नाना की बीमारी से मिला बिजनेस आइडिया:कोविड में शुरू किया हेल्थकेयर स्टार्टअप, अब घर बैठे मिलती है दवा और दुआ

15 दिन पहलेलेखक: मीना

‘शादी, बच्चा होने के बाद वर्किंग महिलाओं के करिअर पर जैसे पॉज लग जाता है। मेरे भी करिअर के साथ कुछ ऐसा ही हुआ। एक बेटी होने के बाद जब वह स्कूल जाने लगी तब मुझे खालीपन कचोटने लगा। तब लगा कि मैंने सीए की पढ़ाई की। कई साल कॉरपोरेट में काम किया, लेकिन अब मैं क्या कर रही हूं? ये आत्मअनुभूति होते ही मैं निकल पड़ी एक नई तलाश की ओर।’ ये शब्द हैं दिल्ली में पली-बढ़ी उभरती आंत्रप्रेन्योर शुचिता गुप्ता के।

45 साल की शुचिता वुमन भास्कर से खास बातचीत में कहती हैं, ‘जब मुझे ये महसूस हुआ कि मैंने नौकरी छोड़ कर घर संभालना तो शुरू कर दिया। एक लंबा वक्त परिवार को दे तो दिया, लेकिन अब क्या करूं। अब खाली समय कैसे काटूं।

शादी के बाद का खालीपन कचोटने लगा

ये सब बातें सोचते-सोचते मेरा कॉन्फिडेंस गिरने लगा। मैं एंग्जायटी की शिकार होने लगी। बार-बार मन में आता कि अब तो मैं किसी काम की नहीं रही। अब मुझे कोई संस्थान नौकरी नहीं देगा। तब सौभाग्य ऐसा हुआ कि वो दौर स्टार्टअप के शुरू होने के दौर था।

आंत्रप्रेन्योर शुचिता गुप्ता अपनी बेटी के साथ
आंत्रप्रेन्योर शुचिता गुप्ता अपनी बेटी के साथ

ऐसा ही एक स्टार्टअप जानकार लोग शुरू कर रहे थे। उनके साथ कंसल्टेंट सीएफओ बनकर काम किया। इस नौकरी से मुझे मेरा कॉन्फिडेंस वापस मिला। लगा कि लोगों को मेरी काबिलियत पर विश्वास है। खूब जी-जान लगाकर काम किया।

इस काम में यह भी सीखा कि हमारे जमाने में सारे काम पेपर पर होते थे और अब सब कम्प्यूटर पर। पहले पेमेंट के लिए बैंक के चक्कर लगाते थे और अब पेमेंट गेटवे से काम चल जाता है। अलग-अलग स्टार्टअप्स के साथ काम करके अलग-अलग अनुभव प्राप्त हुए।

साथियों ने की मदद

मेरे काम को देखते हुए मुझे कंसल्टेंट सीएफओ से रेगुलर एंप्लॉयी बना दिया गया। 2017 से 2020 तक नौकरी की। मेरा काम दूसरों को पसंद आने लगा। मेरे काम से मेरी पहचान बनने लगी। हालांकि, किसी संस्थान में ब्रेक के बाद की शुरुआत आसान नहीं होती, ऐसे में कई बार मेंटली डिप्रेस्ड भी हुई, क्योंकि कॉरपोरेट कल्चर आपको तंग भी करता है। मैं बुद्धिज्म को मानने लगी और मानसिक शांति की कामना करने लगी।

साल 2020 में डॉ. अमन खेड़ा के साथ मिलकर अपना स्टार्टअप ‘केयर फॉर पेरेंट्स’ शुरू किया। इस स्टार्टअप को शुरू करने की वजह मेरे नाना थे। मैं दिल्ली में रहती थी। पापा-मम्मी गुरुग्राम में और अकेले नाना गाजिबायाद में रहते थे।

शुचिता गुप्ता अपनी बेटी और अंतरिक्ष यात्री सुनीता विलियम्स के साथ
शुचिता गुप्ता अपनी बेटी और अंतरिक्ष यात्री सुनीता विलियम्स के साथ

नाना से मिला बिजनेस का आइडिया

नाना की देखभाल करना मुश्किल हो जाता था। हमें पड़ोसियों को फोन करके कहना पड़ता था कि मेरे नाना को ब्रेड पहुंचा आइए। खैर, नाना 1996 में गुजर गए। जैसे मेरे नाना की हालत थी, ऐसे में ही मैंने कई बुजुर्ग की स्थिति देखी, जो अपने घरों में अकेले रह गए। उन्हें अपनी हेल्थ के लिए दूसरों का मुंह ताकना पड़ता। इतने स्टार्टअप्स के साथ काम करके मैं ये समझ चुकी थी कि जब दुनिया में सबकुछ एक क्लिक पर अवेलेबल है तो हेल्थकेयर क्यों नहीं?

कोविड के दौरान मेरे काम को और बूम मिला। पेशेंट्स को ऑनलाइन देखना शुरू किया। अब हमारा काम 89 शहरों में है। 70 अस्पतालों से टाइअप्स हैं। 4 जनरल फिजिशियन हैं। फिजियोथेरेपी, डायलिसिस, मेडिसिन डिलीवरी, ईसीजी-एक्सरे सबकुछ हम घर पर ही करते हैं। सभी रिपोर्ट्स मोबाइल पर ही भेज दी जाती हैं। हेल्थकेयर सिर्फ बुजुर्गों के लिए नहीं, बल्कि बच्चों के लिए भी हैं।

शुचिता गुप्ता वीमेन लीडरशिप वर्कशॉप AIMA में
शुचिता गुप्ता वीमेन लीडरशिप वर्कशॉप AIMA में

पिताजी कहते हैं- आधी डॉक्टर बन गई

अपने स्टार्टअप के साथ-साथ मैंने एमबीए भी किया। अब पिता जी कहते हैं, तुम आधी डॉक्टर तो बन चुकी हो। अब पेशेंट्स और उनके परिवार के लोग भी कहते हैं कि हमारे प्लेटफॉर्म ने उन्हें तब मदद पहुंचाई जब सभी ने हाथ खड़े कर दिए थे।

खुद पर भरोसा करें और आगे बढ़ें

अपने करिअर का पूरा निचोड़ देखती हूं तो पाती हूं कि मैंने खुद पर विश्वास किया और यहां तक पहुंच पाई। अब मैं हर महिला से यही कहती हूं कि अगर आप में काबिलियत है और आपको अपनी काबिलियत पर भरोसा है तो अवसर आपके लिए हमेशा खुले रहेंगे। जिंदगी में एक रुकावट जिंदगी खत्म नहीं कर देती बल्कि आगे बढ़ने और सोचने समझने के लिए मौके देती है।

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