल शिशु से ज्यादा है, लेकिन 1 से 5 साल में लड़कियों का सर्वाइवल रेट कम हो जाता है। ऐसा अल्ट्रासाउंड और एबॉर्शन जैसी चीजों के चलते होता है। बैन के बावजूद गर्भ में ही अजन्मी बच्चियों को मार दिया जाता है।

लंबे समय से चला आ रहा यह वायलेंस समाज की नसों में इस कदर रच बस गया है कि अब इसमें फर्क नजर आना बंद हो चुका है और लोग इसे भूल चुके हैं। इस षड्यंत्र से बचने के लिए महिलाओं को खुद ही पहल कर आवाज बुलंद करनी होगी।

ऐसे मामले में कानून का सहारा क्यों नहीं लिया जाता?
अमूमन ऐसे मामलों में कानून का सहारा इसलिए नहीं लिया जाता, क्योंकि कानून महिला और पुरुष दोनों को सामान तरह से ट्रीट करेगा। पति का पत्नी को पीटना लोगों के लिए आम बात है। महिला का पति और समाज इसे कानून के परिप्रेक्ष्य में नहीं देखता है। ऐसे में महिलाओं के पास ये स्कोप ही नहीं बचता या वे यह सोच ही नहीं पाती कि कानून का सहारा लें।

पुरुष इस मामले में कानून का सहारा इसलिए नहीं लेता, क्योंकि कानून डिग्निटी वाला फैसला लेगा जो उसके ईगो को संतुष्ट नहीं कर पायेगा। या कानून उसके हक में न हो या वो मनमानी न कर पाए। महिला को अपमानित न कर पाए या बदला न ले पाए। पुरुष खुद को कानून के दायरे से बाहर रखने के लिए भी कानून का सहारा नहीं लेता है।

बाल विवाह इसके लिए कहां तक जिम्मेदार है?
कम उम्र में निर्णय लेने की सोच डेवलप नहीं होती है। प्रेम और विवाह दो अलग चीजें नहीं। बाल विवाह के कपल जब बड़े होते हैं तो उनके मन में छिपा विद्रोह कई तरह से सामने आ सकता है, क्योंकि बाल विवाह में 'हां' या 'ना' नहीं पूछते। प्रेम का निर्णय व्यक्तिगत होता है, लेकिन शादी या बच्चे पैदा करने का फैसला लेने से पहले लोगों की राय नहीं ली जाती। विवाह संस्था में अब तक महिला की 'हां' या 'ना' और उसकी 'पसंद' या 'नापसंद' को नकार दिया जाता है।