पेड़ की झप्पी से इलाज:पौधों की पनाह में दिव्यांगों की मदद कर रही हैं प्रो. बेला, भारत में पहला इनिशिएटिव

22 दिन पहलेलेखक: निशा सिन्हा
  • थेरेपी के कारण बहुत सारे लोग लोग गार्डन देखने आते हैं
  • एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी में थेरेपिस्ट बनने का कोर्स भी है

मोहब्बत में बड़ी ताकत होती है। इंसानों की बात करें या जानवरों की या फिर पेड़-पाैधों की, भगवान की बनाई हर शय से इश्क करने से जिंदगी गुलजार हो जाती है। दिव्यांगों के इलाज के लिए पेड़-पाैधों के प्यार का सहारा ले रही हैं केरल एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी की प्रो. बेला जी.के.।

हगिंग ट्री से लिपट कर ली जा रही टच थेरेपी
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इलाज की अनूठी शैली
यूनिवर्सिटी के कॉलेज ऑफ एग्रीकल्चर में कम्युनिटी साइंस विभाग की प्रो. बेला हॉर्टिकल्चर थेरेपी के जरिए मानसिक, शारीरिक और दृष्टि बाधित दिव्यांगों की मदद कर रही हैं। कॉलेज के सैकड़ों एकड़ में फैले गार्डन में प्लांट्स से जुड़े ढेरों टूल्स हैं, जिसकी मदद से इनके मोटर स्किल्स को इंप्रूव किया जा रहा हैं। मोटर स्किल्स से मतलब है ‘शरीर के अंगों का ब्रेन के साथ सही तालमेल की शैली’। बगीचे में लॉन बनाने, लॉन की देखभाल करने, पौधे लगाने, पौधों को सींचने, गमले तैयार करने, बीज बोने जैसे तमाम काम आपको आसान लगते होंगे, लेकिन दिव्यांगों के लिए ये उतने ही कठिन हैं। यहां दी जाने वाली ट्रेनिंग से दिव्यांगों को आत्मनिर्भर बनाने की कोशिश की जाती है ताकि उन्हें रूटीन के कामों के लिए किसी पर निर्भर न रहना पड़े।

रोटेटिंग पॉट्स से सीखते हैं सामंजस्य बिठाना
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इमोनशल ट्रेनिंग से लर्निंग
पेड़ों से चिपक कर उसे गले लगाना जैसे वह सबसे प्यारा हो, पेड़ों से फुसफुसा कर बातें करना जैसे किसी के कान में चुपके से कुछ कहना हो, झूमती लताओं से गप्पे करना, अलग-अलग फूलों और पत्तियों में बसी खुशबू सूंघना जैसे काम इस ट्रेनिंग का हिस्सा है। इनकी मदद से बोलने, खुशबु को समझने, बातें करने, वातावरण को समझने की क्षमता को विकसित किया जाता है। इसी तरह के दूसरे कई रोचक शैलियों के जरिए दिव्यांगों को उनकी जरूरत के हिसाब से प्रशिक्षित किया जा रहा है।

झूमती-नाचती लताओं के बीच विंड चाइम की टन-टन सुनता दिव्यांग
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भारत में पहली बार इस तरह का अनूठा प्रयास शुरू करने का श्रेय प्रो. बेला को जाता है। ‘अमेरिकन हार्टिकल्चर थेरेपी’ एसोसिएशन की तरफ से इनके प्रयासों को सम्मानित भी किया गया। प्राे. बेला बताती हैं, “ केरल एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी में हॉर्टिकल्चर थेरेपी का पोस्ट ग्रेजुएशन डिप्लोमा कोर्स कराया जाता है। भारत में यह कोर्स केवल यहीं उपलब्ध है। यह कोर्स यूएस की कैंसास यूनिवर्सिटी, मिशिगन यूनिवर्सिटी में है। पूरे भारत के बीएससी एग्रीकल्चर और बीए साइकोलॉजी के स्टूडेंट्स इस कोर्स को कर सकते हैं। सरकारी विश्विवद्यालय होने की वजह से इस कोर्स के लिए फीस नाममात्र देनी होती है। इसे करने के बाद स्टूडेंट्स हॉर्टिकल्चर थेरेपिस्ट बन कर दिव्यांगों के पुर्नवास का हिस्सा बन सकते हैं। छोटा सा गार्डन बना कर जरूरतमंदों को इसी तरह से मदद पहुंचा सकते हैं।

पत्तों और फूलों की खुशबू से सूंघने की क्षमता का विकास
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भाई को खोने के बाद बदल गई जिंदगी
प्रो. बेला बताती हैं कि दिव्यांग बच्चों के लिए वह हमेशा ही कुछ करना चाहती थीं। वे कहती हैं, “सर्जिकल गलती की वजह से मेरा भाई बचपन में ही दिव्यांगता का शिकार हो गया था। जब मैं केवल 10 साल की थी, वह चल बसा। कुछ साल पहले मुझे बहरीन में रहने का मौका मिला। उसी दौरान मैंने हार्टिकल्चर थेरेपी को बहुत करीब से जाना और समझा। वहां एक कम्युनिटी सेंटर में वॉलिंटियर के रूप में काम किया। मेरे काम का मोटो है, ‘हाॅर्टिकल्चर थेरेपी की मदद से अक्षमता से क्षमता की ओर’। मैं और मेरे साथ काम करने वाले लोग बागवानी और खेती की मदद से मानसिक, शारीरिक और दृष्टि बाधित दिव्यांगों की मदद कर रहे हैं। हमारी मेहनत से इनके चेहरे पर आई एक छोटी मुस्कान भी अनमोल होती है। इस काम में साइकोलॉजिस्ट, चाइल्ड डेवलपमेंट एक्सपर्ट और सोशल वर्कर्स की टीम की मदद ली जाती है। इनके प्रयासों का ही नतीजा है कि दिव्यांगों के लगाए गए ढेरों पौधे आज फूलाें से लहलहा रहे हैं और फूलों से निकली खुशबू से पूरी फिजां में घुल गई है।

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