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सक्सेस मंत्र:जूलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया की पहली वुमन डायरेक्टर डॉ. धृति बनर्जी कहती हैं, पढ़ाई काम आती है, मेहनत रंग लाती है

19 दिन पहलेलेखक: मीना
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उत्तर के हिमालय की ठंडी हवाएं, दक्षिण के हरे भरे जंगल, वेस्ट की रेतीली जमीन और ईस्ट के मैंग्रोव वन तक ये खबर फैल गई है कि बायोडायवर्सिटी के हॉटस्पॉट को संजोने वाली 105 साल पुरानी संस्था 'जूलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया' (जेडएसआई) में कोई महिला पहली बार डायरेक्टर बनी है। और वो नाम है डॉ. धृति बनर्जी। पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के तहत जीव जंतु जैव विविधता और संरक्षण पर रिसर्च करने वाली इस संस्था की दीवारें अब खुशी के रंग से और लबालब हो गईं हैं। बंगाली मानुष धृति बनर्जी ने ये कमाल कैसे कर दिखाया, पढ़िए उनकी कहानी जुबानी। 'शाम का वक्त था। ऑफिस से घर आ रही थी। कालीघाट मंदिर के पास पहुंची तो कॉल आया। ‘मैडम योअर ऑर्डर हैज बीन अपलोडेड इन दि डीओपीटी वेबसाइट। एंड वी हैव सेंट यू इन वॉट्सऐप।’ वॉट्सऐप नोटिफिकेशन चेक किया। मैं कार से उतरी और मंदिर में गई। खुशी से रोने लगी। भगवान को प्रणाम किया। जल्दी घर पहुंची बेटी और पति को सबसे पहले खुशखबरी दी कि मैं जेडएसआई की डायरेक्टर बन गई हूं।'

डॉ. धृति बनर्जी
डॉ. धृति बनर्जी

कलकत्ता की रहने वाली और 51 साल की डॉ. धृति बनर्जी भास्कर वुमन से बातचीत में कहती हैं, टॉप पर पहुंचने के लिए काम के प्रति गंभीरता, लोगों का सपोर्ट, काम की नॉलेज और ऐसे लोगों का सपोर्ट जो आपके कॉन्फीडेंस बूस्टर हों, उनका होना जरूरी है। निदेशक बनने की दौड़ में ये नहीं सोचा था कि मैं पहली महिला डायरेक्टर बन रही हूं या दूसरी। बस काम पर ध्यान रहा। मैं हमेशा से बहुत पढ़ाकू और काम करने वाली लड़की रही। 1991 में प्रेसीडेंसी कॉलेज से जूलॉजी में ग्रेजुएशन किया। बाद में एमएसी और पीएचडी की। फिर 1998 में जूलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया जॉइन किया। मेरी शुरुआत जूनियर साइंटिस्ट से हुई, तब उम्र 28 थी। जल्द ही सीनियर साइंटिस्ट बन गई।

जेडएसआई में काम की विविधता ने टॉप पर पहुंचाया
मैं पढ़ती बहुत हूं। बहुत से रिसर्च पेपर पब्लिश हो चुके हैं। जेडएसआई में रहते हुए रिसर्च का काम किया, साथ ही एडमिनिस्ट्रेशन का काम भी संभाला। जेडएसआई की इंफोर्मेशन को डिजिटलाइज्ड करने का काम किया और करीब पांच साल फाइनेंस का डिपार्टमेंट भी देखा। भारत में जितने प्राणी, पक्षी, कीट, पतंग हैं और किस पक्षी का क्या डीएनए है, सभी की इंफोर्मेशन को डिजिटलाइज्ड करने का काम किया। इन डिपोर्टमेंट्स को हेड करने के बाद डायरेक्टर बनने की कोई शंका बची ही नहीं थी। यहां तक पहुंचने के लिए मैंने लीडरशिप कोचिस की भी मदद ली।
जिस दिन मुझे डायरेक्टर की पोस्ट के लिए इंटरव्यू देने जाना था, उस दिन मेरी 17 साल की बेटी रोइनी ने एक नोट लिखकर दिया, ‘मां, यू शुड फाइट फॉर इट, सिंस यू आर दि बेस्ट।’ ये शब्द मेरे लिए इमोशनल सपोर्ट और प्रोत्साहन बने। मेरे करिअर की शुरुआत जेडएसआई से हुई तो यहां के काम की बेहतर समझ मुझे हो गई। मैं बहुत भाग्यशाली हूं कि मुझे बहुत अच्छे सीनियर्स, बॉसिस और डायरेक्टर्स मिले। इन सभी ने मुझे बहुत सिखाया। जिस दिन डायरेक्टर बनी उस दिन सभी इतने खुश हुए कि मुझे गले लगाकर रोने लगे। काम में सिंसेयर, ईमानदार, बात को सुनने व समझने वाली लड़की रही, इसलिए सभी का प्यार मिला। अब जूनियर्स भी बहुत अच्छे मिले हैं।

...इतना भी आसान नहीं था टॉप पर पहुंचना
मुझे लगता है कि किसी महिला का इतने टॉप पर पहुंचना बहुत आसान नहीं है। उसे घर और ऑफिस दोनों संभालने में दिक्कतें आती हैं। वर्किंग वुमन के लिए घर पर कोई ‘वाइफ’ नहीं होती, लेकिन हस्बैंड के लिए वाइफ है। मेरे पति, पिता-मां, बेटी का इतना सपोर्ट मिला, तब मैं यहां तक पहुंच पाई हूं। मेरी बेटी जब छोटी थी तब उसकी देखभाल मां ने की। पति डॉक्टर हैं तो बेटी कभी बीमार पड़ी तो मुझे ऑफिस से छुट्टी लेकर उसे डॉक्टर के पास ले जाने की जरूरत नहीं पड़ी क्योंकि घर में ही इलाज मिल जाता था। मम्मी-पापा बीमार पड़े तो उनकी भी देखभाल पति ने की। ससुराल में कभी ऐसा नहीं हुआ कि बर्तन, कपड़े, खाना मेरी प्राइमरी ड्यूटी बनें हों। इन सब कामों के लिए तो हम बाहर से भी हेल्प ले सकते हैं। मैं जॉइंट फैमिली में पैदा हुई तो हमेशा लोगों का गैंग मेरे आसपास रहा। कभी सर्वे पर जाना पड़ा तो काकी मां को फोन करके बता दिया कि बेटी का प्रोजेक्ट है पूरा करवा देना। इस तरह से सभी का सपोर्ट मिला। लोगों का ‘सपोर्ट टू वे ट्रैफिक’ है। यही वजह थी कि मैं नौकरी को इतने अच्छे से कर पाई।

नौकरी के अलावा जिंदगी
ऐसा नहीं है कि मैं हमेशा पढ़ाई या काम ही करती हूं। मेरा भी ‘मी टाइम’ होता है। मेरी सुबह की शुरूआत दो कप चाय के साथ होती है। रेडियो पर संगीत सुनती हूं। पति जब मेरे कमरे को देखते हैं तो कहते हैं, ‘क्या पान की दुकान बना रखी है (हा हा हा) ।‘ चटपटे खाने की शौकीन हूं। पुचका, चाट सब पसंद है। मेरी बेटी को चिकन चिली, पिज्जा, पास्ता, बिरयानी पसंद है, ये सब मैं बढ़िया तरीके से बना लेती हूं। जब भी वक्त मिलता है तो कुकिंग करती हूं। मैं बंगाली मिठाइयां गुलाब जामुन, मिष्टी दोई सब बना लेती हूं। एंटिक सिल्वर ज्वेलरी पसंद है। कपड़ों की बहुत शौकीन हूं। शनिवार, इतवार छुट्टी के दिनों में घूमने फिरने चले जाते हैं। अगर पूरी फैमिली घर में बैठ जाए तो लड़ाई करने लग जाते हैं, इसलिए बाहर ही निकल जाते हैं (हा हा हा)।

खुद को हमेशा करते रहें अपग्रेड
वर्किंग महिलाओं को खुद को हमेशा अपग्रेड करते रहना चाहिए। नई चीजें सीखते रहनी चाहिए। अपनी फिजिकल एपियरिंस के साथ-साथ इंटरनल इको सिस्टम पर भी ध्यान देना चाहिए। महिलाओं के लिए स्किल डेवलपमेंट बहुत जरूरी है क्योंकि मैं रिसर्चर रही तो हमेशा घर आकर एक घंटा पढ़ाई को दिया। अगर आप रिसर्च के काम में नहीं भी हैं तब भी पढ़ना-लिखना जारी रखना चाहिए। क्योंकि जब आप पढ़ते हैं तब तो उससे आपके बच्चे भी सीखते हैं। आप घर के फालतू झगड़ों से बच जाते हैं। मैंने ये भी देखा है कि जब आप घर जाकर पढ़ाई करते हो तो घर का माहौल बदल जाता है। कोई आपको डिस्टर्ब नहीं करता, सब कहते हैं अरे, अरे अभी पढ़ाई कर रही है, उसे डिस्टर्ब मत करो। महिलाओं के पास इतने सारे काम होते हैं, ऐसे में जरूरी नहीं है कि आप हमेशा ‘वन मैन आर्मी’ बनें। कुछ कामों के लिए प्रोफेशनल हेल्फ भी ले सकते हैं।

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