सुन-बोल नहीं सकते तो आग लगने पर कैसे मांगेंगे हेल्प:बहन को देखकर ‘साइन लैंग्वेज’ के लिए लड़ी; इंदौर में दिव्यांगों के लिए खुलवाए मंदिर

नई दिल्ली21 दिन पहलेलेखक: मृत्युंजय

आज देश की 22 भाषाएं संविधान की 8वीं अनुसूची में शामिल हैं। यानी सरकार इन भाषाओं में अपने कामकाज करने और एजुकेशन देने के लिए बाध्य है। इतना ही नहीं भारत का कोई भी नागरिक अगर इनमें से किसी भी एक भाषा को जनता है तो वह कोई भी सरकारी जानकारी अपनी ही भाषा में ले सकता है और उसी भाषा में पढ़ाई या नौकरी से जुड़ी परीक्षा दे सकता है।

लेकिन क्या आप यकीन करेंगे देश की लगभग साढ़े 6 करोड़ लोगों की भाषा इस लिस्ट में शामिल नहीं है। वो भी ऐसा तब है जब इसे बोलने वाले दूसरी किसी भाषा को समझ पाने में पूरी तरह असमर्थ हैं। हम बात कर रहे हैं ‘साइन लैंग्वेज’ की। जो देश के 6.3 करोड़ मूक-बधिर लोगों की एकमात्र भाषा है।

क्या आपने कभी सोचा है- आग लगने, एक्सीडेंट होने या किसी भी तरह की इमरजेंसी में कोई मूक-बधिर हेल्प लाइन नंबरों पर कॉल कैसे करेगा? मदद कैसे मांगेंगे?

आपके, हमारे या सरकार के मन में भले ही यह ख़याल कभी न आया हो पर इंदौर की नैना नवलानी को यह सवाल कचोटता रहा। पेशे से बिजनेस वुमन और दो बच्चों की मां नैना ने मूक-बधिर लोगों की भाषा को सम्मान दिलाने और इमरजेंसी नंबरों पर उनकी लैंग्वेज में सुविधा दिलाने का बीड़ा उठाया है।

आज ‘ये मैं हूं’ में इंदौर की नैना नवलानी की कहानी….

बड़ी बहन को देखकर मिली प्रेरणा

मैं नैना नवलानी इंदौर में अपने पति के साथ एक्सपोर्ट का बिजनेस करती हूं। मैंने दुबई और सिंगापुर से पढ़ाई की। विदेश से एमबीए के बाद मैंने कई बड़ी कंपनियों में काम भी किया। फिर लगा कि इंदौर लौटना चाहिए तो यहां आ गई। यहां आकर मैं मूक-बधिर लोगों की भाषा को भी सम्मान दिलाने के लिए लड़ रही हूं। इससे मुझे जो खुशी मिलती है वो कॉर्पोरेट की नौकरी में मिलने वाले किसी भी सुख से बहुत ज्यादा है।

मैंने बचपन से अपनी बड़ी बहन को देखा जो थोड़ा ऊंचा सुनती थी। वो स्कूल में मेरे साथ ही पढ़ती थी। लेकिन दूसरे बच्चों के साथ पढ़ने में उसे कई तरह की दिक्कतें आती थीं। उसी वक्त मैंने तय किया कि आगे चलकर मुझे ऐसे लोगों के लिए कुछ करना है।

नैना चाहती हैं कि मूक-बधिर लोगों की साइन लैंग्वेज को मान्यता मिले; ताकि ऐसे लोग भी अपनी भावना जाहिर कर सकें।
नैना चाहती हैं कि मूक-बधिर लोगों की साइन लैंग्वेज को मान्यता मिले; ताकि ऐसे लोग भी अपनी भावना जाहिर कर सकें।

मैडम ने बोला था- ‘इनकी कौन सुनेगा?’

कुछ साल पहले मैं ‘यंग इंडियंस’ के इंदौर चैप्टर के साथ जुड़ी। वहां मैं बच्चों को ‘गुड टच’ और ‘बैड टच’ के बारे में बताती थी। इसी सिलसिले में मैं इंदौर के एक स्कूल में गई। वो स्कूल ‘मूक-बधिर’ बच्चों का था। हम उन्हें ‘गुड टच’ और ‘बैड टच’ समझाने की कोशिश कर रहे थे। मैं जब बच्चों को हेल्प लाइन नंबर के बारे में बता रही थी। तभी वहां की एक मैम ने मुझे टोकते हुए कहा- आप इन्हें बता तो रही हैं, लेकिन इनकी शिकायत सुनेगा कौन? ये बात मुझे चुभ गई।

मैम का सवाल बिल्कुल वाजिब था। किसी भी हेल्प लाइन नंबर पर इन बच्चों की शिकायत कोई कैसे सुनेगा? तब मुझे लगा कि ऐसे बच्चों के लिए मुझे आगे बढ़कर कुछ करना चाहिए।

ऑनलाइन फाइल की पिटीशन, मिला 3 हजार लोगों का साथ

जब मैंने मूक बधिर लोगों के साथ काम किया और उनकी प्रॉब्लम्स को समझा तो मुझे लगा कि सबसे पहले इनके लिए हेल्प लाइन नंबर्स की सुविधा जरूरी है। पुलिस को बुलाने से लेकर, फायर, एम्बुलेंस या किसी भी इमरजेंसी के लिए कई हेल्पलाइन नंबर्स होते हैं। जिस पर कॉल करके लोग मदद मांगते हैं। लेकिन देश की 6.3 करोड़ आबादी मूक बधिर है। जो बोल या सुन नहीं सकती है। ऐसे में उनके लिए ये हेल्प लाइन नंबर्स किसी काम के नहीं रह जाते। अगर किसी इमरजेंसी में ये उसपर कॉल लगा भी दें तो सामने वाला किसी बच्चे की शरारत समझ कॉल कट कर देता है।

मैंने ‘चेंज डॉट ओआरजी इंडिया (change.orgindia)’ की मदद से एक पिटीशन लिखी, जिसमें ऐसे लोगों के लिए हेल्प लाइन नंबर्स पर कुछ स्पेशल फीचर एड करने की मांग की गई है। अभी तक लगभग 3 हजार लोगों को इसका साथ मिल चुका है।

नैना अपने पति के साथ एक्सपोर्ट का बिजनेस करती हैं। परिवार, बच्चों और बिजनेस से समय निकाल कर वो मूक-बधिर लोगों के लिए काम कर रही हैं।
नैना अपने पति के साथ एक्सपोर्ट का बिजनेस करती हैं। परिवार, बच्चों और बिजनेस से समय निकाल कर वो मूक-बधिर लोगों के लिए काम कर रही हैं।

स्मृति ईरानी के सामने उठाया था सवाल

बोल और सुन पाने में असमर्थ लोगों की बात को सरकार और प्रशासन तक पहुंचाने के लिए मैं लगातार काम कर रही हूं। कुछ वक्त पहले मैं अहमदाबाद में केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी से मिली थी। मैंने वहां भी उनके सामने इस प्रॉब्लम को रखा। उन्होंने मदद का भरोसा भी दिया। लेकिन अभी तक कुछ हुआ नहीं है।

चाहती हूं 6.3 करोड़ लोगों की भाषा को पहचान मिले

देश के 6.3 करोड़ लोगों की भाषा है ‘साइन लैंग्वेज’। लेकिन इसे संविधान की 8वीं अनुसूची में शामिल नहीं किया गया है। अगर ऐसे हो जाता है तो मूक-बधिर लोगों को काफी सुविधा मिलने लगेगी। सरकार और प्रशासन के लिए साइन लैंग्वेज को रखना मजबूरी हो जाएगा। उनकी ये मजबूरी करोड़ों लाचार लोगों की जिंदगी बदल सकती है।

इंदौर के मंदिरों को दिव्यांग फ्रेंडली बना रही हूं

पिटीशन और मुहिम के अलावा मैं खुद भी ग्राउंड पर जाकर डिसेबल लोगों की मदद करती हूं। हमने देखा कि मंदिरों में ऐसे लोगों के लिए अलग सुविधा नहीं होती। इसके चलते चाहकर भी वो मंदिरों में दर्शन नहीं कर पाते। इसे देखते हुए हमने इंदौर के मंदिरों को डिसेबल फ्रेंडली बनाने का काम शुरू किया। यहां के कई मंदिर अब दिव्यांगों के लिए पूरी तरह से खुले हैं। जहां दर्शन और पूजा करने में उन्हें किसी तरह की दिक्कत नहीं आएगी।

दूसरे देशों में हो सकता है तो यहां क्यों नहीं

दुनिया के सभी विकसित देशों में साइन लैंग्वेज को मान्यता मिली हुई है। वहां इमरजेंसी हेल्प लाइन नंबरों पर वीडियो कॉल, 24/7 वीआरएस और साइन लैंग्वेज इंटरप्रेटर की सुविधा मिलती है। ये कोई बहुत बड़ा काम नहीं है; ना ही इसमें किसी बड़ी तकनीक की जरूरत है। बस थोड़ी सी इच्छाशक्ति और दिव्यांगों के लिए स्नेह दिखाकर इस काम को किया जा सकता है।