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ये मैं हूं:डॉक्टर्स ने कह दिया था, ’मैं 6 महीने तक ही जिंदा रहूंगी, पर अब इस जानलेवा बीमारी के खिलाफ फैला रही जागरुकता’

2 महीने पहलेलेखक: मीना

‘मुझे बचपन से पढ़ने का बहुत शौक रहा। जब किताबों के बीच होती तो वे ही मेरी दुनिया होतीं। उन्हीं से दोस्ती, उन्हीं से प्यार। लेकिन बार-बार बुखार, सिर और पेट दर्द, चेहरे पर बटरफ्लाय जैसे रैशेज से मैं परेशान होने लगी। शुरुआत में इन सभी लक्षणों का इलाज कराया, लेकिन कुछ दिन ठीक रहती लेकिन बाद में फिर बीमार पड़ जाती।'

मां से कहती, ‘डॉक्टर ने जो दवाएं दी हैं, वो मुझे जल्दी खिला दो ताकि मेरा स्कूल मिस न हो जाए। ऐसी जिद मैं इसलिए करती, क्योंकि मैं बचपन से डॉक्टर बनना चाहती थी, लेकिन मुझे क्या मालूम था कि एक ऐसी बीमारी का शिकार हो जाऊंगी कि अस्पताल ही मेरा दूसरा घर बन जाएगा।' ये शब्द हैं मुंबई की लुपस सरवाइवर श्रद्धा पारेख के।

38 साल की श्रद्धा भास्कर वुमन से कहती हैं, ‘6 साल की उम्र से ही मुझे लुपस के लक्षण दिखाई देने लगे थे। मां-पापा इलाज के लिए अस्पताल दर अस्पताल दौड़ते लेकिन कहीं कोई फायदा नहीं हुआ। एक दिन अचानक मेरा बीपी हाई हो गया और पेट में बहुत दर्द होने लगा। आपाधापी में मुझे अस्पताल ले जाया गया और आखिरकार 9 साल की उम्र में ये मालूम हुआ कि मुझे लुपस है।'

जानलेवा बीमारी है लुपस

लुपस एक रेयर ऑटोइम्यून डिजीज है। यह बीमारी शरीर के हर पार्ट को प्रभावित करती है। लुपस के मरीज को कभी भी कुछ भी हो सकता है। इसके मरीजों की किडनी के इश्यू ज्यादा होते हैं, लेकिन मेरे केस में मेरे पूरे मेन पार्ट्स में प्रॉब्लम हो गई थी।

डॉक्टर्स ने कह दिया-‘मैं 6 महीने तक ही जिंदा रहूंगी’

इलाज के दौरान ही डॉक्टर्स ने कह दिया था कि मेरी जिंदगी 6 महीने की ही है। ये सुनने के बाद पेरेंट्स और मैं दोनों सुन्न थे। हमें समझ नहीं आ रहा था कि आखिर ये सब क्या हो गया है। मेरे शरीर में खून जैसे पानी हो गया था।

शरीर का वजन बढ़ा, साथ में लोगों के ताने

मुझे दवाओं के इतने हैवी डोज दिए जाते कि मेरा वजन बहुत बढ़ गया। घर से कहीं बाहर जाती तो लोगों के लिए अजूबा होती। जैसे जू में कोई नया जानवर आया हो। स्कूल जाना बंद हो गया था क्योंकि हड्डियां कमजोर होने लगी थीं। अगर कोई जोर से हाथ भी पकड़े लेता तो अंदर ब्लीडिंग चालू हो जाती। हड्डियां अचानक टूटने लगतीं। चेहरे पर बटरफ्लाय जैसे रैशेज होने लगते।

पेरेंट्स ने सिखाया जीना

यही वो वक्त था जब मेरे पेरेंट्स ने मुझे समझाया था कि मुझे लुपस बीमारी है। बाहर लोग तुम्हें कुछ भी बोलें उनकी बात पर भरोसा मत करना। जो बीमारी तुम्हें उसे स्वीकार करो और तुम्हें हर मोमेंट जीना है। घर वाले सब इस टेंशन में थे कि मुझे जानलेवा बीमारी है और मैं इसलिए परेशान रहती कि मेरा स्कूल छूट गया। अब मैं बाहर कहीं खेलने नहीं जा पा रही थी। लेकिन जब कभी बाहर निकलती तो लोग मेरा मजाक उड़ाते। तब मैं खुद ही घर में सिमट गई। ये तो शुक्र है भगवान का कि मेरे पेरेंट्स और छोटी बहन हमेशा साथ रहे। तब मैं मेंटली स्टेबल हो पाई। वरना कितने पेरेंट्स अपने बीमार बच्चे को छोड़ देते हैं और उसकी कोई कद्र नहीं करता।

इलाज के लिए घर बेचना पड़ा

मेरा इलाज कराते-कराते घर की आर्थिक हालत इतनी खराब हो गई थी कि घर तक बेचना पड़ा। एक समय में मेरी तबियत इतनी बिगड़ी कि एक महीने तक बिस्कुट और 1 गिलास पानी पर जिंदा रहना पड़ा। इसी बीमारी के साथ जैसे-जैसे मैं पलती होती गई, तबीयत उतनी बिगड़ती गई। दो बार किडनी बायोप्सी हुई। पैरालाइजिज अटैक, 3 बार पैरों का ऑपरेशन और हड्डियां कमजोर होने की वजह से 100 से ज्यादा बार प्लास्टर हुआ। कीमोथेरेपी भी हुई। ये फिजिकल पेन मैं झेल सकती थी, लेकिन लोगों का जजमेंट नहीं।

मुझे ऐसे कमेंट सुनने को मिलते कि तुम किसी काम के लायक नहीं हो? तुम दिखने में बहुत मोटी हो, तुम्हें कोई नौकरी नहीं देगा। तू अपने पेरेंट्स के लिए बोझ है, तुझे तो डॉक्टर्स ने 6 महीने जीने के लिए कहा था, उससे ज्यादा कैसे जिंदा रह गई?

मौत से लड़ी फिर की पढ़ाई

ये सब ताने सुनने के बाद मैंने भी ठान लिया कि जब तक जिंदा हूं तब तक ऐसे रो-धोकर जिंदा नहीं रहना है। कुछ करके जाना है। तब मैंने अपनी सारी पढ़ाई घर बैठकर की। बीकॉम खत्म किया। कंप्यूटर कोर्स किए और एक नौकरी ली।

नौकरी के लिए पेरेंट्स ने इजाजत नहीं दी, तब मैंने जिद ठान ली कि नौकरी करूंगी। मुझसे पेरेंट्स की परेशानी देखी नहीं जा रही थीं। 20 साल इस बीमारी में निकालने के बाद डॉक्टर्न ने कह दिया कि अब तुम लुपस से बाहर आ सकती हो। अब मुझे लोग मिरिकल चाइल्ड भी कहते हैं।

अब खुद से प्यार करती हूं

मैं अब हेल्दी हूं लेकिन लोग फिर भी मेरी मोटी बॉडी को देखकर मजाक बनाते हैं, लेकिन अब मैं खुद से प्यार करना जानती हूं। तीन साल पहले ही मैं अपने पेरेंट्स को खो चुकी हूं। अपनी बहन के साथ किराए के घर में रहती हूं। साथ ही एचआर का काम करती हूं। मैं आध्यात्म में भी विश्वास करती हूं। न्यूमेरोलोजिस्ट हूं और सेल्फ लव कोच हूं।

लुपस पर फैलाती हूं जागरुकता

लुपस के बारे में जागरुकता फैलान के लिए मैंने अपना खुद का यूट्यूब चैनल शुरू किया है, जिसका नाम अनोखी की दुनिया है। मेरा एक ही उद्देश्य है कि लोग ज्यादा से ज्यादा लुपस के बारे में जानें और खुद से प्यार करना सीखें। परिस्थितियां कितनी ही मुश्किल क्यों न हों, पर उनसे हार न मानें। मेरा सपना है कि मैं अपना खुद का घर खरीदूं और फाइनेंशियली इतनी मजबूत हो जाऊं कि दूसरों की भी मदद कर पाऊं। मैं यह भी कहना चाहूंगी आप खुद में बहुत खूबसूरत हैं, ऐसा खुद से रोज कहें। दूसरो की तारीफ का इंतजार न करें।