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ये मैं हूं:बेटी के जन्म के बाद चार साल में खोले 40 स्कूल, पेरेंटिंग कोच के रूप में कई देशों में मिली पहचान

7 महीने पहलेलेखक: मीना

जिंदगी एक बार ही मिलती है इसलिए जो कुछ भी करना है कर डालो। सोचो, प्लान बनाओ और उसे लागू करो। मैंने केमिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की। एमबीए किया। फिर स्कूल खोलने से लेकर इंग्लिश और पेरेंटिंग कोच बनने तक तमाम काम किए।
आगे भी कुछ नया करने की भूख है। ये शब्द हैं आंत्रप्रेन्योर और इंफ्लुएंसर डॉ. पल्लवी राव चतुर्वेदी के।
बेंगलुरु में पली-बढ़ी पल्लवी वुमन भास्कर से खास बातचीत में कहती हैं, ‘मुझे बचपन से पढ़ने-लिखने वाला माहौल मिला। मां स्कूल में प्रिंसिपल और पिता जी बड़े व्यापारी। हम दोनों बहनें भी पढ़ने में किसी से कम नहीं। कुल मिलाकर, पढ़ाकू फैमिली रही मेरी। हा हा हा…
पढ़ने-लिखने वाला मायका और ससुराल मिला
मैंने बेंगलुरु और मुंबई से पढ़ाई करने के बाद कॉरपोरेट में करिअर शुरू किया। नेस्ले से लेकर ब्रेटिनिया तक में सीनियर पोस्ट पर काम किया। एमबीए के दौरान प्यार हो गया और आज से 10 साल पहले शादी करके भोपाल शिफ्ट हो गई।

डॉ. पल्लवी कहती हैं कि बेंगलुरु से जब मैं भोपाल शिफ्ट हुई तो यह कल्चरल शॉक था, लेकिन धीरे-धीरे यहां के कल्चर में ढल गई।
डॉ. पल्लवी कहती हैं कि बेंगलुरु से जब मैं भोपाल शिफ्ट हुई तो यह कल्चरल शॉक था, लेकिन धीरे-धीरे यहां के कल्चर में ढल गई।

बेंगलुरु से भोपाल शिफ्ट होना कल्चर शॉक भी रहा, लेकिन मुझे परिवार बिल्कुल वैसा ही मिला जैसा मेरा मायका। मतलब पढ़े-लिखे लोगों का परिवार। हमारे Aisecp ग्रुप युनिवर्सिटी से लेकर अलग-अलग राज्यों में स्कूल भी चल रहे हैं। शादी के बाद फैमिली बिजनेस को जॉइन किया।
जिंदगी का पहला टर्निंग पॉइंट
मेरी जिंदगी में टर्निंग पॉइंट आया जब 2012 में मेरी बेटी हुई। बेटी की परवरिश को लेकर मैं इतनी चिंतित थी कि प्रेग्नेंसी के समय ही अर्ली चाइल्डहुड डेवलपमेंट पर किताबें पढ़नी शुरू कर दी थीं।
जब बेटी डेढ़ साल की हुई तब मैंने एक प्री-स्कूल खोला और इसके बाद अगले चार साल में 40 प्री स्कूल खोले। फिर पब्लिकेशन खोला। 0 से 8 साल तक के बच्चों को कैसे बचपन मिलना चाहिए, उसकी सीख देने वाले ये स्कूल खोले।
बचपन पर इतना काम किया कि आज अर्ली चाइल्डहुड ऑफ इंडिया की वाइस प्रेजिडेंट हूं। 2017 में जब मैं दूसरी मां बनी और एक बेटे को जन्म दिया तब फिर एक नई ऊर्जा से भर गई। इससे पहले 2014 में मैंने पीएचडी में दाखिला ले लिया था। मेरी पांच साल की बेटी, डेढ़ साल का बेटा, पीएचडी और प्री-स्कूल के लिए बिजनेस प्लान सबकुछ साथ-साथ चल रहा था। आज 17 साल हो गए हैं और एक दिन काम से छुट्टी नहीं ली है।
लॉकडाउन से मिली जीवनभर की सीख
मेरा काम इतना फैल चुका था कि यूएन से लेकर मकाओ तक मुझे पब्लिक स्पीकर के तौर पर बुलाया जाने लगा। वर्ष 2020 में लॉकडाउन हुआ तो यह जिंदगी का दूसरा टर्निंग पॉइंट साबित हुआ। मैंने जो प्री-स्कूल खोले थे, वे बंद रहे। पेरेंट्स पूछने लगे कि बच्चे अब क्या करें।

पल्लवी कहती हैं कि मेरे बच्चे ही मेरे प्रेरणा स्रोत हैं। उनके होने के बाद मुझे हर किसी शक्ति का अहसास हुआ और खुद को एंपावर फील किया।
पल्लवी कहती हैं कि मेरे बच्चे ही मेरे प्रेरणा स्रोत हैं। उनके होने के बाद मुझे हर किसी शक्ति का अहसास हुआ और खुद को एंपावर फील किया।

तब मैंने सोचा कि अगर मेरे पास इन्फॉर्मेशन है तो मैं उसे शेयर कर सकती हूं, जिससे लोगों को मदद मिले। इसी साल मैंने पेरेंटिंग पर पहला पोस्ट इंस्टाग्राम पर डाला। यहां मुझे लोगों का इतना प्यार मिला कि अब इंस्टाग्राम पर 3 लाख फॉलोअर्स हैं। इसी तरीके से यूट्यूब से लेकर फेसबुक तक पर लाखों में फॉलोअर्स हैं।
पेरेटिंग बना करियर का नया विकल्प
सभी जगह वैल्युएबल कंटेंट की मांग है। ऑनलाइन पढ़ाई से टेक्नोलॉजी एक नये रूप में सामने आया। तब पेरेंटिंग के लिए बड़ी चुनौती थी। बच्चों को स्क्रीन से कैसे दूर रखें, उसे अच्छा रीडर कैसे बनाएं, उसकी मेंटल हेल्थ का ख्याल कैसे रखें, उन्हें बुलिंग से कैसे बचाए आदि मुद्दों पर मैंने सोल्यूशन देना शुरू किया। सोशल मीडिया पर कंटेंट शेयर किया। इसे लोगों ने हाथों-हाथ लिया।

पल्लवी ने बच्चों के लिए ऐसे खिलौने तैयार किए जिनसे वे सीख भी सकें और खेल भी सकें।
पल्लवी ने बच्चों के लिए ऐसे खिलौने तैयार किए जिनसे वे सीख भी सकें और खेल भी सकें।

नए आइडियाज ही मेरी ताकत
मैंने पिछले वर्ष ब्रेनी बेयर स्टोर नाम से ई-कॉमर्स कंपनी बनाई जहां 0 से 5 साल तक के बच्चों को 100 से ज्यादा ऐसे खिलौने मुहैया कराए जाते हैं जिनसे खेल के साथ-साथ पढ़ाई भी हो सके। इन खिलौने के हमारे पास अब 10 हजार से ज्यादा कस्टमर्स हैं। ऐसे आइडियाज पर मैं काम करती हूं।
पति मेरे हर आइडिया की करते हैं प्रशंसा
मैं यहां तक इसलिए पहुंच पाई हूं क्योंकि मैं यह सब करना चाहती थी। मुझे अपने पेरेंट्स को प्राउड फील कराना था। ससुर और पति मेरे हर आइडिया की प्रशंसा करते हैं। मेरे बच्चे मेरे प्रेरणास्रोत हैं। यही सब मेरे सक्सेस फैक्टर हैं।

पल्लवी कहती हैं कि फैमिली सपोर्ट से ही मैं इतना आगे बढ़ पाई हूं।
पल्लवी कहती हैं कि फैमिली सपोर्ट से ही मैं इतना आगे बढ़ पाई हूं।

बाधाओं को अवसर में बदले
पूरी जर्नी में मैंने सीखा है कि जिंदगी में रुकावटें तो बहुत आती हैं लेकिन उन्हें परेशानी न समझकर अवसर की तरह इस्तेमाल करें। आज सोशल मीडिया ने महिलाओं को करिअर बनाने के नए ऑप्शन दिए हैं। अब वे घर बैठे बहुत कुछ कर सकती हैं। पहले मैं सिर्फ पेरेंटिंग के वीडियो बनाती थी। मुझे मैसेज आने लगे कि मेरी इंग्लिश अच्छी है, तो मैंने इंग्लिश पर भी कंटेंट बनाना शुरू कर दिया। मुझे लगता है कि जिंदगी में कभी रुकना नहीं चाहिए, बस आगे बढ़ते रहो।
खुद की जिंदगी के ड्राइवर खुद बनें
अगर हमें आगे बढ़ना है तो सबसे पहले खुद के काम को गंभीर तरीके से देखना होगा। उस आइडिया पर फोकस करना होगा। किसी आइडिया पर कैसे काम करेंगे उसे लिखें और रोज उस पर काम करें। खुद की गाड़ी का ड्राइवर खुद बनें, दूसरों को खुद का ड्राइवर न बनने दें।