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ये मैं हूं:6 बार इंटरनेशनल और 7 बार नेशनल चेस चैंपियन बनी, न 21 लाख का इनाम मिला न सरकारी नौकरी

4 महीने पहलेलेखक: मीना

‘फर्ज कीजिए वो लड़की जो बोल-सुन नहीं सकती पर, शतरंज की इंटरनेशनल खिलाड़ी बनती है और देश के लिए तमाम मेडल लेकर आती है, लेकिन आज उसी इंटरनेशनल खिलाड़ी को सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने पड़ रहे हैं। सरकार की तरफ से उसके खेल को बढ़ावा देने के लिए जो वादे किए गए उन्हें पूरा करने की मांग वो आज तक कर रही है। चप्पलें घिसने और सोशल मीडिया का सहारा लेने के बाद पंजाब सरकार ने सीएम रिलीफ फंड से 21 लाख रुपए कैश और कोच की नौकरी देने की घोषणा की है। मुझे सरकार के इन दावों पर तब तक भरोसा नहीं होगा जब तक कैश मेरे अकाउंट में और नौकरी मेरे हाथ में नहीं आ जाती।’ यह बगावती भाव हैं शतरंज की पहली मूक-बधिर इंटरनेशनल खिलाड़ी मलिका हांडा के।

मलिका हांडा इंटरनेशनल और नेशनल लेवल की शतरंज की खिलाड़ी हैं।
मलिका हांडा इंटरनेशनल और नेशनल लेवल की शतरंज की खिलाड़ी हैं।

वुमन भास्कर से खास बातचीत में मलिका कहती हैं, ‘मेरे जन्म पर घर में मिठाइयां बांटी गईं। गिद्दा किया गया। ढोल-नंगाड़े बजे, लेकिन इन सारी खुशियों पर तब पानी फिर गया जब मैं सवा साल की हुई तो परिवार को पता चला कि मैं बोल-सुन नहीं सकती। मां का हाल खराब था। उन्होंने रो-रो कर आंगन भर दिया। फैमिली की सारी खुशियां किसी काली रात की तरह स्याह हो गईं। लेकिन खुशियां वापस लौटीं और ईश्वर के दिए हुनर ने मेरी झोली भर दी।
पहली बार 10वीं में खेला शतरंज
मैं 10वीं क्लास में थी जब शतरंज खेलना शुरू कर किया। पहली बार चेन्नई में शतरंज खेलने का मौका मिला और स्टेट लेवल पर सेकेंड प्राइज जीता। परिवार ने मुझे शतरंज खिलाई क्योंकि परिवार में सभी शतरंज खेलने में माहिर हैं। मैंने कोई प्रोफेशनल ट्रेनिंग नहीं ली। मम्मी-पापा, भाई और दादा मुझे बिजी रखने के लिए घर में शतरंज खेला करते, ताकि मैं उनके साथ खुश रहूं। मुझे ऐसा महसूस न हो कि मैं कोई स्पेशल चाइल्ड हूं। मुझे बचपन से हर चीज को पहचानने, उसका स्वाद समझने और अक्षर का स्वर बोलने में एक्सट्रा मेहनत करनी पड़ी। इसलिए स्वभाव शुरू से फतह करने वाला रहा, हार मानने वाला नहीं। बचपन से ही बैडमिंटन खेलती और डांस किया करती। यही नहीं मॉडलिंग कॉन्टेस्ट में भी गई और मिस पंजाब बनी।
लगातार सात बार बनी चैंपियन
2012 में जम्मू कश्मीर में डेफ कैटेगरी की नेशनल चेस चैंपियन जीती और गोल्ड मेडल हासिल किया। जब मैंने पहली बार चैंपियनशिप जीता तो उसके बाद खेलने का जुनून सवार हो गया। फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। मूक-बधिरों की नेशनल चेस चैंपियनशिप लगातार सात बार जीत चुकी हूं। 2015 में गेम मंगोलिया में खेला और 2016 में अर्मेनिया में वर्ल्ड डेफ चेस चैंपियनशिप गई। इन दोनों देशों से गोल्ड मेडल जीतकर लौटी। इंटरनेशनल लेवल पर चार सिल्वर मेडल भी जीते।

मलिका की मां ने हर वक्त में उनकी मदद की।
मलिका की मां ने हर वक्त में उनकी मदद की।

पंजाब सरकार के साथ क्या है मामला?
पंजाब सरकार में खेल मंत्री रह चुके राणा गुरमीत सिंह सोढ़ी से मैं जाकर मिली और उनसे मुझे खेल में मदद देने का आश्वासन मिला। उन्होंने मेरे मेडल और सर्टिफिकेट देखे। मेरी बहुत सराहना की। उस समय मैं 12वीं क्लास में पढ़ रही थी, तब खेल मंत्री ने मुझे आश्वासन दिया कि मैं ग्रेजुएशन कर लूं तब वे मुझे ‘ए’ ग्रेड की नौकरी देंगे। इस आश्वासन के बाद मैं खुश होकर वहां से निकली और इस बीच पैरालंपिक गेम्स में भी मेडल लेकर आई।
ग्रेजुएशन पूरी करने के बाद दोबारा खेल मंत्री के पास गई और उनका वादा उन्हें याद दिलाया। खेल निदेशक की तरफ से मुझे फोन आया और मेरे ओरिजनल सर्टिफिकेट मंगवाए गए। ताकि कैश अवॉर्ड और नौकरी दे सकें। मैं खुशी-खुशी खेल निदेशक के दफ्तर पहुंची। मेरी फाइल देखने के बाद वहां बैठे अधिकारी ने कहा कि तुम्हारे सर्टिफिकेट डेफ ऐंड डंब के हैं और इसके लिए हमारे पास कोई पॉलिसी नहीं है। ये जवाब सुनने के बाद मैं निराश हो गई। इस पूरे मामले को ट्वीट किया और मंत्री जी पर दबाव पड़ने लगा।

Respected sir Cc: @narendramodi @PMOIndia @CHARANJITCHANNI sir @AmitShah sir @ANI @aajtak pic.twitter.com/NgNsodDnho

— Malika Handa🇮🇳🥇 (@MalikaHanda) January 4, 2022 " target="_blank">http://

उसी समय अखबार में खबर आई कि 8 सितंबर को जब नीरज चोपड़ा का पंजाब में सम्मान किया जाएगा तभी मलिका को भी कैश अवॉर्ड दिया जाएगा। ये बात हमें अखबार की खबर पढ़कर ही पता चली। हमें चंडीगढ़ से खेल निदेशक का साइन किया हुआ लेटर भी मिला, जिसमें मलिका को बुलाने की बात लिखी गई थी। लेकिन प्रोग्राम शुरू होने से कुछ देर पहले ही हमें मना कर दिया जाता है कि अभी प्रोग्राम पोस्टपोन कर रहे हैं क्योंकि कोविड की वजह से ज्यादा भीड़ नहीं बढ़ानी। मैं और मेरे परिवार के सभी सदस्य अपना मन को मसोसकर घर वापस चले गए। कुछ दिन बाद पंजाब में अमरिंदर सिंह की सरकार गिर गई। हम नए मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी के नए मंत्रिमंडल के खेल मंत्री प्रगट सिंह के पास गए। 10 दिन बाद कैश अवॉर्ड सेरेमनी की गई लेकिन मुझे फिर नहीं बुलाया गया। उस दिन मैं खूब रोई। एक खिलाड़ी के सम्मान को बार-बार ठेस पहुंचाई जा रही थी। 31 दिसंबर, 2021 को मैं फिर पंजाब के खेल मंत्री के पास गई और उन्होंने जवाब दिया कि डेफ बच्चों के लिए हमारे पास पॉलिसी नहीं है और हम आपको कैश अवॉर्ड व नौकरी नहीं दे सकते। मैं गुस्से में घर आई और अपनी नाराजगी ट्वीट की, सारी परेशानी लिखी। सोशल मीडिया पर मामला फैलने पर चरणजीत सरकार ने 21 लाख कैश और कोच की नौकरी देने की घोषणा की।

मलिका तमाम अवॉर्ड्स जीत चुकी हैं।
मलिका तमाम अवॉर्ड्स जीत चुकी हैं।

सरकार के दावों से अभी भी खुश नहीं हूं..
मैं ग्रेजुएशन कर चुकी हूं। इंटरनेशनल लेवल पर मेरे पास 2 इंटरनेशनल गोल्ड और चार सिल्वर मेडल हैं। नेशनल लेवल पर सात गोल्ड मेडल हैं। मैं ए, बी, सी, डी ग्रेड की नौकरी, कैश अवॉर्ड, कतार में किए गए वादों के साथ बैठी हूं और इंतजार कर रही हूं। जो दुर्दशा इस देश में खिलाड़ियों की होती है वो शायद ही किसी देश में होती होगी। हम मेहनत करें, हम मेडल लाएं, हम भूखे मरें या एड़ियां रगड़ें, किसी को फर्क पड़ने वाला नहीं। सरकारें नंबर बनाने के लिए मेडल की भूखी हैं और वादों के पूरे होने के इंतजार में खिलाड़ी बैठे हैं।

नोट : मलिका का गुस्सा, मलिका के तेवर, मलिका के दर्द और निराशा को शब्द देने वाली उनकी मां हैं।

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