रिश्ते का हाइड एंड सीक:लड़कियां घरवालों से क्यों छुपाती हैं लड़कों से अपनी फ्रेंडशिप

2 महीने पहले
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भारतीय समाज में अमूमन महिलाओं से वन मैन वुमन होने की उम्मीद की जाती है, यानी समाज के एक बड़े हिस्से में यह सोच देखने को मिलती है कि जिससे लड़की की शादी हो वही उसका क्रश, दोस्त या प्यार बने। फीमेल के किसी अन्य तरह के रिश्ते या मेल फ्रेंड्स को आसानी से स्वीकार कर पाना आम भारतीय परिवारों के लिए मुश्किल होता है। शायद यही वजह है कि लड़कियां अपने मेल फ्रेंड के बारे में बात करने से कतराती हैं।

मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने वाली रुचि के कॉलेज से लेकर इंटर्नशिप में साथ काम करने वाले कई मेल फ्रेंड्स है, जिनका जिक्र उन्होंने घर पर कभी नहीं किया। वजह पूछने पर उन्होंने बताया कि उन्हें इस बात का डर है कि कहीं परिवार वाले उसकी सुलझी हुई दोस्ती को ऐसा-वैसा रिश्ता समझकर उस पर शक न करें, इसलिए वह अपने मेल फ्रेंड्स के बारे में बात करने से बचती हैं। परिवार लड़का-लड़की की दोस्ती को समझने की कोशिश भी करे, तो रिश्तेदार और समाज में गलत मैसेज पहुंचने का खौफ उन्हें ऐसा करने से रोकता है।

क्या आपके घर में भी रहती है रुचि?

मिडल क्लास फैमिली का दुख यह है कि न वो ठीक तरह से प्रोग्रेसिव अपर क्लास की तरह बन पाते हैं, न ही खुद को छोटी सोच वाला कहलाना पसंद करते हैं। इन दोनों के बीच बैलेंस बनाना उनके लिए बड़ा काम होता है। शायद इसलिए हमें हर घर में एक या उससे ज्यादा रुचि मिल ही जाएगी, जो लड़कों से दोस्ती तो करती है, पर घरवालों को नहीं बताती। जिस तरह छेड़छाड़ की शिकायत और शादी की प्रॉब्लम्स को दबाने के उदाहरण हमें बचपन से ही देखने को मिलते आए हैं, वैसे ही लड़कों से दोस्ती न करने की सलाह भी हमें घुमा-फिरा कर बातों-बातों में दे दी जाती है। घर पर हमारे सामने कह दिया जाता है कि फलाने की बेटी के लक्षण अच्छे नहीं हैं, क्योंकि उसकी दोस्ती लड़कों से है। इसका सीधा मतलब होता है कि लड़कों से दोस्ती यहां पसंद नहीं की जाएगी, क्योंकि ये दोस्ती समाज के खांचे में फिट नहीं बैठती।

लड़कों से दोस्ती न रखने वाली होती है 'संस्कारी लड़की'

फैमिली काउंसलर पीयूष भाटिया कहती हैं कि लड़कियों के मन में ये डर होता है कि उनकी दोस्ती की वजह से उन्हें आंका जाएगा। परिवार और रिश्तेदार उनके कैरेक्टर पर सवाल खड़े करेंगे। यहां तक कि मेल फ्रेंड्स होने की वजह से उनकी शादी की बात चलने के दौरान उन्हें रिजेक्शन झेलना पड़ सकता है। लोगों को लगता है कि लड़कों की संगत में रहकर लड़कियां 'संस्कारी' नहीं रह पातीं और इसलिए उन्हें उनकी छोटी से छोटी गलती पर भी लड़कों से दोस्ती होने के ताने दिए जाते हैं।

मेल फ्रेंड को लेकर लटकती शक की तलवार

सायकोलॉजिस्ट अजय निहलानी बताते हैं कि ये समाज पुरुषों के हिसाब से चलता है। यहां एक या उससे ज्यादा गर्लफ्रेंड होने पर लड़कों को दोस्त कहते हैं 'ओह हो! क्या बात है!' लेकिन लड़कियों के सर्कल में ज्यादा मेल फ्रेंड्स होने पर सवाल दागे जाते हैं। इसलिए लड़कियां तब तक किसी से अपने दिल की बात कहने से बचती हैं, जब तक उन्हें किसी पर पूरी तरह से विश्वास नहीं हो जाता। फेसबुक, इंस्टाग्राम और वॉट्सऐप पर एक स्टोरी शेयर करने भर से लोग आपके कैरेक्टर को लेकर जजमेंटल हो जाते हैं। ऐसे में लड़कियां अपनी पर्सनल लाइफ को भी अलग-अलग हिस्सों में बांटकर रखती हैं, जहां वे परिवार, रिश्तेदार और दोस्तों के बीच अपनी पर्सनल लाइफ अलग तरह से 'हाइड और शेयर' करती हैं।

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