साइकोलॉजिस्ट की जिंदगी:क्लाइंट्स का दर्द हमें भी कर देता है डिप्रेस्ड और बाहर निकलने में एक्सरसाइज करती है मदद

2 महीने पहलेलेखक: मीना

‘हो सकता है आपके दिन की शुरुआत हंसते-खेलते चेहरे, डायनिंग टेबल पर सजे हरे भरे फल और गर्म चाय की चुस्कियों के साथ होती हो, लेकिन मुझे लगता है कि दुनिया में शायद तीन ही प्रोफेशन ऐसे हैं जिनके दिन की शुरुआत ‘दुख’ और शिकायतों के साथ होती है। पुलिस, डॉक्टर और मैं। डिप्रेशन, एंग्जायटी, मन की उलझी गांठें, किसी के लिए ऊब या परेशानी का सबब हो सकती हैं पर मेरे लिए उत्सुकता है। क्लाइंट्स से जुड़ने की उम्मीद है। उन्हें सुनती, देखती हूं, महसूस करती हूं और कुछ समय के लिए उनकी हो जाती हूं। तब किसी की उलझनें और परेशानियां समझ पाती हूं।’ इन शब्दों से आप समझ ही गए होंगे कि यहां बात किसी साइकोलॉजिस्ट की हो रही है और वे हैं काउंसलिंग साइकोलॉजिस्ट डॉ. अंजुमन बेंस।

टोक्यो ओलंपिक्स में सिल्वर मेडल हासिल करने वाली मीरा बाई चानू के साथ डॉ. अंजुमन बेंस
टोक्यो ओलंपिक्स में सिल्वर मेडल हासिल करने वाली मीरा बाई चानू के साथ डॉ. अंजुमन बेंस

दिल्ली में पली-बढ़ी 31 साल की अंजुमन बेंस कहती हैं, ‘हर पेशे की अपनी अच्छाइयां और खूबियां होती हैं। मुझे अपने काम से इतना प्यार है कि दसवीं क्लास में ही तभी तय कर लिया था कि साइकोलॉजिस्ट बनूंगी। हालांकि, घर में शुरूआती समय में किसी को समझ नहीं आ रहा था कि मैं इस प्रोफेशन में क्यों जा रही हूं? क्योंकि आज से 13-14 साल पहले इसे प्रोफेशन माना ही नहीं जाता था। डॉक्टर तो चीर-फाड़ करने वाले होते हैं, बिना दवा का कोई डॉक्टर थोड़े होता है। मुझे साइकोलॉजी ने अपनी ओर इतना खींचा कि आज इसमें पीएचडी कर ली है। यह सच है कि किसी को अगर चोट लगी है तो उस दर्द को ठीक करने के लिए पेन किलर खा लेंगे, कहीं कट गया है तो उस पर टाकें लगवा लेंगे, लेकिन मन का क्या, जो कई बार स्ट्रेस से दुखता है, मायूस होता है और रो पड़ता है। बस मैं इस मन को दुखी नहीं देखना चाहती थी और मदद करने की शुरुआत ‘संवेदना इंस्टीट्यूट फॉर स्पेशल चिल्ड्रन’ के साथ कर दी। यहां मैं जूनियर साइकोलॉजिस्ट बनी। जामिया से लेकर दिल्ली विश्वविद्यालाय के अलग-अलग कॉलेजों में गेस्ट फैकल्टी के तौर पर पढ़ाया। बाद में ‘संवेदना’ के साथ मिलकर ही फुल टाइम क्लाइंट्स लेने शुरू कर दिए।

दिन की शुरुआत नई सीख के साथ होती है
दिन की शुरुआत नई सीख के साथ होती है

क्लाइंट्स देते हैं रोज नई सीख
अभी तक जो किताबों में पढ़ा उसे आगे बच्चों को पढ़ाया था। जब क्लाइंट्स देखने शुरू किए तो खुद के लिए हर रोज नई लर्निंग रहीं। बहुत दूर नहीं जाऊंगी, अभी कोविड के ही उदाहरण देती हूं। 18-35 साल के यूथ के ऐसे फोन कॉल्स आए जिसमें वे कोविड से अपने प्रिय की जान जाने के बाद उनकी याद में डूब गए। रात-रात भर रोते रहे। नींद नहीं आई, बुरे सपने आए, खाना बंद कर दिया, किसी से मिलने की इच्छा नहीं जताई, सिर में दर्द और ऑफिस में काम करते-करते सीवियर पैनिक अटैक आने लगे। इस तरह की दिक्कतें जब रोज सुनते हैं, खुद भी परेशान होते हैं, लेकिन इनकी परेशानियों को सुलझा कर खुद भी जिंदगी को नए तरीके से जीने की सीख मिलती है।

अपनी भी मेंटल हेल्थ का ध्यान रखते हैं साइकोलॉजिस्ट
अपनी भी मेंटल हेल्थ का ध्यान रखते हैं साइकोलॉजिस्ट

काउंसलिंग करते-करते हम भी होते हैं परेशान
कई बार ऐसे केस आते हैं जिनको सुनने के बाद मुझे खुद रात भर नींद नहीं आती। मेरे घर में भी कोविड का साया पसरा तब लगा कि अभी तक मैं सबकी काउंसलिंग करती थी, लेकिन इस बार खुद परेशान होने लगी। दिन-रात काउंसलिंग करते-करते मेरा थायरॉयड बढ़ गया। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि मैं सिर्फ काम कर रही थी, खुद पर ध्यान नहीं दे रही थी। अब आप लोगों का भी सवाल होगा कि क्या साइकोलॉजिस्ट भी परेशान होते हैं? तो इसका जवाब है, हां। हम भी परेशान होते हैं। रोते हैं, गुस्सा करते हैं, झुंझलाते हैं, लेकिन परेशानियों का ज्वालामुखी फटने से पहले उसके साइन्स दिखने पर ही इलाज शुरू कर देते हैं। यही सलाह मैं अपने क्लाइंट्स को भी देती हूं। परेशानी बढ़ने से पहले उसे खत्म करने की कोशिश करें, आगे न बढ़ने दें।

माइंडफुल एक्टि्विटीज से खुद की करती हूं मदद
हर रोज लोगों की परेशानियां सुनने के बाद हमें भी डिटॉक्स होना पड़ता है। बहुत बार ऐसा भी होता है कि एक ही केस हफ्तों और महीनों तक चलता है। उनकी परेशानियों से हम भी जुड़ जाते हैं। पर पढ़ाई के दौरान डिटैचमेंट भी सीखा। जितने समय क्लाइंट के साथ उतनी देर के लिए उनके साथ होते हैं घर आते ही दिमाग को स्विच ऑफ कर लेते हैं। हां, करिअर की शुरुआत में डिप्रेशन के केसिस सुनकर बहुत परेशानी होती थी, लेकिन धीरे-धीरे इनसे बाहर निकलना सीख लिया। अब रोज सुबह एक्सरसाइज करती हूं। माइंडफुल एक्टिविटीज करती हूं। दिमाग में हमेशा एक पेन-कॉपी रखती हूं, जिसमें खुद से परेशानियों का हल ढूंढ़ती हूं और अब तो हस्बैंड है जिनके साथ शेयर कर लेती हूं।

‘पागलों’ का डॉक्टर बोलकर नकार दिया जाता है
अब तक कई संस्थाओं के साथ मिलकर काम कर चुकी हूं। कई एसोसिएशन के साथ जुड़ी। सीबीएससी के साथ बतौर एक्सपर्ट जुड़ी। यही नहीं टेड टॉक, जोश टॉक भी दे चुकी हूं। वेटलिफ्टिंग फेडरेशन ऑफ इंडिया के साथ जुड़कर ओलंपिक खिलाड़ियों को मेंटल हेल्थ प्रोवाइड करवाई। इन सबके अलावा सोशल मीडिया से मेंटल हेल्थ पर जानकारी शेयर करती रहती हूं। मेंटल हेल्थ के लिए काम करने वाले डॉक्टर्स को ‘पागलों’ का डॉक्टर बोलकर नकार दिया जाता है।
‘साइकोलॉजिस्ट खुलकर बोलने का मौका देते हैं’
कई बार तो क्लाइंट्स अपने ही परिवार से छुपकर हमसे बात करते हैं। हर वो व्यक्ति जो किसी कोने में छुपकर बात करता दिखे जरूर नहीं कि अपनी गर्लफ्रेंड या ब्वॉयफ्रेंड से बात कर रहा है, वो किसी साइकोलॉजिस्ट से भी बात करता हो सकता है। मनोविज्ञान छुपी हुई चीज नहीं बल्कि आपको खुलकर बोलने की आजादी देता है। एक ऐसी जगह देता है जहां आप खुलकर अपनी बात को रख पाते हैं और वहां आपको कोई जज करने वाला नहीं होता है। अब साइकोलॉजी को लेकर सोच धीरे-धीरे बदल रही है, उम्मीद है कि आगे की पीढ़ी मेंटल हेल्थ को और सीरियस ढंग से लेगी।

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