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हैप्पी होममेकर:अपनों की खुशियों का ख्याल रखना मेरी पसंद है, किसी की कोई जोर-जबरदस्ती नहीं

13 दिन पहलेलेखक: दीप्ति मिश्रा
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होममेकर के काम को तवज्जो न मिलने वाले दिन अब हवा हो चुके हैं। मौजूदा वक्त में लोग होममेकर की अहमियत को बखूबी समझते भी हैं और उसके काम को सम्मान भी देते हैं। बॉलीवुड की फिल्में 'सुपर नानी' और 'थप्पड़' में अभिनेत्री रेखा और तापसी पन्नू ने अपने किरदार के जरिये आम लोगों को यह बात अच्छे से समझाने की कोशिश की है। हाउस मेकर बनना है या वर्किंग वीमेन, अब महिलाएं यह चुनती हैं। यह कहना है दिल्ली के बदरपुर में रहने वाली वंदना मिश्रा का, जिन्होंने शादी के बाद घर बनाने बनाने को अपना करियर समझा।

वंदना मिश्रा कहती हैं कि होममेकर बनना मेरी च्वाइस है, किसी की कोई जोर-जबरदस्ती नहीं। शादी के बाद मेरे पास विकल्प था। मैं जॉब कर सकती थी क्योंकि मेरी सासू मां वर्किंग हैं और ससुराल वालों की तरफ से भी मेरे ऊपर कोई रोक-टोक नहीं थी। मुझे अपनों की छोटी-छोटी जरूरतों और उनकी खुशियों का ख्याल रखना अच्छा लगता है। मुझे अपने घर को सजाना और संवारना, हर एक कोने में खुशियों का रंग भरना पसंद है।

पति और सास के साथ वंदना
पति और सास के साथ वंदना

परिवार का भरोसा मुझे 'हाई' फील कराता है...

मेरी पूरी कोशिश रहती है कि तीज-त्योहारों को परिवार के सदस्यों के लिए स्पेशल बनाया जाए। त्योहारों पर किसी न किसी थीम पर घर को सजाती हूं। बेटे को तैयार कर उसकी ढेर सारी पिक्स क्लिक करती हूं और बाकी लोगों की भागदौड़ भरी जिंदगी में सुकून का तड़का लगाती हूं। इस सब में मैं इतनी मग्न रहती हूं कि मैं वर्किंग नहीं हूं, ऐसा महसूस होने का वक्त नहीं मिलता। मेरी सास जब घर से बाहर जाती हैं, तो उनको भरोसा होता है कि घर में मेरी बहू है, जो सब संभाल लेगी। मेरे परिवार के बाकी सदस्य भी यही सोचकर बेफिक्री से अपना काम कर पाते हैं कि घर में मैं हूं ना। सच कहूं तो मैं ये जिम्मेदारी एंजॉय करती हूं। मेरी सास और बाकी घर वालों का भरोसा मुझे 'हाई' फील कराता है।

फेलोशिप के लिए भी हुआ था चयन

वंदना का कहना है कि मेरी आठवीं के बाद की पढ़ाई दिल्ली-एनसीआर में हुई। एजुकेशन से एमए की पढ़ाई पूरी की। शादी से पहले कई स्कूलों और कोचिंग सेंटर से जॉब के ऑफर मिले। कुछ समय तक एक कोचिंग सेंटर में बच्चों को पढ़ाया भी। मेरा बाउंड्रीलेस फेलोशिप और गांधी फेलोशिप के लिए भी चयन हुआ, लेकिन अपने शहर से दूर जाने की अनुमति नहीं मिली। हालांकि, शादी के बाद इस तरह की कोई दिक्कत नहीं है। बाउंड्रीलेस फैलोशिप के जरिये उत्तराखंड में हर साल प्राकृतिक महामारी से बेघर होने वाले परिवारों और उनके बच्चों के बेहतर जीवन के लिए काम किया जाता है। वहीं गांधी फैलोशिप में ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में प्रशासन और स्कूलों प्रशासन के साथ मिलकर शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने के लिए काम करना होता है।

वंदना मिश्रा पति राम द्विवेदी के साथ
वंदना मिश्रा पति राम द्विवेदी के साथ

टुकड़ों में पूरी करती हूं नींद

शादी से पहले मां ने कभी भी घर के काम में मेरी मदद नहीं ली। वे सारे कामकाज खुद ही करती थीं। मेरा सारा वक्त पढ़ाई या फिर क्रिएटिव चीजें सीखने में गुजरता। ऐसे में होममेकर बनने का फैसला करना मेरे लिए बिल्कुल भी आसान नहीं था। मेरे परिवार में सास, मामा ससुर, पति, देवर और डेढ़ साल का बेटा है। मेरी सासू मां शिक्षिका हैं। पति और देवर भी मल्टीनेशनल कंपनियों में कार्यरत हैं। सबके दफ्तर का समय अलग-अलग है। मामा ससुर बुजुर्ग हैं और देख नहीं सकते हैं। इसलिए मेरी चुनौतियां और बढ़ जाती हैं। बेटा छोटा है, इसलिए कई बार नींद भी टुकड़ों में लेनी पड़ती है।

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