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ये मैं हूं:जैकलीन, लीजा रे जैसी कई सेलेब्रेटी को हिंदी सिखाने वाली लड़की, जिसने बीटेक के बाद मातृभाषा में बनाया करियर

नई दिल्ली5 महीने पहलेलेखक: दीप्ति मिश्रा

मैं हमेशा चाहती थी कि करिअर कुछ ऐसा हो, जिसमें सम्मान मिले, पैसा हो, समय का बंधन न हो और दुनिया भर के लोगों से मिलने-जुलने, उन्हें समझने और जानने का मौका मिले। अभी भी हमारे यहां अभिभावक अपने बच्चों को करिअर चुनने की आजादी कम ही देते हैं। मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ। मां-पापा की पसंद से इंजीनियरिंग की पढ़ाई की। फिर, अपनी मर्जी से साइकोलॉजी पढ़ी और आज टीचर हिंदी की हूं। विदेशी लेखकों, गायकों, अभिनेताओं और राजदूतों को हिंदी पढ़ाती हूं। बॉलीवुड अभिनेत्री जैकलीन फर्नांडीज, लीसा रे, बिग बॉस के कंटेस्टेंट लुसिंडा निकोलस और ब्रिटिश लेखक विलियम डालरिम्पल मेरे स्टूडेंट रह चुके हैं। यह कहना है वैश्विक पटल पर हिंदी को अतुलनीय पहचान दे रहीं पल्लवी सिंह का।

वर्ल्ड हिंदी डे के मौके पर भास्कर वुमन से बातचीत में गाजियाबाद की रहने वाली पल्लवी सिंह कहती हैं, '' मैं कभी भी इंजीनियर बनना नहीं चाहती थी। मिडिल क्लास फैमिली में अभिभावक आज भी अपने बच्चों को इंजीनियरिंग, डॉक्टर और अकांउटेंट बनाने जैसे ख्वाब संजोते हैं। मां-पापा चाहते थे कि मैं इंजीनियरिंग की पढ़ाई करूं। साल 2008 में दिल्ली विश्वविद्यायल में इलेक्ट्रॉनिक एंड कम्युनिकेशन से बीटेक में दाखिला ले लिया। इस दौरान, मैं फ्रेंच सीखने लगी। वहां कुछ विदेशी दोस्त बने, जिन्हें हिंदी नहीं आती थी और वे लोग हिंदी सीखना चाहते थे। मैंने उन्हें हिंदी सिखाई। बीटेक फाइनल ईयर में पहुंचते-पहुंचते कॉलेज में लोग मुझे जानने लगे। नए विदेशी छात्र मुझसे हिंदी पढ़ाने के लिए आग्रह करने लगे। उस वक्त मैं शौकिया हिंदी ट्यूशन पढ़ाती थी।''

हिंदी बनी सहारा
बीटेक की पढ़ाई पूरी हुई। जॉब मिलने में थोड़ी देरी हुई, अच्छा पैकेज नहीं मिला तो घर वाले निराश होने लगे। पड़ोसी और रिश्तेदार ताने मारने लगे। तंग आकर साल 2012 में साइकोलॉजी से एमए करने के लिए मुंबई पहुंच गई। मुंबई के सोफिया कॉलेज फॉर वुमन में दाखिला ले लिया। जेब खाली थी और रहने-खाने का खर्च ज्यादा था। इंजीनियरिंग की थी, लेकिन जॉब नहीं करनी थी। साइकोलॉजी में ट्यूशन दे सकूं, ऐसा लग नहीं रहा था। उस वक्त मातृभाषा सहारा बनी। हिंदी से मुझे रोजगार मिला। इंजीनियरिंग छोड़ हिंदी को बतौर करिअर चुनने में चुनौती भी थी। आज मेरी जो भी पहचान है वो हिंदी की वजह से है।

अभिनेत्री जैकलीन को हिंदी सिखा चुकी हैं पल्लवी सिंह। फाइल फोटो
अभिनेत्री जैकलीन को हिंदी सिखा चुकी हैं पल्लवी सिंह। फाइल फोटो

और फिर बनता गया कारवां..
साल 2014 में भारत में अमेरिकी वाणिज्य दूतावास ने कुछ अप्रवासियों को हिंदी सिखाने के लिए मुझसे संपर्क किया। इससे मुझे मोटिवेशन मिला और हिंदी के प्रति मेरा जुनून बढ़ता गया। उसके बाद जैकलीन फर्नांडीज की पीए ने कॉल किया कि मेरी मैडम हिंदी सीखना चाहती हूं। बस वहां से हिंदी पढ़ाने और सिखाने का जो सिलसिला शुरू हुआ, वो कारवां बन गया। अब विदेशी लेखक, गायक, अभिनेता, राजदूत और युवाओं को हिंदी पढ़ाती हूं।

विदेश नीति के जानकारों को पढ़ाती हैं क, ख, ग...
मैं दिल्ली स्थित ज्यादातर दूतावासों में आने वाले राजदूतों और उनके अधिकारियों को हिंदी सिखा चुकी हूं। अमेरिका और ब्रिटेन समेत कई देशों के विश्वविद्यालयों में जाकर छात्रों को हिंदी पढ़ा चुकी हूं।

आज जो भी हूं हिंदी की बदौलत
पल्लवी सिंह बताती हैं कि हिंदी बोलने वाले लोगों को अक्सर पिछड़ी सोच का माना जाता है। अपने ही देश में उन्हें हिकारत भरी नजरों से देखा जाता है, लेकिन यह हिंदी ही है, जिसने मुझे अमेरिका, ब्रिटेन, जापान और रूस समेत 10 से ज्यादा देशों में जाने का मौका मिला। अलग-अलग देशों को देखने, वहां के लोगों से मिलने और वहां की संस्कृति को जानने का मौका मिला।

विदेशियों को हिंदी पढ़ाती पल्लवी सिंह। फाइल फोटो
विदेशियों को हिंदी पढ़ाती पल्लवी सिंह। फाइल फोटो

तैयार किया हिंदी का रोचक मॉड्यूल
मैं जिन लोगों को हिंदी पढ़ाती थी। वे अक्सर मुझसे हिंदी की किताबों के बारे में पूछते थे, जिससे वे प्रैक्टिस कर सकें। मैंने किताबों के बारे में सोचना शुरू किया ताकि वे लोग मेरे बाद भी हिंदी सीखने की प्रैक्टिस जारी रख सकें। जरूरी नहीं है कि मेरे साथ ही नहीं, मेरे बाद भी। बाजार से कुछ किताबें खरीद कर पढ़ी तो उनमें ऐसी हिंदी नहीं है, जिन्हें बातचीत की हिंदी कहा जाए या उन किताबों से वे लोग हिंदी सीख सकें। इसके बाद मैंने अपनी अंग्रेजी को और बेहतर किया और बेसिक मॉड्यूल तैयार कर विदेशी पर्यटक व अन्य को हिंदी पढ़ाने के लिए एक मॉड्यूल तैयार किया। इस मॉड्यूल से विदेशियों को रोचक तरीके से हिंदी पढ़ाई जा सकती है।

लोगों का बदला नजरिया, मिला सम्मान
जो लोग इंजीनियरिंग करने के बाद जॉब नहीं मिलने के चलते ताने मारते थे। उन लोगों का अब नजरिया बदल गया है। कुछ लोगों के ताने प्यार में बदल गए हैं। कुछ लोग अपने बच्चों को मेरा उदाहरण देने लगे हैं कि जब वो हिंदी पढ़ाकर अपनी पहचान बना सकती है तो तुम क्यों नहीं। तुम कोई भी काम शुरू क्यों नहीं कर सकते हो। हालांकि, अब भी हिंदी के प्रति लोगों का नजरिया बदलने की जरूरत है।

सम्मान के साथ अवार्ड भी मिले
देश से लेकर विदेश तक लोगों ने मुझे खूब प्यार और सम्मान दिया। कई संस्थाओं ने मुझे सम्मानित किया। हाल ही में दिल्ली-एनसीआर की 5ं चुनिंदा महिलाओं को दिए जाने वाला 'नेशन्स च्वाइस अवार्ड' से मुझे सम्मानित किया गया है।

अभिनेत्री लीसा रे के साथ हिंदी की टीचर पल्लवी सिंह। फाइल फोटो
अभिनेत्री लीसा रे के साथ हिंदी की टीचर पल्लवी सिंह। फाइल फोटो

आज जब मेरे छात्र मुझे हिंदी का सबसे शानदार टीचर कहते हैं तो सच कहूं मुझे सुनकर किसी मोटे पैकेज से ज्यादा संतोष होता है। मैं अपने काम से खुश हूं। हालांकि, मुझे इस बात का थोड़ा मलाल भी है कि अभी तक कोई भारतीय माता-पिता नहीं आए कि मेरे बच्चों को हिंदी पढ़ाइए।

हिंदी के नए रोचक तरीकों पर कर रही हूं काम..
पल्लवी कहती हैं कि कोविड के दौरान ऑनलाइन पढ़ा रही थी। हालांकि, कोरोना की दूसरी लहर में मेरे पास एक भी छात्र नहीं था। अभी 5 से 6 लोग हैं, जो ऑनलाइन मुझसे हिंदी सीख रहे हैं। इनमें किसी की इंडिया से शादी होने वाली है, तो किसी की फैमिली में विदेश से कोई आया है। इस दौरान, मुझे समय मिला है, तो हिंदी के कुछ और नए तरीकों पर काम कर रही हूं ताकि जो लोग हिंदी से नहीं जुड़े हैं, वे आसानी से हिंदी सीख सकें। बता दें कि पल्लवी की हिंदी और अंग्रेजी के साथ-साथ फ्रेंच और स्पैनिश भाषा पर भी अच्छी पकड़ है।