ये मैं हूं:दुनिया की ताकतवर महिलाओं में शामिल बिहार की बेटी रेणु पासवान,G-100 की बनीं चेयरपर्सन

नई दिल्ली8 महीने पहलेलेखक: मरजिया जाफर

बिहार के मुजफ्फरपुर जिले की रेणु पासवान ने दुनियाभर में अपना डंका बजाया। कभी बाल विवाह की वजह से घर छोड़ने वाली लड़की आज पूरे विश्व में हजारों-लाखों महिलाओं की आवाज बन चुकी है। रेणु पासवान को हाल में ही G-100 ग्रुप का चेयरपर्सन बनाया गया। यह ग्रुप दुनियाभर की प्रभावशाली महिलाओं का संगठन है, जो महिला अधिकारों के लिए आवाज उठाता है।

वुमन भास्कर से बातचीत में, रेणु कहती हैं, मैं मदर टेरेसा, इंदिरा गांधी और सरोजनी नायडू की दूरदर्शन पर कहानियां देखकर बड़ी हुई। मेरा घर मुजफ्फरपुर जिले के छोटा गांव मिठनपुरा में है जो बहुत पिछड़ा था। पापा पढ़े-लिखे थे जिससे उन्हें बैंक में नौकरी मिल गई। इसके बाद हम गांव छोड़ शहर में आकर रहने लगे। हमारी स्कूलिंग अच्छी हुई। मेरे जिद्दी मिजाज ने मुझे आज इस लायक बना दिया जिससे मैं अपने विचारों को मंच देने में कामयाब हुई। मैं बिहार की पहली महिला हूं जिसे G-100 ग्रुप में शामिल किया गया है। मैंने जेंडर इक्वलिटी पर तीन किताबें लिखी हैं। इन किताबों ने मुझे इंटरनेशनल पहचान दिलाई।'

घर-समाज की तरफ से शादी का दबाव

घर-समाज के लोग कहते कि मैट्रिक कर लिया, अब शादी नहीं तो और क्या करोगी। लेकिन मैं जिंदगी जीना चाहती थी। मेरे पापा मेरी शादी जल्द करना चाहते थे। इसलिए उन्होंने मैट्रिक पास करते ही मेरी शादी तय कर दी, मुझे ये मंजूर नहीं था। मैंने शादी से इनकार कर दिया। मेरे फैसले से परिवार वाले नाराज हो गए। लेकिन बाद में मुझे कुछ लड़के समझ में आए कि इनसे शादी कर सकती हूं। लेकिन उन्होंने मुझे यह कहकर रिजेक्ट कर दिया कि मेरे हाथों में 6 उंगलियां हैं। मैं काली हूं। साथ ही मेरे भाई भी दिव्यांग है।

पढ़ाई में मां बनीं ढाल

पापा डॉक्टर बनाना चाहते थे लेकिन मेरा इंटरेस्ट कहीं और था। अपने लक्ष्य से कभी नहीं भटकी। समुदाय की सोच के खिलाफ जाने पर नाते-रिश्तेदारों के ताने भी सुने, लेकिन पढ़ाई जारी रखी। बेंगलुरु से बायोटेक्नोलॉजी में ग्रेजुएशन किया। 2008 में पुणे से एमबीए किया। इस दौरान लंबा संघर्ष किया। इंफोसिस में प्लेसमेंट हुआ और दस साल नौकरी की। आज मैं जो भी हूं मां की वजह से हूं। अब वो दुनिया में नहीं हैं।

बिहारी होने पर लोगों ने किया अपमान

जब मैं आगे की पढ़ाई के लिए बेंगलुरु गई तो होस्टल में रूममेट मुझसे अछूत जैसा बर्ताव करते थे। मुझे इग्नोर करते थे। मैं ट्रेन में बिहारियों के साथ पुलिस और अन्य यात्रियों का बर्ताव देखकर हैरान रह जाती। यह सब मुझे बहुत परेशान करता।

‘शी द चेंज’ का टाइटल मिला

साल 2018-19 के बीच जेंडर समानता पर लिखी मेरी तीन किताबें आईं, जिसके बाद इंटरनेशनल लेवल पर पहचान मिली। इन किताबों में मैंने अपने संघर्ष को भी उजागर किया है। कैसे जब दूसरे राज्य में गई तो ट्रेन की सीट के नीचे और टॉयलेट के पास सोना पड़ा। लोगों ने कहा कि वंचित समुदाय का टाइटल चेंज कर लो। मगर मैंने कहा-टाइटल नहीं बदलूंगी और न ही खुद को। बस पहचान बदलूंगी ताकि हमारा समाज बदले। मेरी इसी जिद की वजह से ग्लोबल स्तर पर यूएन की तरफ से साल 2020 में ‘शी द चेंज’ का टाइटल मिला।

इन किताबों ने दिलाया सम्मान

  • “द न्यू यू”
  • सस्टेनेबल डेवलपमेंट
  • लाइव टू इंस्पायर

देश-विदेश में मिले सम्मान

मुझे राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई अवार्ड मिले

  • “मोस्ट इनफ्लुएंसर वुमन”
  • “शी द चेंज”डब्ल्यूईएफ लंदन में
  • “आईकॉनिक वुमन ऑफ द ईयर” ब्लिंकविंक न की तरफ से
  • इंडियाज अचीवर्स "वुमन ऑफ द सस्टेनेबल"

क्या है G-100

G-100 एक इंटरनेशनल प्लेटफॉर्म है, जो महिलाओं के सशक्तिकरण पर काम करता है। इसमें अलग-अलग क्षेत्र से जुड़ी 135 देशों की महिला लीडर हैं, जो अलग-अलग देशों की महिलाओं के लिए मिलकर काम करती है। इस संगठन से 10 लाख से ज्यादा महिलाएं जुड़ी हैं।

महिलाओं के लिए कर रही है काम

जी-100 से हर क्षेत्र से अलग-अलग सशक्त महिलाएं जुड़ी हैं, जिसका फायदा समाज के हर तबके की महिलाओं को मिल रहा है। इसमें मैं जेंडर एडवोकेट के तौर पर काम कर रही हैं। लैंगिक असमानता की शिकार महिलाओं को आगे बढ़ने में सहयोग भी कर रही हैं। मैं अपना खुद का एक प्लेटफार्म “द वॉयस फॉर नो वॉयसेस” चला रही हूं।

राजनीति में जाने की इच्छा

मेरे अकेले की बस का नहीं है कि मैं बदलाव ला सकूं लेकिन कोशिश पूरी करती हूं। इसलिए मैं पॉलिटिक्स ज्वाइन करके सिस्टम में आकर सिस्टम बदलना चाहती हूं। महिला सुरक्षा पर काम करना चाहती हूं। अपने बिहार को ऐसा बनाना चाहती हूं जिससे देश की सेवा कर रहे ऊंचे पदों पर बैठे बिहारी मेरी तरह घर वापसी करें और बिहार को एक सशक्त प्रदेश बनाएं जिससे भविष्य में कोई भी बिहारी अपमानित न हो।