सेक्स और प्यार के बीच उलझा स्त्री मन:महिलाएं रोमांटिक रिलेशनशिप को ‘हटो जी, कोई आ जाएगा’ की भेंट क्यों चढ़ाती हैं

6 महीने पहलेलेखक: मीना
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हिंदी सिनेमा में अक्सर दिखाया जाता है कि जब पति रोमांटिक मूड में होता है और पत्नी के सामने अपने प्यार को जाहिर कर रहा होता है तो उस समय पत्नियों का एक ही डायलॉग होता है- ‘हटो जी, कोई आ जाएगा।’ हालांकि, उस स्त्री का मन भी प्यार में डूबने का होता है, लेकिन वह पहल करने से झिझकती है। यह स्थिति ठीक 1977 में आई फिल्म घरौंदा के गीत ‘मुझे प्यार तुमसे नहीं है, नहीं है/कभी मैंने चाहा, तुम्हें छू के देखूं/ कभी मैंने चाहा, तुम्हें पास लाना/ मगर फिर भी, इस बात का तो यकीं है/मुझे प्यार तुमसे नहीं है, नहीं है’… से मेल खाती है। लड़कियां प्यार की छुअन को महसूस करना चाहती हैं, लेकिन पहल करने से झिझकती हैं। दिल्ली में क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट डॉ. प्रज्ञा मलिक का कहना है कि न्यूरोलॉजिकल, बायोलॉजिकल, साइकोलॉजिकल और सामाजिक कारणों की वजह से लड़कियां इस तरह की उलझन में रहती हैं। वह कहती हैं कि लड़कियों के दिमाग में बचपन से ही ऐसे नैतिक मूल्य ठूस दिए जाते हैं कि उन्हें सेक्स एक गंदा शब्द लगता है और उससे जुड़ी हर बात गंदी बात होती है।

ढके-छिपे स्तर पर होती है सेक्स पर बात
जब तक लड़की की शादी नहीं हो जाती तब तक उसे वर्जिनिटी ऐसी धरोहर लगती है जिसे वह खो नहीं सकती। लेकिन हमारे समाज में सेक्स का सही ज्ञान देने का परहेज है। हर बात ढके-छिपे तौर पर चलती है। लड़कियां अधपकी और अधकचरी जानकारी के साथ बड़ी होती हैं और फिर मां शादी के बाद 'शुभ मंगल सावधान' फिल्म की तर्ज पर अपनी उसी बेटी से पूछती है ‘बेटा, क्या अली बाबा गुफा तक पहुंचे।’ बेटी को न बाबा समझ आता है और न ही गुफा।

समाज में लड़कियों को नैतिक मूल्यों की खुराक देकर बड़ा किया जाता है जिनमें यह बात घोलकर पिलाई जाती है कि लड़की को सेक्स पर बात करने से परहेज करना है, सेक्स गंदी बात है, पहल नहीं करनी, अपने मन की भावनाओं को चाहकर भी जाहिर नहीं करना है…ये बातें जब उसकी सामान्य भावनाओं पर हावी रहेंगी तो वह कभी भी खुलकर अपने मन की बात नहीं कह पाएगी।
दांपत्य संबंधों में सेक्सुअल रिलेशनशिप को निभाना उसके लिए एक बहुत बड़ी मशक्कत होगी। अपनी शारीरिक जरूरतों को पहचानने के बावजूद वो उन्हें शब्द नहीं दे पाती। ‘पति क्या सोचेगा’ या ‘लोग क्या कहेंगे’ इसी उलझन में फंसी रहती है।

जिन लड़कियों में गिल्ट, शर्म, लो-सेल्फ एस्टीम और आत्मविश्वास की कमी होती है वे भी पहल करने से घबराती हैं। दूसरा, डिप्रेशन, एंग्जायटी से जूझने वाली महिलाएं भी रोमांटिक रिलेशनशिप से कतराती हैं, क्योंकि उन्हें डर होता है कि अगर उनके पार्टनर को उनकी सच्चाई मालूम हो गई तो रिश्ता खत्म हो जाएगा।
डॉ. प्रज्ञा का कहना है कि लड़कों में हाई रिस्क टेकिंग बिहेवियर होता है और लड़कियों में ये कम होता है, इसलिए लड़के पहल करने से घबराते नहीं हैं। लड़कियों को सिखाया जाता है कि सेक्स करना गलत है, क्योंकि ये उनके नैतिक मूल्यों के खिलाफ है।

लड़की के साथ बचपन में सेक्सुअल एब्यूज होना, पेरेंट्स के रिश्ते में लड़ाइयां देखना…ऐसे अनुभव हुए होते हैं जो चलकर आगे चलकर जीवनसाथी के साथ सामान्य संबंध बनाने में आड़े आते हैं। ऐसी लड़कियां शादी की संस्था से बचती हैं और शादी से नफरत करने लगती हैं। पेरेंट्स बच्चियों को बचपन से ओवर प्रोटेक्टिड रखते हैं जिस वजह से ऐसी लड़कियों की शादी में दिक्कत आने लगती है। पति अगर रिलेशनशिप में ओपन है और पत्नी बराबरी का साथ नहीं दे पा रही है तो अंतरंग रिश्ते तो खराब होते ही हैं साथ ही बात तलाक तक भी पहुंच सकती है।

बच्चों को नहीं दी जाती सही जानकारी
सेक्स कोच पल्लवी बर्नवाल का कहना है कि हमारे घरों में बच्चों को अपने बॉडी पार्ट्स के बारे में भी पूरी जानकारी नहीं दी जाती। हम बच्चों को पेनिस या वजाइना जैसे सही शब्द नहीं बताते, बल्कि उसके बदले में नुन्नो, नुन्नी, ये चीज, वो चीज, सुस्सु जैसे शब्द बताते हैं। तो वहीं, मेंस्ट्रुअल को गंदी चीज बताया जाता है। जब घरों में इन बेसिक चीजों पर ही सही जानकारी नहीं दी जाती तो लड़कियों के लिए सेक्स पर बात करना किसी शॉक से कम नहीं होगा।
समाज लड़कियों को शादी से पहले सेक्स नफरत की चीज की बताता है और शादी के बाद उसे स्पेशल बना दिया जाता है, जिस वजह कपल को लगता है कि सारा प्लेजर हनीमून पीरियड में ही है, उसके बाद जिंदगी का आनंद नहीं बचेगा। सेक्स कोच पल्लवी बर्नवाल का कहना है कि लड़कियां इतनी बिजी हो जाती हैं कि उन्हें लगता है कि संबंध बनाने के लिए अलग से स्पेशल टाइम निकालना होगा, यही वजह है कि रिश्ते में फ्रस्ट्रेशन भी बढ़ता है।

सेक्स के प्रकार
दूसरा, लोगों में यह गलतफहमी है कि ऑर्गेज्म इंटरकोर्स फाइनल इवेंट है, लेकिन इंटरकोर्स का पूरा प्रोसेस होता है। शारीरिक संबंधों को कई परिस्थितियों में बांटा जा सकता है। सेक्स कोच इसे फंक्शनल, रोमांटिक और ग्रीफ सेक्स की श्रेणियों में बांटते हैं। सेक्स सिर्फ एंजॉयमेंट नहीं है बल्कि शोक का भी हिस्सा हो सकता है। शादी में 20 फीसद सैटिसफेक्शन सेक्सुअल रिलेशनशिप से आता है, लेकिन किसी एक पार्टनर के पहल न करने या इच्छा न जताने भर से रिश्ता खराब होने लगता है।
लड़कियों को कैरेक्टर सर्टिफिकेट न देने से बनेगी बात
डॉ. प्रज्ञा का कहना है कि लड़कियों का सेक्स को लेकर जूझना उन्हें खुद परेशानी में डाल सकता है। सोशल प्रेशर को दूर करने, खुद के लिए रास्ते बनाने और अपनी जरूरतों को पार्टनर को खुलकर बताने से समस्या का हल हो सकता है। एक-दूसरे की शारीरिक और भावनात्मक जरूरतों को सम्मान की नजर से देखना।
महिला को छोटा महसूस न कराना। जो पुरुष स्त्री के पहल करने या स्त्री की शारीरीक आवश्यकताओं को सम्मान की नजर से नहीं देखते वे बहुत बड़ी गलती करते हैं, क्योंकि वे अपने पार्टनर को हमेशा के लिए चुप करा देते हैं। उस महिला का आत्मविश्वास हिल जाता है। वो फिर कभी पहल करने से कतराती और झिझकती है। लड़कियों को ये महसूस होने लगता है कि उनके पहल करने को उनके चरित्र से जोड़कर देखा जाएगा। यही एक वजह है कि स्त्रियां सेक्स और प्यार के बीच की उलझनों से गुजरती हैं।

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