एनकाउंटर कवर करने वाली कश्मीर की पहली महिला पत्रकार हूं:अपनों ने लगाया मुखबिर होने का आरोप, आज कश्मीर में चला रही अपना मीडिया हाउस

नई दिल्ली2 महीने पहलेलेखक: भारती द्विवेदी

मैं फरजाना मुमताज। कश्मीर के डाउनटाउन यानी शहरे-ए-खास इलाके से हूं। बचपन से ही टॉम बॉय जैसी रही। कोएड स्कूल में पढ़ाई की। 1990 के दौर में जींस पहनकर घूमती थी। इन बातों से आप समझ सकते हैं कि मेरे घर में कपड़ों और पढ़ाई को लेकर किस तरह की आजादी रही।

फिर छोटी उम्र में शादी हुई और तलाक भी देखा। उसके बाद सपनों को बिखरते देखा। डॉक्टर बनना था, नहीं बन पाई लेकिन पर्सनल-प्रोफेशनल लाइफ में मिली सारी चुनौतियों से लड़कर आज मैं जिस मुकाम पर खड़ी हूं, अब गर्व से कह सकती हूं कि ये मैं हूं…

कश्मीर में हालात बदला तो हमारे घर के भी हालात बदले गए

मेरे अब्बू का कश्मीर आर्ट का बिजनेस था। वो कुछ मामलों में सख्त थे। साल 1988-89 के बाद जब कश्मीर बदलने लगा तो उसका असर हमारे घर पर भी हुआ। पहले हम तीनों भाई-बहन जिस आजादी के साथ घूमते-फिरते या खेलते थे वो सब बंद हो गया। लड़की होने की वजह से मेरी बहन और मेरे लिए नियम थोड़े ज्यादा सख्त हो गए। अब्बू को लगता लड़कियां हैं, बाहर जाएंगी औऱ कुछ हुआ फिर हम क्या करेंगे।

17 की उम्र में दो बच्चों की मां बन गई और फिर तलाक का दर्द झेला

कश्मीर में बदले हालात की वजह से मेरी शादी बहुत कम उम्र में हो गई। मेरा मैट्रिक का रिजल्ट शादी के बाद आय़ा। शुरू में तो सब कुछ सही चल रहा था। शौहर सपोर्टिव थे। मैंने पढ़ाई आगे भी जारी रखी। मैं मेडिकल फील्ड में जाना चाहती थी लेकिन ससुराल का माहौल उलट था। मेरे घर में पढ़ाई को तवज्जो दिया जाता था। यहां ऐसा नहीं हो पाया। बारहवीं के समय मेरे दोनों बच्चे हो चुके थे। घर में कुछ दिक्कत आई तो मैंने जॉब के लिए सोचा। शौहर भी कहते कि जो काम मिल रहा है कर लो मेडिकल का आगे देख लेंगे, लेकिन वो मौका कभी नहीं आया। मेरे काम करने की वजह से घर का माहौल खराब होने लगा। हर रोज ताने मिलने लगे। पहले कुछ सालों तक पति का साथ मिला फिर वो भी मां-बाप के साथ हो गए। बात डोमेस्टिक वायलेँस तक चली गई। तलाक का फैसला भी पति ने ही ले लिया। मैं तो उस वक्त तैयार भी नहीं थी। 20-21 की उम्र में मैं दस साल की शादी और दो बच्चों के बाद तलाकशुदा थी।

फरजाना कहती हैं कि डॉक्टर बनने का मेरा सपना पूरा नहीं हुआ, लेकिन मुझे खुशी होती है कि मैंने अपने बेटे को डॉक्टर बना दिया।
फरजाना कहती हैं कि डॉक्टर बनने का मेरा सपना पूरा नहीं हुआ, लेकिन मुझे खुशी होती है कि मैंने अपने बेटे को डॉक्टर बना दिया।

एनकाउंटर कवर करने वाली मैं कश्मीर की पहली महिला जर्नलिस्ट

मैंने सबसे पहला काम दूरदर्शन के लिए किया। हालांकि मेरा एजुकेशन बैकग्राउंड साइंस का रहा, लेकिन दूरदर्शन में इंटरव्यू देकर सलेक्ट हो गई। फिर मैंने बतौर रिपोर्टर औऱ एंकर काम किया। साथ ही मैं ANI के लिए भी काम करने लगी। उस वक्त कश्मीर में मेरे अलावा दो-तीन और महिलाएं बतौर पत्रकार काम कर रही थीं। उनमें से कुछ कश्मीर से बाहर रहकर काम करतीं, तो कुछ का काम सिर्फ स्टूडियो तक सीमित था। मैं कश्मीर की पहली महिला पत्रकार हूं जो ग्राउंड पर जाती थी। मैंने एनकाउंटर से लेकर पुलिस की प्रेस कॉन्फ्रेंस सब कुछ कवर किया। इसी दौरान मैंने लिखना भी शुरू किया। फिर मैं कश्मीर के अलग-अलग अखबारों के लिए लिखने लगी। कुछ समय तक दिल्ली के बड़े चैनलों के लिए भी काम किया।

काम की वजह से लोगों ने खूब सुनाया ताना, मुखबिर तक कहा

छोटी उम्र में शादी, फिर दो बच्चे और तलाक के बाद मैं बिल्कुल टूट सी गई थी। इस बुरे दौरे में मेरे घरवाले मजबूती के साथ रहे। उनका सपोर्ट देख मुझे भी लगा कि मुझे अपने बच्चों की परवरिश और खुद के लिए कुछ करना होगा। मैंने अपने काम को जारी रखना का फैसला किया। जब मैं मीडिया से जुड़ी तो आसपास के लोग और रिश्तेदारों ने तरह-तरह के ताने दिए। उन तानों में एक ताना ये भी रहा कि मैं मुखबिर का काम करती हूं। वही साथ काम करने वाले कुछ पुरुष सहयोगियों ने भी मुझे आगे बढ़ने से रोकने की पूरी कोशिश की। वो एडिटर से जाकर कहते इसे हटा दो। एक तो ये अच्छा काम नहीं करती, दूसरा फील्ड की चुनौतियों से नहीं लड़ पाएगी। हम इससे बेहतर चीजें कर सकते हैं। ये सारी ही बातें बेहद दिल दुखाने वाली होती थीं पर मैंने हौसला नहीं हारा। मेरी अम्मी हमेशा मुझे कहती थीं कि किसी का बुरा नहीं करो तो तुम्हारे साथ भी अच्छा जरूर होगा। यही हुआ भी।

तमाम चुनौतियों और संघर्ष के बाद मेरा काम लोगों के बीच पहुंचने लगा। आज वही लोग गर्व से कहते हैं कि ये हमारी बेटी है या हम इसे जानते हैं।
तमाम चुनौतियों और संघर्ष के बाद मेरा काम लोगों के बीच पहुंचने लगा। आज वही लोग गर्व से कहते हैं कि ये हमारी बेटी है या हम इसे जानते हैं।

अपनी वीकली मैगजीन शुरू कर महिलाओं के मुद्दे उठाए

मैंने साल 2013 में ‘न्यूज कश्मीर’ के नाम से अपनी वीकली मैगजीन शुरू की। उसमें मैं अधिकांश महिलाओं के मुद्दे को उठाती हूं। साथ ही महिलाओं के अचीवमेंट को भी जगह देती हूं। मेरी मैगजीन में सिर्फ कश्मीर की खबर नहीं छपती। नेशनल न्यूज के अलावा मैं दूसरे राज्यों के भी मशहूर शख्सियत को फीचर करती हूं। आज ‘न्यूज कश्मीर’ जम्मू-कश्मीर में एस्टैब्लिश हो चुका है। आज मेरे पास अपना ऑफिस और स्टाफ है। मेरी और ‘न्यूज कश्मीर’ की पहचान अब सिर्फ कश्मीर तक नहीं रही है। बाहरी दुनिया के लोग जानते हैं। मेरी कोशिश है कि मैं अपने लोगों के लिए काम करूं और खासकर के महिलाओं के लिए काम करूं।

पाकिस्तान समेत कई देशों में भारत का किया प्रतिनिधित्व

बतौर पत्रकार मेरे किए गए काम को देखते हुए मुझे कई दफा विदेशों में देश को रिप्रेजेंट करने का मौका मिला। साल 2016 में भारत सरकार की तरफ से इंडो-पाक रिलेशन के लिए पाकिस्तान डेलीगेशन भेजा गया था। मैं उसका हिस्सा थी। फिर मैंने बैंकॉक में आयोजित पीस कॉफ्रेंस में देश का प्रतिनिधित्व किया। इसके अलावा और कई देशों में इंडिया को रिप्रेजेंट करने का मौका मिला, लेकिन मैं जा नहीं पाई क्योंकि मेरी अम्मी की तबियत बहुत खऱाब थी।

फरजाना ने काम करने के दौरान ही कश्मीर यूनिवर्सिटी से आर्ट्स में ग्रेजुएशन किया।
फरजाना ने काम करने के दौरान ही कश्मीर यूनिवर्सिटी से आर्ट्स में ग्रेजुएशन किया।

लड़कियां ठान लें क्या करना है, फिर उन्हें कोई नहीं डिगा सकता

मैं कश्मीर ही नहीं दुनिया की सारी लड़कियों से कहूंगी पहले तय कर लें करना क्या है। आप जब एक बार तय कर लेंगी फिर दुनिया की कोई ताकत आपके फैसले को नहीं बदल सकती। लोग चाहे कितना भी क्रिटिसाइज करें उससे डरना नहीं है। आप अपने मां-बाप से खुलकर बताइए क्या करना चाहती हैं। आगे बढ़ने के रास्ते में आने वाले चुनौतियों का हिम्मत औऱ पेशेंस के साथ सामना करें। मंजिल जरूर मिलेगी।

खबरें और भी हैं...