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ये मैं हूं:10 रुपए के लिए कई बच्चों ने जहरीली खदान में काम के दौरान गंवाई जान, 11वीं में हूं, मगर इन्हें पहुंचाया स्कूल

6 दिन पहलेलेखक: संजय सिन्हा

खदानों में माइका चुनते बच्चे 10-15 रुपये के लिए अपनी जिंदगी दांव पर लगाते। माता-पिता के साथ ये भी माइका चुनते। ये सब देख कर दुख होता। जब बच्चों के पेरेंट्स से बात करती तो वो रोजी-रोटी का हवाला देते। मैंने हिम्मत नहीं हारी। जब भी समय मिलता, इन बच्चों को पढ़ाना शुरू किया। धीरे-धीरे उन्होंने माइका चुनना बंद कर दिया। आज ये बच्चे स्कूल जाते हैं। भास्कर वुमन से ये बातें शेयर की 19 साल की प्रीति मरांडी ने।

पेरेंट्स के पीछे-पीछे बच्चे भी खदान जाते

प्रीति कहती हैं मैं बिहार के जमुई जिला के चकाई रहिमा की रहनेवाली हूं। पिछले एक साल से इन बच्चों को पढ़ा रही हूं। पहले ये बच्चे स्कूल नहीं जाते थे। पास के ही खदानों में माइका चुनने जाते थे। इनके माता-पिता भी इसी काम में लगे थे, तो बच्चे भी पीछे-पीछे खदान पहुंच जाते।

पहले मना किया फिर तैयार हो गईं

मेरे गांव की हैं अनसो मरांडी। उनसे कहा तो साफ इन्कार कर दिया। कहा कि इन्हें पढ़ाने के लिए पैसे नहीं हैं। माइका चुनते हैं तो कुछ पैसे आ जाते हैं। लेकिन जब दूसरे बच्चे स्कूल जाने लगे तो वो भी तैयार हो गईं। आज उनके बच्चे भी स्कूल जा रहे हैं।

पेंसिल-कॉपी की चिंता न करें

इसी तरह ललिता हांसदा का परिवार है। उनके चार बच्चे हैं। पति गोवा में मजदूरी करता है। उनका भी वही जवाब था, पढ़ाने के लिए पैसे नहीं हैं। ढिबरी (माइका) से ही रोजी-रोटी चलती है। मैंने उन्हें समझाया कि कॉपी, किताब, पेंसिल की चिंता न करें। वो बस बच्चों को स्कूल भेजें। अब ये बच्चे गांव के ही नवीन प्राथमिक विद्यालय में आ रहे हैं। वहां राजेश सर हैं। मैं दोपहर 2 बजे से पांच बजे तक बच्चों को पढ़ाती हूं।

25 बच्चे माइका चुनना छोड़कर आ रहे स्कूल

मेरे इस काम में सेंटर डायरेक्ट, टीडीएच और दिशा बिहार का भी काफी सहयोग रहा। यह एक एनजीओ है जो ऐसे बच्चों को पढ़ाने-लिखाने में सहयोग करती है। आज 25 बच्चे माइका चुनना छोड़ कर स्कूल आ रहे हैं।

50-60 फीट तक गहरे होते हैं खदान

ये जो माइंस हैं वो इलीगल हैं। सरकार ने तो काफी पहले ही माइका निकालने पर बैन लगा दिया था। लेकिन इसके बाद भी लोग माइका निकालते हैं। गहरे गड्‌ढे खोद कर। कई बार तो ये 50-60 फीट से भी अधिक गहरे होते हैं। हमेशा इनके धंसने का डर होता है।

बच्चों की सेहत पर असर

माइका शीट बहुत शार्प होते हैं इनसे हाथ-पैर भी कट जाते हैं। साथ ही खदान के अंदर सांस लेने की भी समस्या होती है। ये बच्चों की सेहत के लिए ठीक नहीं है। इस बात को मैंने समझ लिया था। फिर मैं बच्चों और उनके पेरेंट्स को समझाने लगी।

सप्ताह में दो-ढाई हजार कमाता है एक परिवार

माइका निकालने में पूरा परिवार जुटता है। एक परिवार में पति-पत्नी और दो बच्चे हैं तो एक सप्ताह में वे 2.5 से तीन क्विंटल माइका चुन लेते हैं। कंपनियों के एजेंट प्रति क्विंटल 800 रुपये देते हैं। इस तरह ढाई हजार तक कमाई हो जाती है। यही कारण है कि मां-बाप बच्चों को भी माइका निकालने में लगा देते हैं।

कई बार हो चुकी हैं दुर्घटनाएं

चकाई से ही सटा है झारखंड का गिरिडीह जिला। इस जिले में बड़े स्तर पर अवैध तरीके से माइका निकाला जाता है जिसमें बच्चे भी शामिल रहते हैं। वहां तो कई बार खदानों में बच्चों के मरने की भी खबर आई। तब मैंने पेरेंट्स को समझाना शुरू किया कि कम से कम बच्चों को माइका चुनने के काम में न लगाएं।

कॉस्मेटिक्स में सबसे अधिक उपयोग

माइका का उपयोग सबसे अधिक कॉस्मेटिक्स में होता है। कई कंपनियां राजस्थान में हैं जिन्हें कॉस्मेटिक प्रोडक्ट के लिए माइका की जरूरत होती है। वहीं मोबाइल के टेंपर्ड ग्लास के लिए माइका का इस्तेमाल होता है।

खुद का उदाहरण दिया

मैंने उनसे कहा कि अभी इन बच्चों के पढ़ने का समय है। काम तो बाद में भी कर सकते हैं। मैंने खुद का उदाहरण उनके सामने रखा। उन्हें बताया कि मेरे अंदर पढ़ने की भूख थी, इसलिए यहां तक पढ़ पाई हूं। आगे भी पढ़ूंगी और टीचर बनूंगी।

खुद काफी संघर्ष किया है

मैंने खुद पढ़ने-लिखने के लिए काफी संघर्ष किया है। मेरे दो छोटे भाई हैं ऐरेनेस मरांडी और आशीष मरांडी। पापा किराना की दुकान चलाते हैं। यह घर चलाने के लिए काफी नहीं है। किसी तरह मैंने अब तक पढ़ाई की है।

टीचर बनना है

मैंने पिछले साल ही मैट्रिक की परीक्षा दी थी। इसमें मुझे 69 प्रतिशत मार्क्स आए। अभी चकाई के फाल्गुनी प्रसाद यादव कॉलेज में हूं और 11वीं कर रहीं हूं। मुझे टीचर के रूप में ही करिअर बनाना है। बच्चे पढ़ें-लिखें, अपने परिवार का सहारा बनें, गांव का नाम रौशन करें, यही सपना है। मैं हर लड़की से यही कहना चाहूंगी कि खूब पढ़ें। पढ़ेंगे तो जीवन में किसी चीज की कमी नहीं रहेगी।

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