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दिमाग का इलाज दिल से:‘बुजुर्ग कहता है मैं प्रेग्नेंट’, महिला को मरने का शक, ऐसों को देखते हैं, लोग कहते हैं ‘पागलों’ का डॉक्टर

4 दिन पहलेलेखक: मीना
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जंजीरों में बंधी एक महिला। शायद इतने लंबे समय से बंधी थी कि उसके बालों में कभी कंघी नहीं हुई होगी और बाल बढ़कर पैरों तक पहुंच गए थे। नाखून काटे नहीं गए थे। चेहरा कई महीनों से धुला नहीं था। परिजनों से बात की तो मालूम हुआ कि उस महिला को शक की बीमारी थी। उसे डर रहता था कि सब उसे मार देंगे और बीमारी इस हद तक कि घर की दीवारों की ईंटें निकाल ली थीं। लैंटर में छेद कर दिए थे सिर्फ ये सुनने के लिए कि उनके बारे में बाहर क्या बातें हो रही हैं? कोई बचाने आता तो उसे इतना पीटतीं महिला जब तक थक न जाए तब तक रुकती नहीं। सीढ़ियों पर तेल डाल देती, ताकि सेल्फ डिफेंस किया जा सके। कोई किस तरह चाय पी रहा है, कैसे खड़ा है, इसमें भी उन्हें दिक्कत थी। अस्पताल में नौकरी शुरू करने पर ये पहला केस देखा जिसके बाद मैं कई रातें सो नहीं पाई। उस महिला की शक्ल बार-बार याद आ रही थी। ऐसा लग रहा था कि खून पानी हो गया है, लेकिन हम क्लिनिकल साइकॉलोजिस्ट के पास कई बार इतने गंभीर केस आते हैं कि वो टास्क बन जाते हैं। पर हम भी तय कर लेते हैं कि फलां व्यक्ति को एकदम ठीक करके ही भेजना है। ये बातें हैं दिल्ली में क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट डॉ. प्रज्ञा मलिक की।

डॉ. प्रज्ञा मलिक
डॉ. प्रज्ञा मलिक

भास्कर वुमन से बातचीत में प्रज्ञा कहती हैं, ‘कई बार ऐसे केस आते हैं जिन्हें देखकर बहुत दुख होता है कि ये लोग अपने आप में कितने परेशान होंगे। ऊपर से अगर इन्हें समय पर इलाज न मिले तो समाज में इनका मजाक बनाया जाता है। मोलेस्ट किया जाता है। महिलाओं के साथ रेप की घटनाएं घटती हैं। पागल घोषित किया जाता है। ऐसे मरीजों को अनाथ बना दिया जाता है।
जंजीर वाली उस महिला के बाद मेरे पास जो पहला केस आया वो एक 80 साल के बुजुर्ग का था। जो कहता था कि वो प्रेग्नेंट है। बच्चे को पालने के लिए पैसे चाहिए। मुझसे पैसा मांगता और पेट पर हाथ फेरता, जबकि आर्थिक रूप से संपन्न परिवार से था। ऐसे मरीजों से हम डरते नहीं बल्कि उन्हें जल्द से जल्द ठीक करके भेजते हैं। इस बुजुर्ग को मैंने ठीक किया। थेरेपी और दवाओं की मदद से वो तीन महीने में बिल्कुल ठीक हो गया। जब केसिस में ऐसी सफलताएं मिलती हैं तो काम करने का जुनून और बढ़ता है।
‘मुझे नहीं मालूम था कि साइकोलॉजी ‘पी’ से शुरू होता है’
साइकोलॉजी एक ऐसा पेशा है जहां आपकी सुबह की शुरुआत चाय की चुस्कियों के साथ नहीं दुख भरे फोन कॉल्स के साथ होती है। इस काम को वही व्यक्ति कर सकता है जिसमें लोगों की मदद करने का जुूनून हो। हालांकि, मैंने कभी नहीं सोचा था कि मैं क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट बनूंगी। मुझे तो ये भी नहीं मालूम था कि साइकोलॉजी पी से शुरू होती है।
ट्यूशन पढ़ाते हुए आया साइकोलॉजिस्ट बनने का आइडिया
जब कॉलेज में थी तब बच्चों को ट्यूशन पढ़ाती थी और उन बच्चों के साथ जितनी मेहनत करती उतना बेहतर परिणाम नहीं मिलता। मैं समझ नहीं पा रही थी कि वे पढ़ाया हुआ क्यों भूल जाते हैं, क्यों बहुत धीरे-धीरे सीखते हैं। यही वह समय था जब सेपरेशन, फैमिली में छोटी-छोटी बातों पर इशुज बन जाना जैसी परेशानियां देख रही थी। इन्हीं सवालों का जवाब लेने मैं 2013 में उत्तराखंड के हरिद्वार में देव संस्कृति विश्वविद्यालय में एमएसी इन साइकोलॉजी करने पहुंच गई। साइकोलॉजी मेरे लिए ऐसा काम साबित हुआ जहां मैं लोगों की सेवा भी कर सकती थी और अपने सवालों के जवाब भी ले सकती थी।

मध्यमवर्गीय परिवार में ही पली बढ़ी
मध्यमवर्गीय परिवार में ही पली बढ़ी

'पिता को खेतों में मेहनत करते देखा तो खुद में भी वही जज्बा आया'
साइकोलॉजी पढ़ने के शुरुआत के छह महीने बहुत स्ट्रगल वाले रहे। पूरे दिन लाइब्रेरी में और रात को वॉशरूम में रहती, क्योंकि मुझे लगता था कि सब मुझसे ज्यादा पढ़ रहे हैं। मैंने ये तय कर लिया था कि मुझे जिंदगी सिर्फ काटनी नहीं है, प्रोडक्टिव लाइफ बनानी है और दूसरों की मदद करनी है। बचपन से अपने पापा को खेतों में बहुत मेहनत करते देखा, मुझे भी उनके लिए कुछ अच्छा करना था।
'बचपन से थी बहादुर'
मुज्जफरनगर के छोटे से गांव भोपा से निकली और दिल्ली में आकर नौकरी की। ऐसा नहीं था कि नौकरी के दौरान ही बड़े-बड़े केस देखकर मैं बहादुर बनी, बचपन से लड़ाकू विमान थी। स्कूल और कॉलेज की पढ़ाई के दौरान ऐसी कई घटनाएं घटीं जिनका विरोध किया। अगर नहीं करती तो मैं यहां नहीं होती। घर से स्कूल की दूरी, रात को अकेले स्कूल से घर आना और इस बीच में छेड़छाड़, पीछा करना जैसी घटनाएं भी घटीं, पर मैं डरी नहीं। एक दिन तो एक लड़का जो पिछले 15 दिन से मेरा पीछा कर रहा था उसे चप्पलों से बाजार में मारा।
'प्रोफेशन ने मेंटली और फिजिकली स्ट्रांग बनाया'
स्कूल-कॉलेज के समय पर शारीरिक रूप से मजबूत बनी और जब दिल्ली में तुलसी हेल्थ केयर के साथ नौकरी की शुरुआत की तब मानसिक रूप से भी मजबूत बनी। काम के शुरू दिनों में कुछ समझ नहीं आता था कि क्या करें। कभी-कभी स्थितियां ये होती थीं कि होपलेस फील करती थी। केस देखती, घर आती, कपड़े धोती, गाना सुनती, खाना बनाती और किताबें पढ़ती। इस तरह अपने दिमाग को शांत करती।

पति के साथ डॉ. प्रज्ञा
पति के साथ डॉ. प्रज्ञा

'पेशेंट के साथ हमें पेशेंट नहीं बनना'
लोग साइकोलॉजिस्ट्स का पागलों का डॉक्टर बोलकर मजाक बनाते हैं। कई बार हम साइकोलॉजिस्ट भी मानसिक रूप से परेशान होते हैं। तब कोशिश करते हैं केस को अस्पताल में ही छोड़कर आएं। कई बार गर्म पानी के बर्तन को छूते हैं ताकि खुद को बता सकें कि हमारी सेंसिस काम कर रही हैं। डायरी लिखते हैं। अपनी हॉबी का काम करते हैं। डॉक्टर्स के साथ डिस्कशन करते हैं। कुछ ट्रिक्स पढ़ाई के दौरान सिखाई जाती हैं ताकि हम पेशेंट के साथ पेशेंट न बना जाएं। सबसे बड़ी बात काम को काम की तरह लेते हैं। इन सबके बीच में परिवार एक पिलर की तरह मेरे साथ खड़ा रहा। 2017 में एमफिल खत्म किया है। अभी माइंडफुल टीएमएस, न्यूरोकेयर में काम कर रही हूं।
'मुश्किल वक्त टल जाता है, इसलिए परेशान न हों'
काम की शुरुआत में परेशान होती थी, लेकिन जब कुछ महीनों की मेहनत के बाद पेशेंट ठीक होकर हंसता है तो संतुष्टि मिलती है। इसलिए मुझे लगता कि जिंदगी में टफ समय आता है, लेकिन वो हमेशा नहीं रहता। मुश्किल समय से बाहर निकलें और अपने लिए रास्ते बनाएं।

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