• Hindi News
  • Women
  • This is me
  • A Market Woman Who Grabbed Her Husband's Property And Did Not Know What To Listen To, But Remained In Politics

अलका लांबा के बोल:पति की संपत्ति हड़पने वाली, बाजारू औरत और न जाने क्या-क्या सुनना पड़ा, पर पॉलिटिक्स में डटी रही

एक महीने पहलेलेखक: मीना

मैं महिला थी इसलिए सदन में बाजारू कहा गया, मैं महिला थी इसलिए पति की संपत्ति हड़पने वाली कहा गया, मैं सिंगल मदर हूं, इसलिए दुनिया के सामने मातृत्व का सबूत देना पड़ता है, पुरुषों से भरी राजनीति से तंग आई तो घर में खुद को सिकोड़ने की कोशिश भी की, लेकिन पार्टी ने मुझे घर में रहने नहीं दिया और फिर से कांग्रेस में सक्रिय हुई। पिछले 27 सालों से राजनीति में सक्रिय अलका लांबा ने ये बातें भास्कर वुमन से साझा कीं।

दिल्ली में पली-बढ़ी और आगे बढ़ीं अलका लांबा आज भारत में कोई अनजान नाम नहीं हैं, लेकिन इस प्रसिद्धि तक पहुंचने का रास्ता बहुत कांटों से भरा रहा। मिडिल क्लास फैमिली में 6 बहनों में से एक अलका का बचपन किसी सामान्य परिवार की तरह रहा, लेकिन शादी के बाद जिंदगी की नाव ही उलट गई। एक ऐसी लड़की जो दिल्ली विश्वविद्यालय में विज्ञान की स्टूडेंट रही, जिसे लैब से फुरसत नहीं मिलती थी, आज वो परखनलियों से निकल सड़कों पर सरपट दौड़ती है, नारे लगाती है, मर्दों के बीच घुसकर महिलाओं के हक की बात करती है। लेकिन 18 की उम्र में स्टूडेंट पॉलिटिक्स में अपने आप को पूरी तरह झोंकने के बाद मेरी शादी 20 साल में हुई। 22 में एक बच्चे की मां बनी और 25 में तलाक हो गया। सबकुछ इतनी तेजी से हुआ कि कुछ समझ ही नहीं आया। देखते-देखते ही मेरी आंखों के सामने जिंदगी की गाड़ी पटरी से उतर गई।

आजकल तो तलाक लेना इतना बड़ा पाप नहीं है जितना 22 साल पहले था। मुझे याद है उस दिन जब मैं अदालत में बैठी थी। ‘अलका हाजिर हों’, एक करारी आवाज मुझे चीरकर चली गई। मुझे भरी अदालत में अपना नाम इस तरह सुनना अटपटा लगा तो हाजिरी देने वाले व्यक्ति से जाकर कहा कि मैं सामने बैठी हूं, आप इशारे से बुला लें, पर इतनी जोर से मेरा नाम भरी अदालत में न पुकारें। लेकिन कोर्ट का प्रोटोकॉल था इसलिए तीन बार मेरा नाम ऊंची आवाज में बोला जाना जरूरी था। नाम की यह चीख केवल अदालत तक सीमित नहीं रही, मेरे घर तक आकर रुकी और एक पड़ोसी ने मेरी मां से कहा, ‘तेरी बेटी को उसके पति ने छोड़ दिया।’ तो मैंने तुरंत जवाब दिया, आपकी गलतफहमी है। उसने मुझे नहीं मैंने उसे छोड़ा है, क्योंकि वो मेरे काबिल नहीं था।’ ऐसा नही था कि ये हिम्मत मैंने पहली बार दिखाई थी, इससे पहले भी अपने परिवार में मजबूती का पिलर बनकर बहनों की मदद की थी। तलाक की कानूनी प्रक्रिया के दौरान रोजाना कोर्ट में चक्कर लगाना, बीएड-एमएड के मास्टर्स की डिग्री के लिए पढ़ाई के लिए कॉलेज जाना और घर में 5 साल के बच्चे की देखभाल। रोजाना डीटीसी की बसों में आना-जाना और शाम को बच्चों को ट्यूशन पढ़ाने के बीच उलझने लगी थी और एक दिन इतनी परेशान हो गई कि राजनीति से ब्रेकअप करने की ठान ली और 1999 से 2003 तक राजनीति से दूर रही, लेकिन एक दिन सोनिया गांधी के साथ मीटिंग हुई तो उन्होंने मुझे ऑल इंडिया महिला कांग्रेस की जनरल सेक्रेटरी बना दिया।

2003 में मुझे कांग्रेस ने दिल्ली विधानसभा चुनाव में मोती नगर से भाजपा के वरिष्ठ नेता मदनलाल खुराना के खिलाफ एमएलए का टिकट दिया। उन उम्रदराज नेता ने भी चुनाव प्रचार के दौरान मेरी छीछालेदर करने की कोई कसर नहीं छोड़ी। ‘पति को पीटा, सास को पीटा और पति की संपत्ति हड़पने वाली महिला’ के तौर पर उन्होंने मुझे पेश किया। उस समय मैं केवल 27 साल की थी और पहली बार चुनाव लड़ रही थी। मुझे मालूम था कि वो मुझसे बड़े हैं, मैं हारूंगी। उन्होंने अपनी वरिष्ठता ऐसे दिखाई कि तभी समझ आ गया था कि राजनीति का कोई स्तर नहीं है। मदनलाल जी इतने पर ही नहीं रुके, उन्होंने चुनाव प्रचार के दौरान अपने कार्यकर्ताओं से कहा, ‘जब भी मैं उनके घर वोट मांगने जाऊं तो मुझसे पूछें, कि तेरे पति ने तुझे क्यों छोड़ा? तूने अपने पति का घर हड़प लिया?... मुझ पर लोग हंसते। मेरे लिए ये सबकुछ भयानक याद की तरह मेरे जहन में सिमट गया है। मैं कैंपेन छोड़कर घर आई और इस बार मेंटली प्रिपेयर होकर गई कि अब मुझसे फिर से यही सवाल होंगे तो मैं तैयार हूं। इस बार जब बाहर निकली तो किसी ने कुछ नहीं पूछा। तो मैंने खुद ही पूछ लिया, ‘आपको मुझसे कुछ पूछना है?’ राजनीति में सस्टेन होने के लिए उन्होंने खुद को इस तरह तैयार किया।

राजनीति एक ऐसी कीचड़ है जहां महिलाओं का जमे रहना बहुत मुश्किल है। मदनलाल ही नहीं भाजपा के ओपी शर्मा ने भरे सदन में मुझे बाजारू औरत कहा। यह बात बहुत पुरानी नहीं, 2017 की है। ओपी शर्मा का यह बयान दिल्ली विधानसभा में दर्ज है। मैंने प्रोटेस्ट किया। ओपी शर्मा को एक साल के लिए सस्पेंड किया गया। वो कोर्ट गए, वहां भी उन्हें सपोर्ट नहीं मिला। कुछ लोग महिलाओं के बारे में ऊल जलूल बातें करते हुए सामने से पकड़ लिए जाते हैं, लेकिन ऐसे कितने हैं जो पीठ पीछे हमें न जाने किस-किस कैटेगरी में रख देते हैं। आप राजनीति में हैं तो आपकी कोई निजी जिंदगी नहीं है, ऐसा लोग आपको हर पल अहसास कराते हैं। ट्विटर पर अगर साड़ी के बजाए जींस में फोटो डाल दो तो सवालों की बौछार और तमाम कैरेक्टर सर्टिफिकेट मिलने लग जाते हैं। आज मेरा बेटा 24 साल का है। राजनीति में जिस तरह की मर्दानगी को देखा है अपने बेटे की परवरिश वैसे नहीं की। वो 5 मौसियों के बीच पला-बढ़ा है और मेरे तलाक के फैसले का सम्मान करता है। अब हर बेटी को मैं यही कहना चाहूंगी कि महिला चाहे शादीशुदा हो, तलाकशुदा हो या गैर शादीशुदा लड़की हो, राजनीति में सस्टेन करना मुश्किल है। यहां एक महिला को फूल की कली या कचनार की कली बनकर नहीं, कांटों से भरा गुलाब का फूल बनना पड़ता है। तभी मर्दों से भरे सदन में अपनी बात को आत्मविश्वास के साथ कह पाएंगी। पिछले 27 सालों में राजनीति ने मुझे यही सिखाया है। घर से बाहर अगर आपको अपने नाम की दुनिया बनानी है तो फिजिकली, मेंटली, फाइनेंशियली और इमोशनली स्ट्रांग होना पड़ेगा। तभी आप किसी फील्ड में सस्टेन कर पाएंगी।

खबरें और भी हैं...