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ये मैं हूं:गहने और साड़ी में लिपटकर नहीं रहना था, दुनिया को ठेंगा दिखाकर किया अपने मन का काम और चित्रकारी में कमाया नाम

एक महीने पहलेलेखक: मीना

‘मैंने ऐसा कभी नहीं सोचा था कि मेरी शादी ऐसे घर में हो जहां बड़ी गाड़ी, बड़ी हवेली और खूब पैसे कमाने वाला जेंटलमैन हो। मेरे ऐसे ख्वाब कभी नहीं रहे कि मेरे पास महंगी साड़ी और उसके आंचल में लिपटकर घर की चारदीवारी में लिपटी रहूं और सासू मां की हर बुलाहट पर जा धमकूं। मुझे कुछ अलग करना था। अपनी पहचान बनानी थी और इसीलिए अपने जमाने की विद्रोही लड़की कहलाई।’ ये शब्द हैं फोटोग्राफी से चित्रकारी में अपना करिअर बनाने वाली अंजलि सिन्हा के।

अंजलि सिन्हा
अंजलि सिन्हा

भास्कर वुमन से बातचीत में अंजलि कहती हैं, ‘मैं शुरू से बिंदास, आबाद और आजाद ख्याल रही और यही मस्तमौलापन मेरे चित्रों में विषय की गंभीरता के साथ दिखता है। मैंने फोटग्राफी से अपना करिअर शुरू किया और अब चित्रकारी के रूप में वही हुनर निकलता है। मैं गर्ल चाइल्ड पर चित्र बनाती हूं। गांव की मिट्टी में चमकती, फूल-पत्ती में ढंकी लड़कियां मैंने कैनवास पर उतारीं। बेटियां मेरे दिल के नजदीक इसलिए रहीं क्योंकि बचपन से जिस तरह का रवैया उनके खिलाफ देखती आ रही थी तो चित्रों में अभिव्यक्ति खुद ही उकेरती गई।

‘शादी ही जरूरी नहीं है’

आज जब कहते हैं कि लड़कियों के लिए जमाना बहुत बदल गया है तब मैं यही जवाब देती हूं कि जमाना आपके आसपास बदला होगा पर उसका मतलब ये नहीं कि भ्रूण हत्या, घरेलू हिंसा या दहेज प्रथा खत्म हो गई है। लड़कियों के खिलाफ अत्याचार आज भी हो रहे हैं। दूसरा आज भी कोई बेटियों की आजादी की बात करता है तो चिढ़ के साथ बोलता है। यही वो समाज है जो लड़कियों की शादी को हर मर्ज का सेटलमेंट समझता है। ये वो सारे मुद्दे थे जिन्हें मैंने चित्रकारी के जरिए उठाया।

‘शादी को धत्ता बताकर सपनों के पंख पकड़े’

मैंने कभी सोचा नहीं था कि मुझे किसमें करिअर बनाना है। बस ये जानती थी कि घर में जीवन नहीं काटना है। पेरेंट्स ने पढ़ाया-लिखाया और मैंने उस पढ़ाई का फायदा उठाया। पटना यूनिवर्सिटी से बीएफए किया और पढ़ाई के दौरान ही मेरी शादी कर दी गई। यह शादी सक्सेसफुल नहीं रही। सपनों की उड़ान के लिए शादी को भी ठेंगा दिखाकर मैं आगे बढ़ गई।

‘लालू-रावड़ी के फोटोज उतार, खूब नाम कमाया’

मैंने फोटोग्राफी शुरू कर दी। आज से 18 साल पहले किसी लड़की का मुज्जफरपुर जैसे शहर में जींस-टॉप पहनना, चश्मा और टोपी लगाना, सभी के लिए कल्चरल शॉक देना था। पर मैं घबराई नहीं। बाहर निकली, खूब काम किया। यूथ हॉस्टल के साथ जुड़कर कैंप किए। उस समय के मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव और अनेक राजनेताओं से मुझे प्रोत्साहन मिला। क्योंकि उस समय फील्ड में मैं अकेली लड़की फोटोग्राफर थी। पॉलिटिकल कवरेज से फोटो जर्नलिस्ट के तौर पर मेरी पहचान होने लगी।

अंजलि को चित्रकारी की पहली प्रदर्शनी में ही मिली सफलता मिल गई।
अंजलि को चित्रकारी की पहली प्रदर्शनी में ही मिली सफलता मिल गई।

‘जब बिहार से दिल्ली आ गई’

राजस्थान के थार जैसे क्षेत्रों में जाकर फोटोग्राफी की और जहां तक मुझे याद है मैं बिहार और उसके आसपास के शहरों की पहली लड़की थी जिसने सोलो फोटोग्राफी की। जितने मन से फोटोग्राफी की उतने ही मन से पढ़ाई भी और अपनी यूनिवर्सिटी की सेकेंड टॉपर रही। बिहार में घुटन महसूस हो रही थी, इसलिए अपना बोरिया बिस्तर उठाया और दिल्ली आ गई।

‘पहली प्रदर्शनी रही सफल’

दिल्ली आकर कई अखबारों के साथ काम किया। फिर 2008 में मेरे ही दोस्त के साथ मेरी शादी हुई। बेटी होने के बाद जॉब छूट गई और फ्रीलांस फोटोग्राफी की। शुरू से जंगल, पहाड़ सब नापे आई थी, अब अचानक से घर बैठना पड़ा, तो खालीपन महसूस होने लगा। फिर मैंने फिर से अपना कैनवास उठाया। इसी बीच में मैं बोधगया में मैं इंटरनेशनल कैंप में गई जो आर्ट फोटोग्राफी के लिए ही था। गांव के मैचे-कुचैले दिखने वाले बच्चे भी कैमरे में इतने सुंदर उतरते हैं कि उन्हें देखते रहने का मन करता है। उन बच्चों को देख मेरा दिमाग चला कि क्यों न मैं इन फोटोज को ही कैनवास पर बनाऊं। उसी समय ललित कला अकादमी में मुझे एग्जीबिशन में मौका मिला। ये मेरा पहला एग्जीबिशन था और जम गया।

सपनों को पूरा करने के लिए दुनिया की नहीं सुनी।
सपनों को पूरा करने के लिए दुनिया की नहीं सुनी।

‘काम में दिखाई ईमानदारी और सम्मानों की लग गई लड़ी’

अपनी जिद और लगन से काम के साथ पूरी ईमानदारी की। उसी मेहनत का फल है कि मुझे यूथ हॉस्टल एसोसिएशन ऑफ इंडिया की तरफ से फोटोग्राफी में, एनडीएमसी की तरफ से ऑल इंडिया अवॉर्ड, बिहार सरकार की तरफ से फोटोग्राफी में अवॉर्ड, उत्तर प्रदेश फिल्म एसोसिएशन की तरफ से सम्मान और इस्कॉन सोसाइटी की तरफ से सम्मान भी मिल चुका है।

‘आज सभी के लिए आदर्श हूं’

महिलाएं खुद को किसी भी काम में पारंगत करें ताकि उन्हें काम मिल सके। जब वे आर्थिक रूप से स्वतंत्र होंगी तो अपने हिसाब से जिंदगी जी पाएंगी। कामकाजी महिलाओं को अलग केयर मिलती है। अगर वे कुछ नहीं करती हैं तो उन्हें बचपन से लेकर बुढापे तक दूसरों की धौंस ही सुननी पड़ती है। पहले जिन लोगों के लिए मैं बुरी थी आज उन्हीं के लिए आदर्श हूं।

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