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कविता लिखने के लिए घर में ही जीतनी पड़ी लड़ाई:ऑटो में बैठकर, चलते-चलते निकालती थी कविता लिखने के लिए टाइम, लोगों ने ससुर से की शिकायत तो लिखी चर्चित कहानी

नई दिल्ली22 दिन पहलेलेखक: दिनेश मिश्र

कस्बाई जीवन के अनुभवों से निकलकर महानगरीय लेखन में पैठ बनाने वाली लेखिका सोनी पाण्डेय उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले के सिधारी में यूं तो आर्ट टीचर हैं। मगर, वह अपने मन की गिरहों को कविताओं और कहानियों के जरिये खोलना बखूबी जानती हैं। पुरबिया भाषा में लेखन की ऐसी ठसक कि हिंदी और भी खिली-खिली सी नजर आती है। सोनी ने शादी के बाद मुश्किल हालातों के बीच पीएचडी की, बॉम्बे आर्ट से कथक डांस में डिप्लोमा भी किया। वह लेखन के साथ-साथ चित्र भी उकेरती हैं। उनकी रचनाएं कस्बाई की एक स्त्री के मन की परत दर परत में छिपी हर बात को बयां करती हैं, जिनमें अपनी माटी की गंध भी है और रह-रहकर टूटते-जुड़ते सपने भी हैं। उन्हें अपनी रचनाओं के लिए प्रतिष्ठित यशपाल सम्मान भी मिला। आइए, हम आपको मिलाते हैं सोनी पाण्डेय से, खुद उन्हीं की जुबानी....

मैं सोनी पाण्डेय ठेठ देहात की हूं, मगर खुद के दम पर लेखन में पहचान बनाई है। बचपन से ही लिखने का शौक रहा। मैं छोटी-छोटी कविताएं लिखा करती थी। शादी से पहले जब लड़कियां सतरंगी सपने बुनती हैं, तो मैंने कविताओं से दिल लगा लिया। अपनी डायरी में कुछ न कुछ जरूर लिखती। 1998 में शादी हुई तो पढ़ाई-लिखाई सब छूट गई। संयुक्त परिवार में गृहस्थी का बोझ कुछ ऐसा पड़ा कि मन को मारना पड़ा। इस बीच, पारिवारिक परेशानियों की वजह से आर्थिक तंगी आ गई। इसी वजह से आगे की राह भी खुली। फिर से बीएड करना और उसके बाद महाकवि निराला पर पीएचडी करना। मैं घर चलाने के लिए प्राइवेट स्कूल में पढ़ाने लगी। साहित्य से दोबारा जुड़ाव हुआ। उस स्कूल की लाइब्रेरी में मन रमने लगा। आजमगढ़ से होने के नाते महाकवि राहुल सांस्कृत्यायन पर अध्ययन किया। स्कूल के ही कुछ लोग जनवादी लेखन से जुड़े थे। उन्होंने मुझसे पूछा क्या लिखती हो. ...मैंने अपनी डायरी उन्हें थमा दी। तब उन्होंने कहा कि अनूठी हैं ये कविताएं...इन्हें तो जरूर छापा जाएगा। पहली बार मेरी कविताएं 2007 में सामयिक कारवां में छपीं। इसके बाद तो सिलसिला ही शुरू हो गया।

सोनी पाण्डेय ने मधुबनी पेंटिंग में भी बनाई पहचान।
सोनी पाण्डेय ने मधुबनी पेंटिंग में भी बनाई पहचान।

लिखना मेरी जिद और जुनून बना
एक समय ऐसा आया, जब लिखना मेरी जिद और जुनून बन गया, जिसके लिए घर-परिवार में भी बहुत कुछ सहना सुनना पड़ा। 2015 में मेरा पहला कविता संग्रह मन की खुलती गिरहें आया। मेरे इस पहले कविता संग्रह को 2016 में हिंदी युवा कवि का पुरस्कार शीला सिद्धांतकर मिला। इस दौरान दिल्ली के रचनाकारों के संपर्क में आई। एक वरिष्ठ महिला रचनाकार जो इस पुरस्कार के लिए निर्णायक मंडल में थीं, उन्होंने मेरे बारे में कहा, यह ऐसी लेखिका हैं, जो भोजपुरी को हिंदी में बड़ी ठसक के साथ लेकर आती हैं। मैं कविताएं लिखती तो थी, मगर इसकी घर-परिवार में स्वीकृति नहीं थी। पति सोचते थे कि चलो कुछ आय का साधन बन जाएगा। हमारे समाज में एक स्त्री का कविता लेखन अच्छा नहीं माना जाता था। अपने घर में स्त्री एक अपराधी की तरह होती है। वह कुछ नया नहीं कर सकती। अगर वह कुछ करती भी है तो उस पर घर और समाज के लोग सवालिया निगाह से देखते हैं, जिनका स्त्री के पास कोई जवाब नहीं होता है।

लेखन कहीं भी कभी भी...
एक स्त्री को लिखने के लिए अलग से वक्त नहीं मिलता। उसे पति, बच्चों और परिवार को भी देखना होता है। कभी स्कूल जाते वक्त ऑटो में तो कभी दुकान पर या कभी घर जाते वक्त रास्ते में ज्यादातर लेखन करना पड़ता है। हमारे लिए ऐसा नहीं है कि घर में कोई कोना हो, जहां इत्मीनान से लिखा जा सके। किसी के कपड़े धोने हैं तो किसी को खाना देना है और किसी को तैयार करके स्कूल भेजना है। उस पर से मंचीय कवियित्रियों की वजह से हर कोई तंज कसने के लिए तैयार रहता। लोग मुस्कुराकर कहते ...अच्छा तो आप कविताएं लिखती हैं। तब तो आपके बड़े-बड़े लोगों से संपर्क होंगे। जबकि, डिजिटल दौर में संपादकों या लोगों से मिले बिना ही मेरी रचनाएं छपीं। कुछ लोग पति से कहते भौजी कहीं मंच पर तो दिखती नहीं। ई कौन सी कविता है। ऊ फेसबुकवा पर ई का बवाल लिखती रहती हैं... जैसे एक स्त्री का सोशल मीडिया पर लिखना गुनाह हो गया। एक बार अखबार में मेरी कविता पढ़कर कुछ लोग मेरे घर चले आए। मेरे ससुर जी से पूछताछ करने लगे। घरवालों को भी बेहद अजीब लगा। बस मेरे मन में कविता लिखने के प्रति विरक्ति सी हो गई।...यहीं से कहानी लिखने का सिलसिला चल पड़ा।

मधुबनी पेंटिंग्स।
मधुबनी पेंटिंग्स।

कहानी 'बलमा जी का स्टूडियो' हिट हो गई
2016 में मैंने अपनी पहली कहानी बलमा जी का स्टूडियो हंस में छपने के लिए भेजी। मगर, हंस के संपादक को इसमें इस्तेमाल भोजपुरी शब्दों से आपत्ति थी। वे इसे हटाने पर अड़े थे। मगर, मुझे लगा कि इन शब्दों को हटा दिया तो कहानी का कोई मतलब नहीं रह जाएगा। करीब साल भर इस पर कशमकश चलती रही। इस बीच, 16 दिसंबर, 2016 को एक वरिष्ठ कथाकार ने फेसबुक पोस्ट पर इंद्रपस्थ भारती की वार्षिकी निकालने की घोषणा की। वह तब इसकी संपादक थीं। उन्होंने रचनाएं भेजने के लिए आमंत्रित किया। मैंने डरते-डरते उन्हें अपनी कहानी भेज दी। 24 घंटे बाद ही उन्होंने फेसबुक पर एलान किया कि बहुत दिनों बाद हिंदी में एक अच्छी कहानी पढ़ने को मिली। इसे वार्षिकी में छापा जाएगा। यह कहानी इंद्रप्रस्थ भारती में छपी। नाटय रुपांतर किया गया। 2018 में बलमा जी का स्टूडियो नाम से ही मेरा पहला कहानी संग्रह छपा। यह कहानी बेहद हिट रही। लोगों ने इसे सिर आंखों पर लिया। इसी साल मुझे इस कहानी संग्रह के लिए उत्तर प्रदेश का प्रतिष्ठित यशपाल सम्मान मिला। अभी मेरा एक कहानी संग्रह प्रेस में है। सुनो कबीर मेरा पहला उपन्यास आ रहा है। ऑनलाइन उपन्यास सात किवाड़ों पार भी आ रहा है।

कहानी संग्रह बलमा जी का स्टूडियो काफी चर्चित रही।
कहानी संग्रह बलमा जी का स्टूडियो काफी चर्चित रही।

मां से मिली रंग और रेखाओं की पहचान
मैं डिजिटल चित्र बनाती हूं, क्योंकि स्थानीय स्तर पर रंग और कैनवास की उपलब्धता बहुत कम हो पाती है। मां से ही मुझे कला, संगीत और ऐसे लेखन के लिए प्रेरणा मिली। मेरी सभी बहनों पर उनका प्रभाव है। कुछ कपड़ों पर भी मैंने चित्र बनाए हैं। मेरी मां को आज भी अफसोस है कि अगर मौका मिला होता तो वह जरूर कोई बड़ी चित्रकार होतीं। उनके पास अनुभव का अपार सागर है और उसे किस्सागोई अंदाज में बयां करने का सलीका भी। मेरी मां को आज भी पुराने गीतों, किस्सों और कहावतों के बारे में याद है और जब तब इसे सुनाती रहती हैं।

सोनी पाण्डेय की मां तारा त्रिपाठी, जो रहीं प्रेरणास्रोत।
सोनी पाण्डेय की मां तारा त्रिपाठी, जो रहीं प्रेरणास्रोत।

चाहती हूं राहुल सांकृत्यायन हो जाऊं
आजमगढ़ में जन्मे आधुनिक हिंदी साहित्य के महापंडित राहुल सांकृत्यायन के चर्चित शब्द थे ‘सैर कर दुनिया की गाफिल, जिंदगानी फिर कहां? जिंदगी गर कुछ रही, तो नौजवानी फिर कहां’। दुनिया को घुमक्कड़ी का संदेश देने वाले राहुल जी की तरह ही मैं भी बनना चाहती हूं। किताबों की गलियों और कहानियों की दुनिया में फिरना चाहती हूं। मैं भी चाहती हूं कि मरने के बाद लोग राहुल जी की तरह ही याद करें कि आजमगढ़ में महिला लेखन में कोई सोनी पाण्डेय भी थी।

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