गीता पढ़ने वाली मुस्लिम लड़की, फोटोग्राफी बना जुनून:पिता मुख्य काजी, कहते- बुर्का मत ओढ़ो, ये जेल है

2 महीने पहलेलेखक: भाग्य श्री सिंह

'2 बच्चियों के बाद मेरे खानदान में जब सब बेटे की आस लगाए बैठे थे तब मेरा जन्म हुआ। अनचाही बेटी देखकर सबके मुंह उतर गए लेकिन मेरे अब्बू के लिए यह खुशी का मौका था। उन्होंने मेरी परवरिश में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी और मुझे बेहतर और आजाद इंसान बनाया। आज उन्हीं की वजह से मेरी अलग पहचान है।'

वुमन भास्कर से बातचीत में डॉ. कायनात काजी ने बताया कि उनके पिता ने उन्हें गीता की शिक्षा दी। शाही इमाम होने के बावजूद वो हमें बुर्के में नहीं रखते। अब्बू बुर्के को चलती फिरती जेल कहते। कायनात काजी फोटोग्राफर, ब्लॉगर, ट्रेवल राइटर, रिसर्चर और साहित्यकार हैं।

कायनात काजी के पिता ने तोहफे में उन्हें पहली पुस्तक दी - 'अमीर खुसरो की पहेलियां'।
कायनात काजी के पिता ने तोहफे में उन्हें पहली पुस्तक दी - 'अमीर खुसरो की पहेलियां'।

अनचाही बेटी थी मैं

मेरा जन्म फिरोजाबाद में हुई। तब यह शहर नहीं कस्बा था। मेरे पिता शाही इमाम थे। हम तीन बहनें थीं। 2 बहनों के बाद जब मेरा जन्म हुआ तो सबको बेटा होने की उम्मीद थी। लेकिन नियति को ऐसा मंजूर नहीं था। 9 साल बेटे के इंतजार के बाद भी मेरे घर मेरे रूप में बेटी हुई।

घर में शिक्षा को दिया जाता था महत्व

घर में हमेशा से पढ़ाई-लिखाई का अच्छा माहौल रहा। कहा जाता है कि काजियों के घर में कारिंदे (गुलाम) भी पढ़े लिखे होते हैं। इसलिए पढ़ाई मेरी अच्छी रही। हालांकि, मैं अनचाही बच्ची थी तो 5वीं कक्षा तक मेरी स्कूलिंग सरकारी स्कूल से हुई जिसमें अंग्रेजी नहीं पढ़ाई जाती थी।

पिता के साथ कायनात काजी के बचपन की तस्वीर।
पिता के साथ कायनात काजी के बचपन की तस्वीर।

6वीं कक्षा में कॉलेज में एडमिशन हुआ। वहां सोशियोलॉजी, इंग्लिश और मैथ जैसे सब्जेक्ट थे। हम पास आउट हो चुके सीनियर्स की किताबें मांगते थे और नोट्स बनाते थे।

फोटोग्राफी और अखबार का चस्का पिता से लगा

पापा को फोटोग्राफी का बहुत शौक था। वो कैमरे से जुड़ी सारी बारीकियां जैसे कैमरा, एंगल के बारे में हमें बारीकी से समझाते। मेरे मन में तभी से कैमरे के लिए प्यार पैदा हुआ। बाकी घरों में बच्चों में खिलौनों के लिए लड़ाई होती थी। लेकिन हम 3 बहनें अखबार के लिए लड़तीं। दोपहर में पिताजी हमें अखबार का एडिटोरियल कॉलम पढ़कर सुनाते। अम्मी कहतीं ये आदमी बिलकुल दीवाना है, बच्चों को चंपक और बाल साहित्य की जगह बड़े-बड़े कॉलमनिस्ट का ज्ञान पढ़ा रहा है।

बाकी लड़कियों से इतर कायनात कैमरे से जुड़ी एक्सेसरीज में पैसे खर्च करतीं।
बाकी लड़कियों से इतर कायनात कैमरे से जुड़ी एक्सेसरीज में पैसे खर्च करतीं।

गहने की जगह खरीदे लेंस

मेरे लिए पढ़ाई और आर्थिक रूप से मजबूत होना जरूरी था क्योंकि मैं जानती थी कि मैं अपने फैसले तभी ले पाउंगी जब मेरे हाथ में पैसे होंगे। मुझे सीखने की लगन थी इसलिए मैंने गहने की जगह कैमरे के लेंस खरीदे। शुरूआती कमाई से मैं 5 साल घूमी।

बचपन में लिखी कहानियां आकाशवाणी में हुईं प्रसारित

8वीं कक्षा में मैंने आर्ट साइड लिया। हम सब एक दूसरे से मशविरा लेकर कोई काम करते थे। ग्रेजुएशन में मैंने हिंदी लिटरेचर और सोशल साइंस लिया। मैं बचपन से ही कहानियां लिखती थी। मेरी बड़ी बहन के जरिए आकाशवाणी आगरा में मेरी कहानियां पहुंचीं और पसंद की गईं।

फिरोजाबाद से आकाशवाणी के लिए पहली बार आगरा का सफ़र

मैं 10वीं कक्षा में 13-14 साल की थी, जब पहली बार घर से आगरा आकाशवाणी के लिए निकली। मेरे पापा ने मुझे रोड मैप बनाकर दिया कि कैसे-कैसे पहुंचना है। मेरे पापा अपनी सारी सीख और शौक हम बच्चों के साथ शेयर करते थे और यात्रा से जुड़ी हर बात बताते।

भारतीय संस्कृति को प्रमोट करने के लिए कायनात काजी कई प्रोजेक्ट कर चुकी हैं।
भारतीय संस्कृति को प्रमोट करने के लिए कायनात काजी कई प्रोजेक्ट कर चुकी हैं।

पिता को कैंसर, खाया फेवरेट खाना, खूब सुने गाने

पिता जी ने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से इस्लामिक स्टडी में ग्रेजुएशन किया था। म्यूजिक और सिनेमा के अलावा अच्छा खाना पिता जी की जान थे। मैं जब 22 साल की थी तब उन्हें 4 स्टेज का कैंसर था। इस दौरान उन्होंने जिंदगी को भरपूर जिया। अपने मन का खाना खाया और सुरैया, नूरजहां , शमशाद बेगम के गाने चुन चुन कर सुने। उनके पास फिल्मों की सारी डिटेल्स होती। कहते ऊपर जा कर बस इस बात का मलाल रहेगा कि मेरा संगीत मेरे पास नहीं रहेगा।

कायनात खुद चुनेगी हमसफ़र

लोग अब्बू से कहते जिंदगी के आखिरी पड़ाव में लड़की के लिए सही जीवनसाथी खोज दो। पापा कहते कायनात पढ़ी लिखी समझदार है। मैं उस पर अपनी पसंद नहीं थोपूंगा, अपना शौहर वो खुद चुनेगी। मुझे हिम्मत, ईमानदारी, मेहनत और देशभक्ति पिता से विरासत में मिली। पिता ने आखिरी दिनों में कहा कि मैं मर रहा हूं इसका मतलब यह नहीं कि मैं मेरी बेटी को किसी के भी साथ बांध दूं। वो समझदार है, अपना अच्छा-बुरा खुद चुनेगी।

कायनात को जीवन जीने की कला काजी पिता ने गीता के जरिए सिखाई।
कायनात को जीवन जीने की कला काजी पिता ने गीता के जरिए सिखाई।

अंधविश्वास से टकराए मेरे अब्बू,
कायनात ने याद करते हुए बताया कि ये उस दौर की बात है जब परीक्षा में पास होने के लिए लड़कियां दरगाह पर मन्नत के धागे बांधती, पेन फुंकवाती, ताबीज बनवातीं उस समय मेरे पिता ने गीता के जरिए मुझे कर्म की शिक्षा दी। उन्होंने मेरे कमरे की दीवार पर गीता के उपदेशों का बड़ा सा पोस्टर लगाया था। मेरे राइटिंग पैड पर भी उन्होंने गीता का सार चिपकाया था।ताकि मैं जीवन में हमेशा गीता की शिक्षा को न भूलूं और उसे जीवन में उतारूं। मेरे पिता जी बड़ी बहन के लिए कॉस्मोपोलिटन और फैमिना जैसी मैगजीन मंगाते थे। वो काफी खुले विचार के थे।

समाज की नहीं की परवाह, बनाया अपना रास्ता

मैंने कभी समाज की परवाह नहीं की, अपने मन के कपड़े पहनने से लेकर करियर चुनने और मन की शादी करने तक, हर फैसला मेरा खुद का था। मेरे अब्बू ने हमेशा मेरा सपोर्ट किया। गीता के उपदेश मेरे जीवन का सार हैं। मेरे पिता जो मुख्य काजी थे, ने श्रीमद भगवत गीता के पोस्टर मेरे कमरे में लगाए थे।

बच्चे को सुलाने की कोशिश करतीं कायनात काज़ी।
बच्चे को सुलाने की कोशिश करतीं कायनात काज़ी।

जुनून के लिए नौकरी छोड़ी

मैं जॉब और पढ़ाई साथ कर रही थी। इसके बाद दिल्ली-एनसीआर आकर मास कॉम किया। यहीं से फोटोग्राफी का शौक जुनून बना। कॉर्पोरेट में काम करके समझ आया कि यह काम मेरे लिए नहीं बना है और मैंने नौकरी छोड़ दी। इसके बाद ओ पी शर्मा से मैंने फोटोग्राफी की छोटी-छोटी डिटेल्स सीखी। मैं लिखकर और फोटो के जरिए अपने एहसास व्यक्त करने लगी।

असम की मेखला चादोर साड़ी और रफ एंड टफ लुक में कायनात काजी।
असम की मेखला चादोर साड़ी और रफ एंड टफ लुक में कायनात काजी।

2 लाख किलोमीटर से ज्यादा लंबा सफर अकेले किया

मैं हमेशा सोचती थी कि जितने भी यात्री हुए हैं सारे पुरुष क्यों हैं, महिलाएं क्यों नहीं आगे आतीं। तभी ट्रेवलिंग ने दिल में जगह बनाई और मैंने घूमना शुरू किया। भूगोल की कक्षा में जहां मैप देख कर सबकी हालत खराबी होती, मैं सबके नक़्शे भरा करती थी। मैं पिछले कुछ सालों में भारत दर्शन की यात्रा के दो लाख किलोमीटर से भी ज्यादा लंबा सफर अकेले के दम पर तय कर चुकी हूं।

घुमक्कड़ी का शौक कायनात को पिता से विरासत में मिला।
घुमक्कड़ी का शौक कायनात को पिता से विरासत में मिला।

करियर को दिया शादी से ज्यादा महत्व

अभी मैं उत्तराखंड में कल्चर और आर्ट्स पढ़ा रही हूं। मैंने आर्किटेक्चर की पढ़ाई भी की। मेरे पति ने भी मुझे काफी सपोर्ट किया। मेरी जिंदगी के 20 साल संघर्ष से भरे रहे। जब मैं पलट कर देखती हूं तो क्लास की बाकी लड़कियां घर-गृहस्थी में बिजी हैं वहीं सिर्फ मैं ऐसी हूं जिसकी अपनी पहचान है। लड़कियों को लेकर हमेशा यह सोच होती है कि करियर बाद में और शादी पहले। लेकिन मेरे लिए करियर पहले था।

शादी अपनी मर्जी से की, टेंपल आर्किटेक्चर का कोर्स किया

मैंने अपनी मर्जी से शादी की। पति सिविल इंजीनियर हैं। वो बहुत सपोर्टिव थे, इसलिए ही मैंने उन्हें जीवन साथी चुना। कायनात ने हाल ही में टेंपल आर्किटेक्चर पर एक कोर्स किया ताकि भारतीय स्थापत्य कला को बेहतर तरीके से समझ सकें।

फोटोग्राफी के आलावा कायनात ने ब्लॉगिंग, ट्रेवलिंग के लिए भी अवार्ड जीते।
फोटोग्राफी के आलावा कायनात ने ब्लॉगिंग, ट्रेवलिंग के लिए भी अवार्ड जीते।

कायनात काजी की ​​​​​झोली में हैं कई अवार्ड

  • 2021 में स्पेशल अवार्डी प्राइड ऑफ नेशन एक्सीलेंस अवार्ड
  • 2021 में महिला अचीवर्स महिला शक्ति सम्मान
  • 2021 में सत्त्व आइकॉनिक वेलनेस अवार्ड
  • 2019 में पर्यटन रत्न सम्मान
  • 2017 में नारी शक्ति पुरस्कार
  • 2016 में मीडिया उत्कृष्टता पुरस्कार
  • 2016 में ICMEI (इंटरनेशनल चैंबर ऑफ मीडिया एंड एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री
  • 2016 में NAI (न्यूजपेपर एसोसिएशन ऑफ इंडिया) अवार्ड
  • 2016 में IJC (इंटरनेशनल जर्नलिज्म सेंटर) से फोटोग्राफी में नेशनल अचीवमेंट अवार्ड
  • एबीपी न्यूज़ द्वारा बेस्ट ब्लॉगर्स अवार्ड, 2015 में युवा पत्रकार पुरस्कार और 2014 में उत्कृष्टता पुरस्कार
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