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गिरिजा देवी की क्लास ने बना दिया सिंगर:नगालैंड में नक्सलियों-सरकार में संघर्ष के दौरान शुरू किया रियाज, अब म्यूजिक की प्रोफेसर

नई दिल्ली22 दिन पहलेलेखक: दीप्ति मिश्रा

मैं डॉ. रीता देव, हिन्दुस्तानी शास्त्रीय गायिका हूं। लोगों ने मेरी सुरीली आवाज में ठुमरी, कजरी, दादरा, चैती, ख्याल, झूला और फाग सुने और उन पर झूमे हैं। इसलिए वे मुझे मेरे नाम से ज्यादा आवाज से पहचानते हैं। जब मैं मंच से सजनी छाई घटा घनघोर, कौन जतन से मैं पिया को मनाऊं...जैसे लोकगीत गाती हूं, तो ऑडिटोरियम तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठता है।

ये मेरा सौभाग्य है कि संगीत से मुझे पहचान मिली। लोगों ने मुझे खूब प्यार दिया, सम्मान दिया। फिलहाल, मैं आगरा कॉलेज के म्यूजिक डिपार्टमेंट की विभागाध्यक्ष के तौर पर संगीत के नगीनों को तराश रही हूं। पढ़िए, पद्म विभूषण से सम्मानित ठुमरी साम्राज्ञी गिरिजा देवी की शिष्या डॉ. रीता देव की कहानी, उन्हीं की जुबानी..

मैं असम के करीमगंज में जन्मीं। मेरे पिता फॉरेस्ट डिपार्टमेंट में थे। उनकी पोस्टिंग नगालैंड के दीमापुर में थी। इसलिए मेरा बचपन और शुरुआती पढ़ाई-लिखाई दीमापुर में ही हुई। संगीत की शिक्षा भी यहीं ली। साल 1997 से पहले नगालैंड में नागा गुटों और भारत सरकार के बीच संघर्ष चल रहा था। मुझे याद है- उस वक्त मेरी मां मुझे बाहर खेलने नहीं जाने देती थी। मैं स्कूल से लौटकर आती और उसके कुछ देर बाद ही मेरे संगीत के टीचर घर आ जाते। उनकी क्लास चलती। फिर होमवर्क और रियाज पर लग जाती।

मैं चार भाई-बहनों में तीसरे नंबर की हूं। उन्हीं दिनों मां को आंखों से संबंधित कुछ दिक्कत हो गई थी। किसी ने बताया कि असम के सिलचर में एक अच्छे डॉक्टर हैं। पापा इलाज के लिए मां को सिलचर लाए थे। सिलचर में उनकी नजर स्कूल जाते बच्चों पर पड़ी, जिनके पास स्कूल बैग के साथ-साथ म्यूजिक इंस्ट्रूमेंट भी थे। मैं बंगाली परिवार से आती हूं। मेरा परिवार संगीत प्रेमी रहा है। पापा नहीं चाहते थे कि मेरा संगीत छूटे। इसलिए पापा ने मेरा एडमिशन सिलचर कॉलेज में कराने का फैसला कर लिया।

ठुमरी साम्राज्ञी गिरिजा देवी के साथ गायिका डॉ. रीता देव। रीता देव ने पहले बनारस में और फिर कलकत्ता में रहकर गिरिजा देवी से तालीम ली।
ठुमरी साम्राज्ञी गिरिजा देवी के साथ गायिका डॉ. रीता देव। रीता देव ने पहले बनारस में और फिर कलकत्ता में रहकर गिरिजा देवी से तालीम ली।

पापा थे संगीत प्रेमी, संगीत की शिक्षा पर दिया विशेष ध्यान
मैंने साल 1986 में सिलचर कॉलेज से संगीत में संगीत में ग्रेजुएशन की पढ़ाई पूरी की। मैं हायर एजुकेशन भी म्यूजिक में ही करना चाहती थी। उस वक्त सबके हाथ में मोबाइल नहीं होता था और न ही हर घर में लैंडलाइन होता था। अखबार भी चार दिन बाद पहुंचता था। खैर देश के जितने भी बेस्ट म्यूजिक कॉलेज हैं, उन सबमें पापा ने मेरे एडमिशन की प्रक्रिया शुरू कर दी। सबसे पहले बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से मुझे इंटरव्यू के लिए बुलाया गया। मैंने बीएचयू में टेस्ट और इंटरव्यू दिया तो वहां मेरा एमए के लिए सलेक्शन हो गया।

साल 1988 में मेरी एमए की पढ़ाई पूरी हो गई। शादी के लिए रिश्ते आने शुरू हो गए, लेकिन मैं आगे पढ़ना चाहती थी। संगीत के जरिए अपनी पहचान बनाना चाहती थी। इसलिए मैंने बीएचयू में ही पीएचडी के लिए रजिस्ट्रेशन करा लिया। कई नामी-ग्रामी संगीतज्ञ हमारी क्लासेस लेने आया करते थे। उन्हीं दिनों गिरिजा देवी यानी 'अप्पा जी' कलकत्ता छोड़कर बनारस आ गईं। मेरे कॉलेज में उन्हें ठुमरी और दादरा की क्लास लेने के लिए बुलाया गया।

मैंने गुरु को नहीं, बल्कि मेरी गुरु मां ने मुझे ढूढ़ा
अप्पा जी सबसे कुछ न कुछ सुनाने को कहा। मैंने भी उन्हें एक ठुमरी सुनाई। बस उसी दिन से अप्पा जी का स्नेह मुझे मिलना शुरू हो गया। मैंने गुरु को नहीं, बल्कि मेरी गुरु मां ने मुझे ढूढ़ा था। पीएचडी खत्म कर बनारस घराने से जुड़ गई और अप्पा जी से तालीम लेने लगी। बाद में मैंने ग्वालियर घराने से भी तालीम ली। संगीत घराने में परंपरा होती है- जब गुरु को लगता है कि शिष्य अब पूरी तरह तैयार है, तब शिष्य का गंडा बंधन कराया जाता है। यानी कि शिष्य अब अकेले मंच पर जाकर परफॉर्म कर सकता है।

पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के साथ मंच पर गिरिजा देवी के साथ डॉ. रीता देव।(राइट साइड से)
पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के साथ मंच पर गिरिजा देवी के साथ डॉ. रीता देव।(राइट साइड से)

पीएचडी खत्म करते ही घराने की अनुमति लेकर एक स्कूल में संगीत सिखाने लगी, क्योंकि पापा सरकारी नौकरी में थे। चार बच्चों को पढ़ाना लिखाना। घर चलाना और मां का इलाज। परिवार बहुत ज्यादा संपन्न नहीं था। स्कूल में पढ़ाने के दौरान रियाज के लिए टाइम नहीं मिलता और मैं हर हाल में अपने संगीत को ही प्राथमिकता में रखना चाहती थी, क्योंकि संगीत मेरा जुनून है, मेरी जिंदगी है। उससे दूर रहना या उसे पीछे रखकर भला खुश कैसे रह सकती हूं।

साल 1997 मिली पसंद की जॉब और फिर शादी
साल 1991 मेरा गंडा बंधन हुआ। मैं रेडियो और दूरदर्शन पर गाने लगी। कभी-कभी कार्यक्रमों में गाती। अप्रैल, 1997 में मुझे उत्तर प्रदेश सरकार में संगीत प्रोफेसर के तौर पर जॉब मिल गई। मुझे पसंद की जॉब मिली थी, बड़े बच्चों को सिखाते-सिखाते मेरा भी रियाज हो जाता। दिसंबर, 1997 में मेरी शादी हो गई। मेरे पति सॉफ्टवेयर इंजीनियर है। शादी के बाद कुछ दिन संगीत, ससुराल और जॉब की धुन बिठाने में लगे।

साल 2000 के बाद मैंने एक के बाद कई सारे कार्यक्रमों में जान लगी। मौसिकी एक खोज और आराधना समेत संगीत पर आधारित कई सीरियल में काम किया। पूरे देश में कार्यक्रमों में बुलाया जाता है। मैं ऑल इंडिया रेडियो की ए ग्रेड आर्टिस्ट हूं। देश भर में मेरे कार्यक्रमों का दूरदर्शन व अन्य चैनलों पर लाइव होता है।

परिवार के सपोर्ट से मिली रफ्तार
आज मैं आगरा कॉलेज में म्यूजिक डिपार्टमेंट की हेड हूं। लगातार कार्यक्रम भी लगे रहते हैं। मेरा परिवार दिल्ली में रहता है। सफलता के इस सफर का पूरा श्रेय मेरे परिवार, पति और बच्चों को जाता है। वे कभी जुनून के बीच नहीं आए। उन्होंने मुझे मेरे सपनों की दिशा में बढ़ने के लिए रफ्तार दी। मेरा हर कदम पर सपोर्ट किया। पति ने घर और बच्चों को संभाला। बेटा दीपांशु अभी 20 साल का है और उसे संगीत में रुचि है। बेटा भी संगीत सीख रहा है।

डॉ. रीता देव ने मौसिकी एक खोज और आराधना समेत संगीत पर आधारित कई सीरियल में काम किया।
डॉ. रीता देव ने मौसिकी एक खोज और आराधना समेत संगीत पर आधारित कई सीरियल में काम किया।

ठुमरी साम्राज्ञी के अंतिम कार्यक्रम में उनके साथ दी प्रस्तुति
सितंबर, 2017 में ठुमरी फेस्टिवल था। अप्पा जी को हर बार बुलाया जाता और वे हर बार कहती कि इस बार नहीं गाऊंगी, लेकिन लोगों के प्यार को कभी ठुकराती नहीं थींं। साल 2017 में अप्पा जी ने मुझे कॉल किया कि इस बार मेरे साथ तुम गाओगी। मैंने कॉलेज के कुछ जरूरी काम का हवाला देकर मना किया तो अप्पा जी ने कहा कि देख लो, मेरा मन है कि तुम्ही गाओ मेरे साथ। अप्पा जी मुझे बहुत मानती थी, इसलिए मैंने एक मिनट सोचा और फिर उनके साथ गाने के लिए हां कर दी। अप्पा जी के साथ ठुमरी फेस्टिवल में प्रस्तुति दी। अक्टूबर 2017 में अप्पा जी दुनिया छोड़ गईं।

संगीत को मिले सम्मान
मैं सवाई गंधर्व भीमसेन महोत्सव पुणे, तानसेन समारोह ग्वालियर,बाबा अलाउद्दीन खान संगीत सम्मेलन मैहर, अब्दुल करीम खान म्यूजिक फेस्टिवल मिराज, उत्तरपाड़ा संगीत चकरा कोलकाता और ठुमरी फेस्टिवल समेत देश के सभी प्रसिद्ध म्यूजिक फेस्टिवल में प्रस्तुति दे चुकी हूं। मेरी आवाज और कला को पंडित ओमकारनाथ ठाकुर अवार्ड, संगीत रत्न और स्वर रत्न समेत कई सम्मान से नवाजा गया।

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