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मुझे बेच दिया गया, पर ट्रेन से कूदकर बचाई जान:घर लौटी तो लोग कहते-धंधेवाली, अब नरक से निकली लड़कियों काे दे रही जिंदगी

नई दिल्ली3 महीने पहलेलेखक: दीप्ति मिश्रा

एक लड़की, जिसकी आंखों में पढ़-लिखकर काबिल बनने का ख्वाब पल रहा था। लेकिन 14 साल की उम्र में उसे धोखे से बेच दिया गया। 24 घंटे से भी कम समय में उसे दूसरी बार बेचने की तैयारी हो रही थी। तभी लड़की ने हिम्मत दिखाई और तस्करों को चकमा देकर भाग निकली। घर पहुंची तो गांव वालों ने उसे ही गुनहगार बना दिया। पढ़े-लिखे लोगों ने स्कूल से निकलवा दिया। धंधे वाली लड़की का ठप्पा लगा दिया। आज वही 21 साल की लड़की यानी पीहू मंडल ह्यूमन ट्रैफिकिंग की शिकार हुई लड़कियों की जिंदगी को पटरी पर लाने के लिए काम कर रही है। पढ़िए, पीहू मंडल की कहानी, उन्हीं की जुबानी...

वुमन भास्कर से बातचीत में इंडियन लीडरशिप फोरम अगेंस्ट ट्रैफिकिंग (इल्फत) की लीडर पीहू मंडल कहती है, ‘मैं अपनी कहानी अपनी वास्तविक पहचान के साथ आपसे साझा करना चाहती हूं। मैं पहचान नहीं छिपाना चाहती, क्योंकि मैंने किसी के साथ कुछ भी गलत नहीं किया। उल्टा मेरे साथ गलत हुआ। मेरे सपने तोड़ने की कोशिश की। मेरे सम्मान और आत्मसम्मान पर चोट की गई। कई महीनों तक तनाव में रही। फिर खुद को समेटा, संभाला, तब जाकर आज इस स्थिति में आ पाई कि मैं लोगों से मिल सकूं। मानव तस्करी की शिकार हुई लड़कियों का दुख बांट सकूं, उन्हें नरक की छाया से निकाल कर दिन का उजाला दिखा सकूं तो फिर मैं क्यों अपनी पहचान छिपाऊं।’

‘मैम साहब’ बनने का देखा था सपना
मैं पश्चिम बंगाल के परगना जिले के एक छोटे से गांव से हूं। पापा दिहाड़ी मजदूर हैं और मम्मी हाउसवाइफ। जमीन नहीं है। घर भी कच्चा है। मेरे गांव में लड़कियां पढ़ने नहीं जातीं, लेकिन मैं पढ़ना चाहती थी। बड़ी होकर मैम साहब बनना है, यह सोचकर ही मेरे मन के किसी कोने में तितलियां उड़ने लगती थीं। आंखों में जुगनू टिमटिमाने लगते थे। मुझे खिलौनों से ज्यादा किताबें पसंद आतीं। अच्छी बात यह हुई कि मां-पापा ने मेरे इस सपने को अपना बना लिया। उन्होंने सब से लड़-झगड़कर मेरा स्कूल में दाखिला करवा दिया।

एक कार्यक्रम के दौरान मंच पर बोलते हुए ह्यूमन ट्रैफिकिंग सर्वाइवर्स के लिए काम करने वाली पीहू मंडल।
एक कार्यक्रम के दौरान मंच पर बोलते हुए ह्यूमन ट्रैफिकिंग सर्वाइवर्स के लिए काम करने वाली पीहू मंडल।

पढ़ने में खासा रुचि थी, इसलिए मां-पापा मुझे अपने काम में हाथ बंटाने को नहीं कहते थे। हालांकि, गांव वालों के ताने वक्त-बेवक्त सुनने को मिलते रहते थे, लेकिन उनका मुझ पर और मेरे परिवार पर कुछ खास असर नहीं हो रहा था। मैं अपने छोटे-छोटे कदम सपने की ओर बढ़ा रही थी।

बदन में दर्द था, लेकिन जान नहीं...
14 साल की उम्र थी। मैं दसवीं क्लास में आ गई थी। बहुत सारे लोग हर दिन हम दोनों को स्कूल आते-जाते देखते थे, लेकिन मुझे कभी ऐसा नहीं लगा कि कोई हम पर नजर रख रहा है। एक रोज मैं अपनी दोस्त के साथ स्कूल से घर लौट रही थी। भीषण गर्मी और प्यास से गला सूख रहा था। सड़क किनारे ठेला लगाए खड़े एक शख्स से ठंडा पानी मांगकर हम दोनों ने पिया। फिर घर की ओर चल पड़े। थोड़ी दूर चलने के साथ ही कदम लड़खड़ाने लगे। सब कुछ घूमता हुआ नजर आ रहा था। जब आंख खुली तो मैं और मेरी दोस्त ट्रेन में थे। बदन में भयंकर दर्द का अहसास था, लेकिन इतनी जान नहीं कि उठकर बैठ सकूं। हमारे कपड़े अस्त-व्यस्त थे। शरीर पर चोट के निशान और चोटियां वैसी नहीं थी, जैसी हमने बनाई। अपनी हालत देखकर हम दोनों को समझ आ गया था कि हमारे साथ गलत हुआ है।

चेन खींचकर ट्रेन रुकवाई, फिर रेलवे पुलिस ने पहुंचाया घर
मैं और मेरी फ्रेंड रो रहे थे, लेकिन एक-दूसरे की मदद नहीं कर पा रहे थे। 9वीं क्लास में हम ह्यूमन ट्रैफिकिंग के बारे में बताने वाली एक वर्कशॉप में शामिल हुए थे। इसलिए हम लोगों को इस बारे में आइडिया था। इसलिए हमें पता चल गया कि हम दोनों को बेच दिया गया, जहां हमारे साथ गलत हुआ और अब दूसरी पार्टी को बेचने के लिए ले जाया जा रहा है। खैर हम दोनों ने दिमाग लगाया। हमने किसी को बात करते सुना कि एक रेलवे स्टेशन आने वाला है, लेकिन वहां ट्रेन रुकेगी नहीं। हम दोनों ने खुद को संभाला। जैसे ही स्टेशन आया चेन खींच दी। ट्रेन से उतरकर सीधे स्टेशन मास्टर के पास पहुंची और उनसे मदद मांगी। रेलवे पुलिस भी आ गई, जो पूछताछ के बाद हम दोनों को हमारे घर पहुंचाने आई। यह बताते हुए मैंने उस घटना का डर पीहू के चेहरे पर महसूस किया।

महिलाओं के समूह को ह्यूमन ट्रैफिकिंग के बारे में जानकारी देती पीहू मंडल।
महिलाओं के समूह को ह्यूमन ट्रैफिकिंग के बारे में जानकारी देती पीहू मंडल।

स्कूल से निकाल दिया गया, टीचर का बदल गया व्यवहार
एक दिन बाद जब हम घर पहुंचे, तब देखा कि हमारे मां-बाप का रो-रोकर बुरा हाल था। गांव में तरह-तरह की बातें बन चुकी थी। पढ़ने वाली लड़कियां भाग जाती हैं, देखो भाग गई ना। इतने गंदे-गंदे शब्दों का इस्तेमाल किया गया, जिनका मैं जिक्र भी नहीं कर सकती। स्कूल से निकलवा दिया गया, लेकिन बंदनमुक्ति सर्वाइवर लीडर्स कलेक्टिव ग्रुप की मदद से स्कूल में पढ़ने दिया। टीचर हमसे ठीक से पेश नहीं आते। बच्चे क्लास में साथ नहीं बैठने देते। पहली सीट पर बैठने वाली लड़की को क्लास की सबसे पीछे वाली सीट पर बैठा दिया गया। कुछ बच्चों के मां-बाप कहते- तुम हमारे लड़कों से दूर रहा करो। वैसे भी पढ़कर तुम क्या करोगी, करना तो धंधा ही है......यह बताते-बताते पीहू की आवाज भर्रा जाती है।

इन सब बातों ने मेरे घर में मनहूसियत सी भर दी। मैं डिप्रेशन में चली गई। बंधन मुक्ति वालों ने मेरी काउंसलिंग कराई। मैंने खुद को संभाला। मैं फिर से स्कूल जाने लगी और यह साबित किया कि उस दिन जो हुआ, उसमें मेरी गलती नहीं थी। इसके बाद बंधन मुक्ति और इल्फत से जुड़कर मैं ह्यूमन ट्रैफिकिंग, चाइल्ड ट्रैफिकिंग और रेप विक्टिम सर्वावाइवर्स के लिए काम करने लगी। इनमें से मैंने कई लड़कियों को इतनी बुरी स्थिति में देखा है कि उनके बारे में सोचकर रूह कांप जाती है और सोचती हूं कि मैं काफी लकी थी, जो बच निकली। स्कूल-कॉलेज, जिला-राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर लड़कियों को ह्यूमन ट्रैफिकिंग के बारे में जागरूक करती हूं ताकि फिर कोई लड़की नरक में न फंसे । मैं बस यही उम्मीद करती हूं कि न सिर्फ हमारे देश, बल्कि दुनिया में कहीं भी किसी भी इंसान को न बेचा जाए। इसके लिए जरूरी है कि सरकार ह्यूमन ट्रैफिकिंग के खिलाफ कानून बनाए। इल्फत देश के 10 राज्यों में 4500 से अधिक ह्यूमन ट्रैफिकिंग सर्वाइवर्स को सहारा दे रही है।

स्कूल-कॉलेज की लड़कियों व महिलाओं को ह्यमन ट्रैफिकिंग के बारे में जागरूक करती कुर्सी पर बैठी पीहू।
स्कूल-कॉलेज की लड़कियों व महिलाओं को ह्यमन ट्रैफिकिंग के बारे में जागरूक करती कुर्सी पर बैठी पीहू।

पहाड़ पर जाना है सपना
21 साल की पीहू बताती हैं कि अभी मैंने संस्कृत ऑनर्स से बीए की पढ़ाई पूरी की है। अब मैं मास्टर ऑफ सोशल वर्क करना चाहती हूं। साथ ही मैंने हैंडमेड ज्वैलरी का काम शुरू कर दिया है। जब मूड बहुत अच्छा होता है और जब बहुत खराब होता है, तब मैं पेंटिंग्स बनाती हूं। मेरी एक छोटी सी ख्वाहिश है, ‘मैं एक बार पहाड़ों पर जाना चाहती हूं, वहां सबसे ऊंची चोटी पर खड़े होकर बांहें फैलाकर प्रकृति को महसूस करना चाहती हूं। खुली हवा में सांस लेना चाहती हूं।’

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