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ये मैं हूं:28 सालों से स्कूलों के भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ रही हूं, एक महीने की सैलरी बच्चों के नाम करती हूं

10 दिन पहलेलेखक: मीना

‘बचपन से कहीं भी कुछ भी गलत होता देखती तो मेरी रगों में खून की जगह गुस्सा दौड़ने लगता। मैं भेदभाव के खिलाफ लड़ती। स्कूल-कॉलेज के दिनों से ही कई मंचों पर अपनी बात रखती रही। कम बोलने वाली और घर में सिमटने वाली लड़की नहीं बल्कि विद्रोही किस्म की थी। इसी विद्रोह ने मुझे सरकारी स्कूल की प्रिंसिपल बनाया और पिछले 28 सालों से निगम कार्यालयों में होने वाले भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ रही हूं। ये शब्द हैं दिल्ली के गांधी नगर में महिला कॉलोनी के एमसीडी प्राइमरी स्कूल में प्रिंसिपल विभा सिंह के।

गांधी नगर में महिला कॉलोनी के एमसीडी प्राइमरी स्कूल में प्रिंसिपल हैं विभा सिंह।
गांधी नगर में महिला कॉलोनी के एमसीडी प्राइमरी स्कूल में प्रिंसिपल हैं विभा सिंह।

58 साल की विभा वुमन भास्कर से बातचीत में कहती हैं, ‘मैंने बचपन से ये नहीं सोचा था कि मुझे टीचर बनना है। मुझे बस पढ़ना था और यह जानती थी कि पढ़ने से ही हम लड़कियों का उद्धार होगा। पढ़ने से मेरे दिमागी ज्ञान की भूख शांत होगी। मुझे अलग-अलग तरह की जानकारियां एकत्र करना, अच्छा लगता था और मेरे इसी शौक ने मुझे बीए, बीएड और एमए करने के लिए प्रेरित किया।
बचपन से था पढ़ने का शौक
मेरा जन्म बिहार में हुआ, लेकिन पिता जी की नौकरी बनारस में थी तो परवरिश यहीं हुई। बीए करने के बाद मेरी शादी करवा दी गई। अब मेरा पता बनारस से दिल्ली हो गया। संपन्न परिवार में आई। मुझे बीएड करना था लेकिन ससुराल वालों को लगा कि घर में सबकुछ तो है फिर मुझे नौकरी करने की जरूरत क्या है, लेकिन मैंने उन्हें अपनी पढ़ने के प्रति लालसा को बताया और वे लोग समझे भी। फिर मैंने बीएड किया और फिर एमए किया।
स्कूल में देखा की बिना पैसे के काम नहीं होता…
पढ़ाई करने के बाद 1993 में नगर निगम स्कूल में नौकरी मिल गई। जब एमसीडी में पढ़ाना शुरू किया तब देखा कि निगम कार्यालयों में हर छोटा काम बिना पैसों के नहीं होता।
एक छोटा सा मेडिकल बनाने के लिए भी पैसे मांगे जाते हैं। जॉइनिंग से लेकर दस्तावेजों तक में कमी-बढ़ी के लिए घूस मांगी जाती है। यह सब देखकर मेरा माथा ठनका और फिर मैंने प्रशासन को बताना शुरू किया कि ये भ्रष्टाचार नहीं चलेगा। मैंने हड़ताल की, आंदोलन किए, अनशन किए, कई दिन भूखी भी रही पर अपने स्कूल में बिना पैसों के काम को मान्यता दिलाई।

स्कूलों में होने वाले भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने के लिए तैयार की शिक्षकों की टीम।
स्कूलों में होने वाले भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने के लिए तैयार की शिक्षकों की टीम।

स्कूल में भ्रष्टाचार के खिलाफ शुरू की लड़ाई
मेरी मेहनत को देख स्कूल में ही क्रांतिकारियों की एक टीम बन गई। मैं उन जुझारू टीचर्स को क्रांतिकारी ही कहूंगी क्योंकि हम सरकारी क्षेत्र में काम करते हुए अपने अधिकारों की बात कर रहे थे। दिसंबर 2000 से जनवरी 2001 तक हमने एक हड़ताल की और इसकी वजह थी पांचवा वेतन आयोग। इस वेतन आयोग ने प्राइमरी टीचर को 4500, इसमें टीजीटी ग्रेड को 5000 और पीजीटी ग्रेड को 6000 पे स्केल रखा गया। ये हड़ताल 21 दिन चली और सफल रही। सरकार से जब समझौता हुआ तब पांच हजार वाला ग्रेड 5500 और 6000 वाला 6500 किया गया।
टीचर्स को सहृदय रहने का संदेश
इस तरह की कई लड़ाइयां स्कूल में रहते हुए लड़ीं। इस स्कूल में मैं एक टीचर के तौर पर आई थी फिर स्कूल इंचार्ज बनी और अब प्रिंसिपल हूं। मैं अपने स्कूल में कोशिश करती हूं कि मेरे जितने शिक्षक हैं वो बच्चों के प्रति सहृदय रहें ताकि बच्चों को ऐसा अहसास न हो कि वे गरीब घर से हैं। बच्चों की जरूरतों को पूरा करने के लिए मैं 12 महीने में से एक सैलरी इन बच्चों के नाम करती हूं। इनकी जरूरत की चीजें खरीदकर लाती हूं।

विभा प्यार से रखती हैं अपनी बात।
विभा प्यार से रखती हैं अपनी बात।

बच्चों को व्हीलचेयर और प्ले रूम कराया तैयार
महामारी के समय में स्कूल के बच्चों को खाना और अन्य जरूरत की चीजें उनके घर पहुंचाईं। इससे पहले दिव्यांग बच्चों के लिए व्हीलचेयर मंगवाई। सरकार ऐसे बच्चों के दाखिले तो करने की बात कहती है लेकिन उनके लिए सुविधाएं नहीं देती। इसके अलावा नर्सरी के बच्चों के लिए प्ले रूम तैयार कराया।
घर, नौकरी और अनशन साथ-साथ चले
आज अपनी जर्नी किसी को बताने में बहुत आसान लगती है लेकिन जब इन चुनौतियों से गुजर रही थी तब बड़ी मुश्किल से घर और बच्चे संभाल पाती थी। हमारी जॉइंट फैमिली से न्यूक्लिअर फैमिली हो गई। घर में छोटे बच्चों देखना, घर के सारे काम करना। सुबह सबसे पहले उठना। ये सब दिनचर्या बन गया था। लेकिन अब बच्चे बड़े हो गए हैं। घर संभालते-संभालते स्कूल में जो परेशानियां थीं उनके खिलाफ भी लड़ रही थी। पर कहीं भी हार नहीं जो गलत है उसे गलत ही कहा। अब नगर निगम शिक्षक संघ की सीनियर वाइस प्रेजिडेंट भी हूं।
जो आपको अच्छा लगता है वो करें
अब मैं हर महिला को कहती हूं कि आपको जो अच्छा लगता है वो करें। वो करिअर चुनें जहां आप अपनी पूरी एनर्जी लगा सकें। जिंदगी का नियम बना लें कि कुछ भी गलत नहीं सहना है। क्योंकि आप एक बार गलत का साथ देंगे धीरे-धीरे वो आपकी जिंदगी का हिस्सा बन जाएगा और वो गलत कब नासूर बनकर आपको नुकसान पहुंचाएगा आपको समझ नहीं आएगा।

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