• Hindi News
  • Women
  • This is me
  • 'I Am Not Just Gay, But A Motivational Speaker, Motor cyclist, Photographer And First And Foremost A Human Being'

सतरंगी दुनिया का इंसान:‘मैं सिर्फ ‘गे’ नहीं बल्कि मोटिवेशनल स्पीकर, मोटर-साइकिलिस्ट, फोटोग्राफर और सबसे पहले एक इंसान हूं’

2 महीने पहलेलेखक: मीना

लोग अक्सर मुझसे पूछते हैं, आप कौन हैं? आपकी सेक्सुअल प्रिफरेंस क्या है? आपको लड़के पसंद हैं या लड़कियां? अरे भई मुझसे इतने सवाल क्यों? मैं एक इंसान दिख रहा हूं इतना काफी नहीं मेरी पहचान के लिए? मैं आपके जैसा चलता हूं, खाता हूं, जिम्मेदारी उठाता हूं, इश्क करने की कुवत रखता हूं। क्या इतना बायोडेटा काफी नहीं! ये शब्द हैं क्वीर एक्टिविस्ट, मोटर-साइकिलिस्ट, मोटिवेशनल स्पीकर और फोटोग्राफर डिम्पल मिथिलेश चौधरी के।

डिम्पल मिथिलेश चौधरी
डिम्पल मिथिलेश चौधरी

भास्कर वुमन से बातचीत में डिम्पल बताते हैं, ‘बचपन से मेरा शरीर गलत रूह में था, पर काम, चाल-ढाल सबकुछ बाकी इंसानों जैसी। मेरे परिवार ने मुझे कभी ये अहसास नहीं कराया कि मैं कुछ अलग हूं। उत्तर प्रदेश के हाथरस में एक बड़ी ही प्यारी सी फैमिली में एक बेटी के शरीर के साथ मेरा जन्म हुआ। एक प्यारी मां, पिता, भाई-बहन से भरा हुआ घर है। मां बताती हैं कि बचपन से मुझे भाई के कपड़े पहनने पसंद थे। लड़कों के साथ खेलना, उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलना पसंद था। मेरा शरीर एक लड़की का था तो मुझे सूट-सलवार और दुपट्टा पहनकर रहना पड़ता। 12वीं तक मैं सूट सलवार पहनकर रहा भी, लेकिन उन कपड़ों में खुद को फिट नहीं बैठा पाया। मुझे घर में बर्तन धोना, मम्मी की तरह घर में घुसे रहना, आटा गूंथना कुछ भी पसंद नहीं था। दिन भर शाम का वेट करता। शाम आती और मैं मैदान की ओर दौड़ लेता। वहां लड़के आते और मैं उनके साथ खेलने लगता। बस फिर क्या था लड़की होकर गांव में लड़कों के झुंड में खेलता तो मम्मी की मार भी पड़ती। जीवन अल्हड़पन और बचपन की आजादी में उछल रहा था।

‘पहचान’ होने पर दोस्तों को खोने का लगा डर
जब 10वीं में पहुंचा तो लड़कियों के ग्रुप्स में लड़कों की बातें सुनता। तब मुझे अटपटा लगता, क्योंकि मेरे लिए लड़के किसी तीसरी दुनिया के निवासी नहीं थे। तब मुझे लगा कि मैं बाकी लड़कियों से कुछ अलग हूं। क्या मुझे मेरी ये पहचान सबके सामने लानी चाहिए या छुपानी चाहिए। कहीं पहचान सामने आने पर मेरे दोस्त मुझसे छिन तो नहीं जाएंगे? मैं असमंजस में थी। एक दिन टीवी पर सत्यमेव जयते आ रहा था। जिसमें एलजीबीटीक्यू समुदाय पर बात हो रही थी। तब मुझे लगा कि मैं ये हूं, जिसकी ये बात हो रही है। मैं एक गे हूं।

ये बात मैंने अपनी मां को बताई। मां इतनी मासूम और प्यारी हैं वो बोलीं, गे तो ठीक है, पर क्या गे शादी नहीं करते? मैंने हंसते हुए जवाब दिया- गे शादी करते हैं, प्यार करते हैं और भी बहुत कुछ कर सकते हैं। मैंने ये भी सोचा कि ट्रांसप्लांट करा लेता हूं, उसकी प्रक्रिया भी मां को बताई। मां डर गईं, बोलीं, तू अपने शरीर के साथ कुछ मत कर। जैसी है वैसी ही रह। हमें कोई दिक्कत नहीं। मां के इन शब्दों से मुझे बहुत राहत मिली। अब हाथरस की ये लड़की सोच-विचार, चाल-ढाल और पहनावे से एक लड़का बन चुकी थी।

मां के साथ डिम्पल
मां के साथ डिम्पल

अब आईं चुनौतियां
अपनी ‘गे’ पहचान के साथ ही 12वीं के बाद मैं अलीगढ़ पढ़ने के लिए गया। मैंने अंग्रेजी में एमए किया। फिर बाद में मीडिया की भी पढ़ाई की। 2009 में दिल्ली आई। दिलवालों की दिल्ली समझकर आई थी, लेकिन यहां दिल पर ही सबसे ज्यादा छूरियां चलीं।लिखने का शौक था तो मीडिाय में काम शुरू किया। यहां स्क्रिप्ट राइटर, रिपोर्टर, प्रोग्राम प्रोड्यूसर तमाम डेजिग्नेशन्स पर काम किया, लेकिन मेरे काम से ज्यादा मेरी सेक्सुअलिटी पर फोकस किया गया। कैंटीन में खाने की एक पूरी टेबल पर मैं और मेरा टिफिन बॉक्स होते। कोई मेरे साथ नहीं खाता। बाकी लड़कियों को मेरे साथ नहीं आने दिया जाता, ये बोलकर कि मैं उन्हें अपने जैसा बना दूंगा। नाइट शिफ्ट में काम करवाया जाता। मैं रोता। तड़पता। बेचैन होता और बेहोश भी। पर मेरी तरफ ध्यान देने वाला कोई इंसान नहीं था। हर रात अंधेरे में कटती। डिप्रेशन का शिकार हुआ। फिर सोचा जिंदगी को ऐसे तबाह नहीं करना। यहां से निकलना है। मैंने नौकरी छोड़ी और बिना कुछ सोचे समझे वहां से निकल गया।

एक साल तक घर पर रहा। इस संवेदनशील मन के पास शब्द बहुत हैं, उन्हें कागज पर उकेरा। कविताएं लिखीं। कविता पाठ में भाग लिया। फोटोग्राफी का भी शौक था। 2017 में तस्वीरबाज बन गया। गलियों में दिखते चेहरों में सच्चाई दिखती है, इसलिए उन्हें कैमरे में कैद करके एग्जीबिशन का हिस्सा बनाया। देश और विदेश में मेरी फोटोग्राफी लोगों को पसंद आई और एक स्ट्रीट फोटोग्राफर की पहचान बन गई। बचपन से पर्सनैलिटी कूल, आवारा, आजाद अपने शब्दों में कहूं तो लल्लनटॉप रही। जमीन के कई हिस्से अपनी 2 पहियों वाली मशीन से नापते हुए देश के कई हिस्सों में घुमक्कड़ी की है। दिल्ली से बांग्लादेश , गोआ, लेह-लद्दाख और कई अलग-अलग राज्यों में दौड़ा दी है मैंने अपनी फटफटिया। विमा (women's international motorcycle association) का हिस्सा हूं।

जब सतरंगी दुनिया से हुए रूबरू...
जब दिल्ली आया तो यहां एक सतरंगी दुनिया मिली, जहां की हर बात खूबसूरत लगी। यहां मेरे जैसे लोग थे। कोई भेदभाव नहीं, कोई सवाल-जवाब नहीं। खुल के हंसते, खुल कर रोते हैं। कोई लेस्बीयन नहीं, कोई गे नहीं...यहां सब इंसान हैं। यहां आकर मैंने अपने अधिकारों के बारे में जाना। खुद को और एक्सप्लोर किया। अब मैं गर्व से अपनी पहचान बता सकता था। यहां आकर जाना दिलों का धड़कना क्या होता है। जिंदगी में एक नहीं कई बार किसी के साथ प्रेम में होना महसूस किया। अगर कहूं तो हां, 3 बार मोहब्बत हुई। रिश्ता काफी गहरा रहा। मगर एक-एक करके पीछे छूट गया। मोहब्बत थी तो अलग होने के बाद दर्द का अहसास भी काफी लंबे वक्त तक रहा। मगर वक्त था तो फिर संभल भी गया।

एक बार फिर खुद की पहचान पर सवाल हुआ, लेकिन कभी मरने के बारे में नहीं सोचा। मेरे पेरेंट्स ने मुझे इतने नाजों से पाला है। मैं उनका अभिमान हूं। मैं खुद को कैसे खत्म कर सकता हूं। राख की तरह मैं फिर उड़ा और आगे बढ़ा। हमारी इस सतरंगी दुनिया में रिश्तों को खुद ही नाम देकर उसे दिल से अपनाया जाता है। आज इस सतरंगी दुनिया में कई लोगों के साथ नाम से जुड़ा रिश्ता भी है जिनमें एक बेहद प्यारा इंसान मुझे ‘डैड’ कहता है और मैं उसे अपना बेटा। ये रिश्ता बाहर की दुनिया वाले नहीं समझेंगे क्योंकि उनके लिए ये हंसने के एक पल से ज्यादा कुछ नहीं होगा। मगर अब कभी परवाह नहीं की हमने। अब मैं एलजीबीटीक्यू संस्थाओं के साथ मिलकर काम करता हूं। आज मेरी पहचान एक मोटिवेशनल स्पीकर की भी है। अब मेरी एक सतरंगी दुनिया है, पता है, पहचान और नाम है।

खबरें और भी हैं...