नाम 'पुष्पा', बातें महिला विरोधी:परवरिश करने के लिए मां चाहिए, लेकिन सरनेम के लिए बाप, महेश भट्‌ट भी खुद को मानते हैं 'नाजायज'

नई दिल्ली7 महीने पहलेलेखक: निशा सिन्हा
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साउथ की फिल्म पुष्पा ने भले ही सफलता के सारे रिकॉर्ड ध्वस्त कर दिए हों, मगर वह कई सवाल भी छोड़ जाती है। फिल्म के हीरो का नाम पुष्पा है, जो किसी महिला का नाम लगता है। मगर, फिल्म में कई ऐसी बातें हैं, जो महिलाओं के सम्मान के खिलाफ जाती दिखती हैं। जैसे-हीरो विलेन को कहता है, महिलाओं का सम्मान करो, मगर खुद पैसे देकर हीरोइन से किस मांगता है। पूरी फिल्म में बाप के सरनेम के कॉम्लेक्स में जीता है। 70 के दशक में यश चोपड़ा की फिल्म दीवार की मशहूर लाइन'मेरे पास मां है" बेहद चर्चित हुई थी, जो आज भी प्रासंगिक है। फिर ऐसी फिल्मों में परवरिश के लिए मां चाहिए और सरनेम के लिए बाप क्यों?

‘पुष्पा’ फिल्म में एक्टर को नाजायज होने का ताना मारा जाता है। इस फिल्म ने एक बार फिर से इस शब्द के अस्तित्व पर सवाल उठाया है। उन बच्चों के अस्तित्व पर सवाल खड़ा किया हैं, जिन्हें पिता का नाम नहीं मिलता। हालांकि साइकेट्रिस्ट यह मानते हैं कि अब यह शब्द शर्मिंदा करने वाला नहीं रहा।

एक्ट्रेस नीना गुप्ता फैशन डिजाइनर बेटी मसाबा के साथ एक वेबसीरीज कर चुकी हैं।
एक्ट्रेस नीना गुप्ता फैशन डिजाइनर बेटी मसाबा के साथ एक वेबसीरीज कर चुकी हैं।

नीना गुप्ता थीं बिन ब्याही मां
फिल्म ‘बधाई हो’ से मिलेनिअल जेनरेशन के बीच मशहूर हुई एक्ट्रेस नीना गुप्ता भी बिना विवाह किए मां बनी। उन्होंने एक बार कहा था, “आज भी शादी के बगैर मां बनना आसान काम नहीं क्योंकि मेरे जैसे लोग आज भी अल्पसंख्यक ही माने जाएंगे। बहुसंख्यक आज भी पुरानी सोच रखते हैं। मैंने जो कदम उठाया, उसे दूसरे को करने से मना करूंगी। यह बहुत ही कठिन है। बच्चे के साथ भी नाइंसाफी होती है। ”

नीना यह स्वीकारती हैं कि बच्चे को मां-बाप दोनों का प्यार मिलना चाहिए।
नीना यह स्वीकारती हैं कि बच्चे को मां-बाप दोनों का प्यार मिलना चाहिए।

नाजायज शब्द अब धब्बा नहीं
अब लिव-इन रिलेशनशिप आम हो गई है। कानून की तरफ से भी इसे स्वीकृति मिल गई हैं। यहां तक कि लिव-इन संबंधों के बाद जन्म लेने वाले बच्चों को लेकर भी कानून बन गए हैं। ऐसे में बिन ब्याही मां शब्द के मायने क्या रह गए हैं ? क्या आज भी ऐसी महिलाएं और इनके बच्चे समाज की स्वीकृति के मोहताज हैं ?

डॉ. गौतम साहा कहते हैं, पेरेंटिंग के मामले में सिंगल पेरेंट भी अच्छे साबित हो रहे हैं।
डॉ. गौतम साहा कहते हैं, पेरेंटिंग के मामले में सिंगल पेरेंट भी अच्छे साबित हो रहे हैं।

बिन ब्याहे बाप बनने वाले से तो कोई सवाल नहीं करता, तो यह सवाल मां और उसके बच्चे से क्यों पूछा जाता है। सार्क साइकेट्रिस्ट्स फेडरेशन के अध्यक्ष कंसल्टेंट साइकेट्रिस्ट डॉ. गौतम साहा के अनुसार, “आज से 15-20 साल पहले सिंगल मदर का विषय नया था लेकिन अब ऐसा नहीं है। ”

डॉ. साहा मानते हैं, आज सिंगल फादर भी अपने बच्चे की जिम्मेदारी निभाने में सक्षम हैं।
डॉ. साहा मानते हैं, आज सिंगल फादर भी अपने बच्चे की जिम्मेदारी निभाने में सक्षम हैं।

क्या सिंगल पेरेंट के बच्चों पर तनाव हावी होता
डॉ साहा यह समझाते हुए कहते हैं कि “ माता-पिता साथ रहते हो लेकिन दोनों की आपस में न बने, दोनों के बीच रोज झगड़े होते रहे, तो इसका बुरा असर उनके बच्चे पर पड़ता है। इसलिए यह कहना गलत होगा कि दोनों पेरेंट्स की उपस्थिति में ही बच्चे का संपूर्ण विकास संभव है”।
“दूसरी तरफ, आज समाज में ऐसे उदाहरण मिलते हैं जहां सिंगल फादर या सिंगल मदर बच्चे का बखूबी लालन-पालन कर रहे हैं। इनके बच्चे भी हर मायने में सामान्य बच्चों की तरह पढ़ते और नौकरियां करते हैं। आज के समय में एक पिता भी मां की तरह बच्चे की देखभाल करते दिखते हैं, तो मां भी पिता की जिम्मेदारी निभाती नजर आती है।”

फिल्ममेकर महेश भट्‌ट ने फिल्म 'जख्म' उनकी पहचान को लेकर ही बनायी।
फिल्ममेकर महेश भट्‌ट ने फिल्म 'जख्म' उनकी पहचान को लेकर ही बनायी।

महेश भट्‌ट खुद को मानते हैं नाजायज मानते
एक्ट्रेस आलिया भट्‌ट के पिता महेश भट्‌ट खुद को नाजायज औलाद मानते हैं। एक बार उन्होंने कहा था कि मुझे नहीं पता कि पिता शब्द के मायने क्या है क्योंकि मेरे पिता नहीं थे। मैं एक सिंगल मुस्लिम मां शिरीन मोहम्मद अली की नाजायज औलाद हूं।
महेश भट्‌ट की मां शिरीन एक एक्ट्रेस थी। महेश भट्‌ट खुद को शिरीन और प्रोड्यूसर नानाभाई भट्‌ट की प्यार की निशानी मानते हैं। उनके ब्राह्मण पिता के परिवार ने शिरीन को कभी नहीं स्वीकारा था।

मूवी 'क्या कहना' में बिना शादी मां बनने के विषय को दृढता के साथ उठाया गया।
मूवी 'क्या कहना' में बिना शादी मां बनने के विषय को दृढता के साथ उठाया गया।

बिन ब्याही मां पर बनी प्रीति ज़िंटा की मूवी गई थी सराही
साल 2000 में आई प्रीति ज़िंटा की फिल्म ‘क्या कहना’ प्री-मैरिटल प्रेग्नेंसी पर आधारित थी। लेकिन वास्तिवक जीवन में भी आज ऐसी घटनाएं देखने काे मिल रही है। डॉ. साहा बताते हैं कि ऐसे ही एक मामले में एक विवाहित पुरुष ने युवती के साथ संबंध बनाया और धोखा देकर चलता बना। बाद में युवती ने बच्चे को जन्म दिया। आज वह युवती टीचर है और परिवार के सपोर्ट से बच्चे को पाल रही है।
​​​​​​ढूढ़ने पर ऐसे ढेरों मामले मिल सकते हैं जहां पुरुष पल्ला झाड़ कर चल देता है। समाज प्री-मैरिटल रिलेशनशिप को बुरा कहता है। रिश्ते बनाने वाले गलत सोच के हो सकते हैं, हरकतें गलत हो सकती है लेकिन इस रिश्ते से जन्मी नन्ही सी जान नाजायज नहीं हो सकती।

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