पिताजी कहते लड़की के बस का नहीं शहनाई बजाना:11 की उम्र में बिस्मिल्लाह खान से ली तालीम, आज हूं इकलौती महिला शहनाई वादक

नई दिल्ली9 दिन पहलेलेखक: संजय सिन्हा

26 जनवरी 1950 का वो दिन जब भारत गणतंत्र बना तब समारोह में बिस्मिल्लाह खान की शहनाई गूंज उठी थी। तब से लेकर आज तक इस साज की धुन हवाओं में है। देश 74वां गणतंत्र दिवस मना रहा है। तो आज इस विशेष कॉलम में भारत रत्न से सम्मानित बिस्मिल्लाह खान की शिष्य और देश की इकलौती महिला शहनाई वादक बागेश्वरी कमर से मिलिए।

मैं छह-सात साल की थी तब मां चंद्रावती कमर से कहती कि मेरे लिए भी शहनाई बना दें, मैं भी बजाया करूंगी। जब पड़ोस के बच्चे गुड्‌डे-गुड़ियों के साथ खेलते थे तब मुझे शहनाई लुभाती थी। सुबह-शाम घर में पिता और उनके शिष्यों को अभ्यास करता देखती तो मेरा बहुत मन करता। एक दिन मां ने साज बनाकर दे ही दिया। मां सख्त निर्देश देतीं कि शहनाई तभी बजाना जब पापा घर पर न हों।

लेकिन पिता जी को पता चल गया। उन्होंने मना किया। उन्होंने कहा कि शहनाई महिलाओं का साज नहीं है। यह ऐसा साज है जो केवल पुरुष ही बजा सकते हैं क्योंकि इसमें बहुत दमखम की जरूरत होती है। जब पिता ने ये कहा तो मुझे यह बहुत चैलेंजिंग लगा और खुद से पूछा कि क्या मेरे अंदर वो दमखम नहीं है। मैं बजा सकती हूं ये मन में ठान लिया। मां को तो पता था लेकिन पिता से छुपाकर शहनाई बजाना शुरू किया।

इसके दो-तीन साल के बाद एक बार घर में रियाज कर रही थी तो पिता आ गए। मां से पूछा कि कौन बजा रहा है? मां ने बता दिया कि बब्बू (घर में इसी नाम से बुलाते थे) बजा रही है। पिता हैरत में पड़ गए। वो बोल पड़े, अरे बब्बू शहनाई बजा रही है! मेरे सुर और लय बिल्कुल स्पष्ट थे, वो भी बिना समुचित अभ्यास के। पापा ने कहा कि वैसे मैं इस पक्ष में नहीं हूं, पर बजाना चाहती ही हो तो कायदे से बजाओ।

1979 में जब उस्ताद बिस्मिल्लाह खान दिल्ली आए और पापा ने उन्हें मेरे शहनाई बजाने की बात बताई तो वो भी अचरज में पड़ गए। उन्होंने भी शहनाई बजाने का आशीर्वाद दिया।

बागेश्वरी देवी ने 17 साल की उम्र में स्टेज पर पहला परफॉर्मेंस दिया था। धीरे-धीरे उनके शहनाई वादन में मैच्योरिटी आती गई। न केवल देश में, बल्कि विदेशों में भी उन्होंने अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया। यह तस्वीर करीब 35 साल पुरानी है। (फैमिली एलबम से)
बागेश्वरी देवी ने 17 साल की उम्र में स्टेज पर पहला परफॉर्मेंस दिया था। धीरे-धीरे उनके शहनाई वादन में मैच्योरिटी आती गई। न केवल देश में, बल्कि विदेशों में भी उन्होंने अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया। यह तस्वीर करीब 35 साल पुरानी है। (फैमिली एलबम से)

तीन पीढ़ियों से घर में संगीत का माहौल

पुरानी दिल्ली के सदर बाजार एरिया में ईदगाह रोड पर चंद्र कुटीर के आसपास के पूरे इलाके में तब शहनाई से ही लोगों के दिन की शुरुआत होती थी जिसे मंगल ध्वनि कहते थे। पिछली तीन पीढ़ियों से मेरे घर में संगीत का माहौल रहा। मेरे दादा दीप चंद शहनाई वादक रहे। पिता पंडित जगदीश प्रसाद कमर प्रख्यात शहनाई वादक थे। वे उस्ताद बिस्मिल्लाह खान के सबसे प्रिय शागिर्द रहे। उन्हें राष्ट्रपति अवाॅर्ड भी मिला था। चाचा भी शहनाई बजाते थे। तो शुरू से ही घर में म्यूजिक को देखा। पिता शायर भी थे तो उन्होंने तकल्लुफ़ लगाया था ‘कमर’। इस तरह मेरे नाम के साथ भी ‘कमर’ जुड़ गया।

रिश्तेदार कहते, लड़की को शहनाई न बजाने दो

उस समय शहनाई को लकेर काफी ऐतराज था। जब तालीम लेना शुरू किया तो आस-पड़ोस के लोग और रिश्तेदार कहते कि लड़की को शहनाई नहीं बजाना चाहिए। रात में भी परफॉर्मेंस के लिए जाना होता है, यह लड़की के लिए ठीक नहीं है। लेकिन पिता ने किसी की नहीं सुनी। मुझे कहा कि पढ़ने-लिखने वाले तो कई होंगे लेकिन शहनाई बजाने वाली एक ही लड़की होगी बागेश्वरी। इस तरह पिता ने मेरा हौसला बढ़ाया। घर पर तालीम के समय डांट भी पड़ी, मार भी। मैंने 12वीं के बाद आगे पढ़ाई नहीं की और अपना पूरा जीवन शहनाई को समर्पित कर दिया।

गंडा बांधना गुरु-शिष्य से संबंधित विशेष रस्म होती है। गुरु शिष्य की बांह पर एक धागा बांध देते हैं जिसे गंडा बांधना कहते हैं। जब शिष्य शिक्षा प्राप्त कर लेता है तो गुरु रीति अनुसार अपने घराने का गंडा उसके हाथों में बांध देते हैं। बागेश्वरी देवी को गंडा बांधते उस्ताद बिस्मिल्लाह खान। (तस्वीर बागेश्वरी कमर के सौजन्य से)
गंडा बांधना गुरु-शिष्य से संबंधित विशेष रस्म होती है। गुरु शिष्य की बांह पर एक धागा बांध देते हैं जिसे गंडा बांधना कहते हैं। जब शिष्य शिक्षा प्राप्त कर लेता है तो गुरु रीति अनुसार अपने घराने का गंडा उसके हाथों में बांध देते हैं। बागेश्वरी देवी को गंडा बांधते उस्ताद बिस्मिल्लाह खान। (तस्वीर बागेश्वरी कमर के सौजन्य से)

सुना था बिस्मिल्लाह खान साहब गुस्सैल हैं

कुछ समय तक घर पर तालीम लेने के बाद पिता ने मुझे उस्ताद बिस्मिल्लाह खान के पास बनारस भेजा। तब मेरी उम्र 11 साल थी। बनारस जाने से पहले दिल-दिमाग में खान साहब का ऐसा खौफ था कि पूछिए मत। सुन रखा था कि खान साहब बहुत गुस्सैल हैं। लेकिन उनकी मुझ पर असीम कृपा रही। उन्होंने मुझे काफी स्नेह दिया। बेटियों को लेकर वे संवेदनशील थे। मैं उनकी प्रिय शिष्या बनी।

घंटों रियाज का पता ही नहीं चलता था

जब बिस्मिल्लाह खान साहब के साथ रियाज होता तो कुछ पता नहीं होता था कि यह कितनी देर चलेगा। बैठ गए तो बैठ गए। दो-चार घंटे तो आम बात थी। गाने-बजाने के अलावा कोई बात नहीं होती थी। रियाज के दौरान उनकी तालीम चलती रहती थी। कभी-कभी हल्की-फुल्की डांट पड़ जाया करती थी। हम लोग अक्सर नीचे के दलान में रियाज करते थे। सब कुछ उनके बोलने पर होता था। साज लेकर बैठते थे। उनके घर के परिवार के लोग भी रहते थे। हम सब बैठते थे। कई बार अलग से भी रियाज होता था। रियाज का कोई टाइम-टेबल नहीं था। दिन-रात नहीं देखते थे। रेगुलर रियाज के साथ होठों का भी एक्सरसाइज होता था। शहनाई पर ग्रिप बनी रहे, इसके लिए नियमित रियाज होता था।

जब लड़़कों के साथ खान साहब ने जुगलबंदी कराई

खान साहब ने मुझे हमेशा प्रोत्साहित किया। एक बार उन्होंने कहा कि लड़कों के साथ बागेश्वरी की जुगलबंदी कराएंगे। तब मैंने उनके शागिर्दों को यह कहते सुना था कि ‘पगला गए हैं? लड़की के साथ जुगलबंदी करा रहे हैं!’। लेकिन गुरु जी असाधारण थे। उन्होंने कभी फर्क महसूस नहीं किया।

पहले परफॉर्मेंस में पिता नहीं आए

27 फरवरी 1983 का दिन मुझे याद है। दिल्ली के कमानी ऑडिटोरियम में मेरा पहला परफॉर्मेंस था। तब मैं 17 साल की थी और मैं ऑल वुमन म्यूजिक फेस्टिवल ‘भैरव से सोहनी’ में पार्टिशिपेट कर रही थी। तब उस समय की प्रख्यात कलाकार शन्नो खुराना ने महिलाओं के लिए विशेष आयोजन करवाया था।

मेरा पहला परफॉर्मेंस था पर पिता देखने नहीं आए। मेरे मन में डर था कि ऑडिएंस के सामने कैसे बजा सकूंगी। लेकिन सब कुछ बढ़िया से हो गया।

ऑडिएंस के सामने मैंने बिना किसी परेशानी के ‘मिया की टोड़ी’ राग बजा दिया। पूरा हॉल तालियों से गूंज उठा। लोग अचरज में थे कि शहनाई जैसे कठिन साज को कैसे कोई महिला बजा रही है। ये सिलसिला जो शुरू हुआ वो अब तक चल रहा है। हमने वही किया जो गुरु ने कहा।

खाने-पीने पर नहीं लगाई कोई बंदिश

बिस्मिल्लाह खान साहब ने खाने-पीने को लेकर कभी कोई बंदिश नहीं लगाई। वो खुद मीठा बहुत तेज खाते थे। आइसक्रीम खाते। तीखा खाते थे। इसलिए खाने-पीने पर कोई रोक नहीं थी।

मॉस्को में मेरे परफॉर्मेंस से लोग हुए खुश

मैंने देश ही नहीं, विदेशों में भी कई परफॉर्मेंस दिए। 1988 में रूस गई वहां मास्को में परफॉर्मेंस दी। बहुत शानदार अनुभव था। छह लोगों का ग्रुप था। अकेली मैं ही महिला थी। लोगों ने काफी प्यार दिखाया। रूसी लोगों ने भी पहली बार किसी महिला को शहनाई बजाते देखा था। 1996 में दुबई में भी इसी तरह कार्यक्रम किया।

ये दुबली-पतली लड़की क्या शहनाई बजाएगी!

एक बार चंडीगढ़ गई वहां किसी कार्यक्रम में शहनाई बजाना था। वहां एक प्रोफेसर पहुंचे हुए थे। उन्होंने मुझे देखा तो कहा कि इतनी दुबली-पतली लड़की शहनाई बजा लेगी क्या! वो समझ रहे थे कि कोई मोटी-ताजी लड़की स्टेज पर आएगी और शहनाई बजाएगी। खैर, जब मुझे शहनाई बजाते देखा तो खुशी से झूम उठे। उस कार्यक्रम के बाद मुझे शहनाई क्वीन कहा जाने लगा।

दोनों बेटियों का नामकरण खान साहब ने किया

1985 में मेरी शादी नरेश कुमार से हुई। विवाह से पहले ही हमने तय कर लिया था कि मैं दिल्ली में इसी घर में रहकर अपना रियाज जारी रखूंगी। पति ने इस फैसले को सपोर्ट किया। वो हमेशा प्रोत्साहित करते रहे। शहनाई सुनने में हमेशा उन्हें रुचि भी रही है। मुझे दो बेटियां हुईं। जैसे मेरा नाम बागेश्वरी एक राग है उसी तरह मेरी बेटियों का नाम कुकुब बिलावली और गमक है। ये दोनों नाम उस्ताद बिस्मिल्लाह खान ने रखा। कुकुब और बिलावली दो राग हैं। गमक स्वरों में विशेष प्रकार के कंपन को कहा जाता है।

संगीत यानी सीधे ईश्वर से साक्षात्कार

बिस्मिल्लाह खान साहब से सीखा कि संगीत से जुड़ना यानी सीधे ईश्वर से साक्षात्कार करना है। ईश्वर की भक्ति होती है। कई बार हमें इसका आभास भी हुआ है। कई बार लोग शादी-ब्याह में शहनाई बजाने के लिए एप्रोच करते हैं और मैं सीधे-सीधे इन्कार कर देती हूं। कभी इस तरह के फंक्शन में नहीं गई। पैसे के लिए मैं शहनाई नहीं बजाती। कला के लिए, साधना के लिए मेरी शहनाई है।

बागेश्वरी कमर के पिता पंडित जगदीश प्रसाद कमर भी प्रख्यात शहनाई वादक रहे थे। उन्होंने भी उस्ताद बिस्मिल्लाह खान से शहनाई बजाना सीखा था। अपनी बेटी बागेश्वरी को पहले उन्होंने तालीम दी। फिर अपने गुरु के पास बेटी को शहनाई बजाना सीखने के लिए भेजा। (तस्वीर फैमिली एलबम से)
बागेश्वरी कमर के पिता पंडित जगदीश प्रसाद कमर भी प्रख्यात शहनाई वादक रहे थे। उन्होंने भी उस्ताद बिस्मिल्लाह खान से शहनाई बजाना सीखा था। अपनी बेटी बागेश्वरी को पहले उन्होंने तालीम दी। फिर अपने गुरु के पास बेटी को शहनाई बजाना सीखने के लिए भेजा। (तस्वीर फैमिली एलबम से)

आज भी करती हूं 2 घंटे रियाज

आज भी कम से कम 2 घंटे रियाज करती हूं। दिल्ली में सदर बाजार और पतपड़गंज में घर है। जहां भी जाती हूं साज मेरे साथ होता है।

शहनाई में सब कुछ ओरिजिनल है

शहनाई को इंस्ट्रूमेंट नहीं कह सकते। यह ओरिजिनल है। शहनाई हाथ से बनाई जाती है। इसमें फूंकना होता है। इसमें सीने का जोर लगाना पड़ता है। साज को दबाना पड़ता है। कहां कम करना है कहां दबाना है। जब आप शहनाई बजाते हैं तब शरीर का हर भाग इसमें इंगेज होता है क्योंकि सांस पर कंट्रोल करना होता है। दूसरे इंस्ट्रू्मेंट में गला या हाथ का इस्तेमाल होता है लेकिन शहनाई की तरह ज्यादा जोर नहीं पड़ता। बनारस में भी और दिल्ली में भी शहनाई बनती है। मेरे पास जो शहनाई है उसे पिता ने दिल्ली में तैयार करवाया था।

कोविड के कारण ब्रेक लगा

पिछले 50 सालों से शहनाई बजा रही हूं। हालांकि दो-तीन सालों से कोविड की वजह से ब्रेक हुआ। अभी दोबारा से शुरू कर रही हूं।

बागेश्वरी कमर के पास उनके पिता की दी हुई शहनाई है। वह आज भी उसी शहनाई से रोज दो घंटे तक रियाज करती हैं। (तस्वीर फैमिली एलबम से)
बागेश्वरी कमर के पास उनके पिता की दी हुई शहनाई है। वह आज भी उसी शहनाई से रोज दो घंटे तक रियाज करती हैं। (तस्वीर फैमिली एलबम से)

अब कोई सीखना नहीं चाहता

शहनाई बजाना अब कोई सीखना नहीं चाहता। बच्चों को यह बहुत टफ लगता है। म्यूजिक जानने-समझने के लिए तो आते हैं लेकिन शहनाई से दूर रहते हैं। जमाना बदल गया है। लड़कियों में तो कोई नहीं है। अब तो मशीनीकरण है। बस तुरत-फुरत सब कुछ चाहिए। रियाज और साधना अब कौन करना चाहता है। शहनाई का क्रेज है नहीं। सरकार की तरफ से भी उदासीनता है। अगर सरकार की ओर से मौका मिले तो नई पीढ़ी को शहनाई से रू-ब-रू जरूर कराऊंगी।

लड़कियां क्या नहीं कर सकतीं

सितार, सरोद, वायलिन, तबला, पखावज, बांसुरी जैसे साज लड़कियां बजा सकती हैं तो शहनाई क्यों नहीं। इसी सोच के साथ मैं आगे बढ़ी। ये काम मर्दों का है लड़कियां नहीं कर सकतीं, वो जमाना चला गया। लड़कियों में लड़कों की तरह ही समान क्षमता है उन्होंने प्रूव करके दिखाया है।

फाइटर प्लेन उड़ाने से लेकर आर्मी-पुलिस में भर्ती होने, साइंटिस्ट बनने, किसी भी तरह के खेल में अपना सर्वोच्च देने में लड़कियों ने बाजी मारी है। लड़कियां सब कुछ कर सकती हैं ये भरोसा हमेशा बनाएं रखें।

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